अंतर-राज्यीय डिजिटल साक्ष्य और तकनीकी सीमाओं का हवाला देते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने 2020 में लापता हुई नाबालिग की जांच सीबीआई को सौंपी

निष्पक्ष जांच के मौलिक अधिकार और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण पर जोर देते हुए झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद शामिल हैं, ने लगभग छह वर्षों से लापता एक 14 वर्षीय किशोरी के मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को स्थानांतरित कर दी है। याचिकाकर्ता मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में अंतर-राज्यीय मानव तस्करी के संभावित पहलू, कई राज्यों तक फैले डिजिटल साक्ष्य और राज्य में ‘गेट एनालिसिस’ जैसी आधुनिक फोरेंसिक तकनीकों की अनुपलब्धता को देखते हुए एक केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच कराया जाना आवश्यक है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर एक याचिका से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपनी नाबालिग बेटी को खोजने, बरामद करने और कोर्ट के समक्ष पेश करने की गुहार लगाई थी। याचिका के अनुसार, 16 अक्टूबर 2020 को सुबह लगभग 10:45 बजे 14 वर्षीय किशोरी अपने घर (बोकारो) से ट्यूशन पढ़ने के लिए निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी।

उसी दिन सुबह लगभग 11:15 बजे एक ग्रामीण ने पीड़िता के पिता को सूचना दी कि कुरमा अस्पताल जाने वाली मुख्य सड़क पर एक लेडीज साइकिल, चप्पल की जोड़ी और कुछ कॉपियां बिखरी पड़ी हैं। पिता ने मौके पर पहुंचकर उन वस्तुओं की पहचान अपनी बेटी के सामान के रूप में की। इसके बाद उसी दिन पिंडराजोरा थाने में प्राथमिकी (कांड संख्या 161/2020) दर्ज कराई गई।

घटना के साढ़े पांच साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थानीय पुलिस को कोई ठोस सुराग नहीं मिला। सक्षम मजिस्ट्रेट ने सितंबर 2022 में चार संदिग्धों के नार्को टेस्ट की अनुमति दी थी, लेकिन जनवरी 2023 में केवल तीन का ही परीक्षण किया गया। चौथे संदिग्ध का नार्को टेस्ट कथित चिकित्सीय अस्वस्थता के आधार पर नहीं कराया गया, जबकि रिकॉर्ड पर कोई मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई थी। बाद में उसी थाना क्षेत्र से एक अन्य नाबालिग के लापता होने के मामले की जानकारी मिलने पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आशंका जताई कि उसकी बेटी अवैध हिरासत में है और उसके जीवन व स्वतंत्रता को गंभीर खतरा है।

जांच की प्रगति और राज्य सरकार का रुख

याचिका के लंबित रहने के दौरान राज्य सरकार ने 20 अप्रैल 2026 को जांच सीआईडी को सौंप दी, जिसने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया। सुनवाई के दौरान सीआईडी की तकनीकी टीम ने कोर्ट को बताया कि बिहार के गोपालगंज में एक सुराग मिला था, जहां ई-केवाईसी रिकॉर्ड के आधार पर एक महिला का हुलिया लापता बच्ची से 90 प्रतिशत तक मेल खाता था। हालांकि, उस महिला की पहचान की पूर्ण पुष्टि नहीं हो सकी।

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जब हाईकोर्ट ने पूछा कि पहचान की पुष्टि के लिए ‘गेट एनालिसिस’ जैसी उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग क्यों नहीं किया गया, तो तकनीकी अधिकारियों ने स्वीकार किया कि झारखंड राज्य में फिलहाल ऐसी तकनीक उपलब्ध नहीं है।

इसके बाद 17 अगस्त 2026 को राज्य सरकार द्वारा दायर शपथपत्र में खुलासा किया गया कि यह मामला अंतर-राज्यीय मानव तस्करी से जुड़ा हो सकता है, क्योंकि डिजिटल आईपी गतिविधियों के तार दिल्ली, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल से जुड़े पाए गए हैं। इसके अलावा, मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक और गूगल एलएलसी जैसी विदेशी कंपनियों से पुराने डिजिटल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और आईपी डिटेल रिकॉर्ड (आईपीडीआर) प्राप्त करने के लिए म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी (एमएलएटी) जैसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रियाओं की जरूरत है।

