सुप्रीम कोर्ट ने 2016 के सूरजगढ़ लौह अयस्क खदान आगजनी मामले में आरोपी वकील सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए 14 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की तीन सदस्यीय पीठ ने महाराष्ट्र सरकार के उस अनुरोध के बाद सुनवाई की यह तिथि तय की, जिसमें राज्य ने आरोपी के खिलाफ सबूत पेश करने के लिए नियमित सुनवाई वाले दिन का समय मांगा था। गाडलिंग ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के जनवरी 2023 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी।
अदालत में दलीलें और प्रक्रिया
सुनवाई के दौरान गाडलिंग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पीठ के समक्ष दलील दी कि उनके मुवक्किल इस आगजनी मामले में पिछले सात वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं। सिब्बल ने कहा कि एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले के समानांतर ही उन पर यह दूसरा मामला भी थोप दिया गया था, जबकि एल्गार परिषद मामले में उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जिन आरोपियों पर वाहनों को सीधे तौर पर आग के हवाले करने का आरोप है, वे पहले ही जमानत पा चुके हैं।
वहीं, महाराष्ट्र सरकार का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने अदालत से मामले को गैर-विविध (नियमित सुनवाई) दिवस पर सूचीबद्ध करने का आग्रह किया ताकि अभियोजन पक्ष गाडलिंग के खिलाफ मौजूद साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर ला सके।
इससे पहले, 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने गाडलिंग की इस अपील पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।
घटना की पृष्ठभूमि और आरोप
यह मामला 25 दिसंबर 2016 की उस घटना से संबंधित है, जिसमें महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की सूरजगढ़ खदानों से लौह अयस्क की ढुलाई में लगे 76 वाहनों को माओवादी विद्रोहियों ने कथित तौर पर आग लगा दी थी।
इस हमले के बाद गाडलिंग के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और आतंकवाद विरोधी कानून ‘गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम’ (यूएपीए) के विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि गाडलिंग ने माओवादी कैडरों को सहायता पहुंचाई और कई सह-आरोपियों—जिनमें से कुछ अभी भी फरार हैं—के साथ मिलकर आपराधिक साजिश में भाग लिया।
जांच एजेंसियों के अनुसार, गाडलिंग ने प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़ी गोपनीय जानकारियां और विभिन्न क्षेत्रों के नक्शे भूमिगत माओवादी समूहों तक पहुंचाए थे। इसके अतिरिक्त, उन पर सूरजगढ़ खदानों के संचालन का विरोध करने के लिए माओवादियों को प्रेरित करने और स्थानीय निवासियों को इस आंदोलन में शामिल होने के लिए भड़काने का भी आरोप है।
एल्गार परिषद मामला
गाडलिंग 2017 के एल्गार परिषद मामले में भी एक आरोपी हैं। यह मामला पुणे स्थित 18वीं सदी के ऐतिहासिक शनिवार वाड़ा में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन में कथित भड़काऊ भाषण देने से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, इन्हीं भाषणों की वजह से अगले दिन पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के निकट हिंसा भड़की थी।

