सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के तीसरे रेफरी सदस्य द्वारा विवाद की जड़ से जुड़े रेफरेंस सवालों का जवाब देते हुए मेरिट पर अपील का निपटारा करना ऐसी कोई अवैधता नहीं है, जिसके लिए हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करना पड़े। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अधिकार क्षेत्र के आधार पर एनसीडीआरसी के तीसरे सदस्य के निर्णय को खारिज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका पर मेरिट के आधार पर नए सिरे से सुनवाई की जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद साल 2006 में दर्ज शिकायत संख्या 13 से शुरू हुआ था, जिसे अपीलकर्ताओं (अस्करी हुसैन और अन्य) ने राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, उत्तर प्रदेश (एससीडीआरसी) के समक्ष दाखिल किया था। 4 दिसंबर 2012 को एससीडीआरसी ने शिकायत स्वीकार करते हुए अपीलकर्ताओं को 15 प्रतिशत ब्याज के साथ 95 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
इस आदेश के खिलाफ पहले प्रतिवादी दिनेश कुमार ने एनसीडीआरसी में प्रथम अपील संख्या 156/2013 दाखिल की। सुनवाई के दौरान एनसीडीआरसी पीठ के दोनों सदस्यों की राय अलग-अलग रही:
- पीठासीन सदस्य ने 19 मार्च 2021 को अपील स्वीकार करते हुए शिकायत खारिज कर दी।
- वहीं, साथी सदस्य ने उसी दिन आदेश में संशोधन करते हुए मुआवजे की राशि घटाकर 93 लाख रुपये और ब्याज दर 12 प्रतिशत कर दी।
इस मतभेद के बाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 58(3) के तहत तीसरे सदस्य को रेफरेंस भेजा गया। मतभेद वाले बिंदुओं को सीधे रेखांकित करने के बजाय रेफरिंग पीठ ने तीसरे सदस्य के समक्ष पांच विशिष्ट सवाल तय किए। ये सवाल मेडिकल सेंटर से डॉक्टर के संबंध, भर्ती व ऑपरेशन के दस्तावेजी सबूत, शिकायत से इतर मौखिक कथनों पर निष्कर्ष निकालने, मेडिकल रिकॉर्ड रोके जाने और बिना जिरह वाले हलफनामों की स्वीकार्यता से जुड़े थे।
9 जनवरी 2024 को तीसरे सदस्य ने साथी सदस्य की राय से सहमति जताते हुए अपील का निपटारा कर दिया। उन्होंने मुआवजे के वितरण, ब्याज और खर्चों को लेकर विस्तृत निर्देश दिए।
इसके बाद पहले प्रतिवादी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत याचिका दायर की। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 11 दिसंबर 2024 को तीसरे सदस्य के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि रेफरी सदस्य ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सीधे अपील तय कर दी, जबकि उन्हें केवल अपनी राय वापस रेफरिंग डिवीजन बेंच को भेजनी चाहिए थी।
पूर्व के फैसलों और कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने रेफरेंस से जुड़े कानूनी सिद्धांतों की पड़ताल की। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केशो नाथ खुराना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1981), कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम बंसी धर एंड संस (1986) और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फुल बेंच के फैसले श्रीराम इंडस्ट्रियल एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1994) पर भरोसा जताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम सलिल सभरवाल (2013) का भी हवाला दिया, जिसमें केरल स्टेट साइंस एंड टेक्नोलॉजी म्यूजियम बनाम रामबल कंपनी (2006), टी.ए. हमीद बनाम एम. विश्वनाथन (2008) और साकिब अब्दुल हमीद नाचन बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (2010) जैसे मामलों का उल्लेख था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि सामान्य नियम यही है कि रेफरी पीठ जवाब देकर मामला वापस मूल पीठ को भेजती है, लेकिन यदि कोई प्रासंगिक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है तो व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने फैसले में उल्लेख किया कि सीपीसी में आपराधिक कानूनों जैसी सीधी व्यवस्था नहीं है, परंतु उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 58(3) एनसीडीआरसी के लिए स्पष्ट वैधानिक ढांचा प्रदान करती है:
“जहां किसी पीठ के सदस्य किसी बिंदु पर राय में भिन्न होते हैं, वहां उस बिंदु का निर्णय बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा, यदि बहुमत है, लेकिन यदि सदस्य समान रूप से विभाजित हैं, तो वे उस बिंदु या उन बिंदुओं का उल्लेख करेंगे जिन पर वे भिन्न हैं, और अध्यक्ष को एक संदर्भ देंगे जो या तो स्वयं उस बिंदु या बिंदुओं की सुनवाई करेंगे या एक या अधिक अन्य सदस्यों द्वारा ऐसे बिंदु या बिंदुओं पर सुनवाई के लिए मामला भेजेंगे और ऐसे बिंदु या बिंदुओं का निर्णय उन सदस्यों के बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है, जिनमें वे सदस्य भी शामिल हैं जिन्होंने इसे पहली बार सुना था…”
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यद्यपि धारा 58(3) के सीधे अध्ययन से यह लग सकता है कि तीसरे सदस्य ने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया, लेकिन इस मामले का संदर्भ अलग था। रेफरिंग पीठ ने केवल मतभेद के बिंदु नहीं भेजे थे, बल्कि पूरे मामले के तथ्यों और सबूतों की गहराई से जुड़े सवाल तैयार किए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“रेफरेंस के दायरे पर उठाई गई आपत्ति हमारी नजर में तकनीकी है। हालांकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत वैधानिक अधिदेश तीसरे सदस्य को केवल मतभेद के बिंदु तक सीमित रहने का निर्देश देता है, लेकिन वर्तमान मामला अलग स्थिति में है। रेफरिंग आदेश ने मतभेद के बिंदुओं को अलग से स्पष्ट नहीं किया; बल्कि ऐसे सवाल तय किए जो शिकायत की जड़ तक जाते हैं और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से अलग नहीं किए जा सकते। तीसरे सदस्य को अनिवार्य रूप से पूरी सामग्री और दोनों पक्षों की दलीलों का विश्लेषण करना पड़ा। इसी पृष्ठभूमि में तीसरे सदस्य ने सवालों के जवाब देते हुए बहुमत की राय (उनकी राय और साथी सदस्य की राय एकमत होने के कारण) के आधार पर मेरिट पर अपील का भी निर्णय कर दिया। इस प्रकार देखने पर तीसरे सदस्य का रुख एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसे इस न्यायालय ने सलिल सभरवाल (उपरोक्त) मामले में असाधारण परिस्थितियों में स्वीकार्य माना है। इसलिए, इतने समय बीत जाने के बाद हमें तीसरे सदस्य के इस रुख को अस्वीकार नहीं करना चाहिए।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर हम मानते हैं कि संदर्भित सवालों के जवाब के साथ रेफरेंस को वापस न भेजकर और सीधे अपील का फैसला करके, तीसरे सदस्य ने कोई ऐसी अवैधता नहीं की जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करना आवश्यक हो।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 11 दिसंबर 2024 के आदेश को निरस्त कर दिया और मामला वापस हाईकोर्ट को भेज दिया।
पीठ ने निर्देश दिया कि पहले प्रतिवादी की अनुच्छेद 227 याचिका पर कानून के अनुसार मेरिट के आधार पर नए सिरे से फैसला किया जाए। कोर्ट ने सभी कानूनी व तथ्यात्मक पहलुओं को खुला रखा है और मामले के पुराने होने के मद्देनजर हाईकोर्ट से यथाशीघ्र निर्णय लेने का आग्रह किया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अस्करी हुसैन और अन्य बनाम दिनेश कुमार और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 11988/2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 19685/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 24 अगस्त 2026