राज्य के महाधिवक्ता रोहिताश्व रॉय ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार को जांच सीबीआई को सौंपे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सहमति मामले की जटिलताओं के कारण एक प्रशासनिक व परिचालन संबंधी आवश्यकता है, न कि राज्य पुलिस की विफलता की स्वीकारोक्ति। वहीं सीबीआई की ओर से पेश असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया (एएसजीआई) प्रशांत पल्लव ने भी निर्देश प्राप्त कर बताया कि केंद्रीय एजेंसी को जांच संभालने में कोई आपत्ति नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जांच स्थानांतरित करने के अधिकार क्षेत्र का परीक्षण किया। पीठ ने दोहराया कि संवैधानिक अदालतों के पास व्यापक अधिकार हैं, लेकिन इस असाधारण शक्ति का प्रयोग अत्यधिक सावधानी और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, जहां अंतर-राज्यीय जटिलताओं के समाधान के लिए केंद्रीय एजेंसी की विशेषज्ञता जरूरी हो।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा पश्चिम बंगाल राज्य बनाम कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (2010) 3 एससीसी 571 में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

“70. मामले को समाप्त करने से पहले, हम इस बात पर बल देना आवश्यक समझते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 द्वारा प्रदत्त व्यापक शक्तियों के बावजूद, कोई भी आदेश पारित करते समय अदालतों को इन संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग पर कुछ स्व-आरोपित सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए। उक्त अनुच्छेदों के तहत शक्ति की व्यापकता के कारण ही इसके प्रयोग में अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। जहां तक सीबीआई को किसी मामले की जांच करने का निर्देश जारी करने का प्रश्न है, यद्यपि यह तय करने के लिए कोई कठोर दिशा-निर्देश नहीं बनाए जा सकते कि ऐसी शक्ति का प्रयोग कब किया जाना चाहिए, लेकिन बार-बार यह दोहराया गया है कि ऐसा आदेश नियमित रूप से या केवल इसलिए पारित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि किसी पक्ष ने स्थानीय पुलिस के खिलाफ कुछ आरोप लगाए हैं। इस असाधारण शक्ति का प्रयोग बहुत ही संयम, सावधानी और असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए, जहां जांच में विश्वसनीयता और विश्वास पैदा करना आवश्यक हो जाए, या जहां घटना के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव हों, या जहां पूर्ण न्याय करने और मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए ऐसा आदेश आवश्यक हो। अन्यथा सीबीआई मुकदमों की बाढ़ से घिर जाएगी और सीमित संसाधनों के कारण गंभीर मामलों की भी ठीक से जांच करना उसके लिए कठिन हो जाएगा, जिससे असंतोषजनक जांच के कारण उसकी विश्वसनीयता और उद्देश्य प्रभावित होंगे।”

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अनुच्छेद 21 केवल आरोपी के अधिकारों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीड़ित को निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी जांच का मौलिक अधिकार भी प्रदान करता है।

पीठ ने विनय त्यागी बनाम इरशाद अली (2013) 5 एससीसी 762 के निर्णय पर भी भरोसा जताया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:

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“43. इस स्तर पर, हम आपराधिक न्यायशास्त्र के एक अन्य स्थापित सिद्धांत का भी उल्लेख कर सकते हैं कि वरिष्ठ अदालतों के पास संहिता की धारा 482 या भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ‘आगे की जांच’, ‘नई’ या ‘नए सिरे से’ जांच का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र है। ‘नई’ और ‘नए सिरे से’ जांच समानार्थी अभिव्यक्तियां हैं और कानून में उनका परिणाम समान होगा। यदि न्याय के हित में आवश्यक हो, तो वरिष्ठ अदालतों के पास जांच को एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को स्थानांतरित करने की शक्ति भी निहित है। स्वाभाविक रूप से, यह भी एक स्थापित सिद्धांत है कि इस शक्ति का प्रयोग वरिष्ठ अदालतों द्वारा बहुत संयम और अत्यधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।”

इसी सिद्धांत को पुष्ट करते हुए कोर्ट ने धर्मपाल बनाम हरियाणा राज्य (2016) 4 एससीसी 160 का उल्लेख किया:

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“24. यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि संवैधानिक अदालतें किसी अन्य जांच एजेंसी द्वारा आगे की जांच या पुनः जांच का निर्देश दे सकती हैं। इसका उद्देश्य निष्पक्ष जांच और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना है। निष्पक्ष जांच के बिना निष्पक्ष सुनवाई अत्यंत कठिन हो सकती है। हम पूरी तरह से सजग हैं कि किसी अन्य एजेंसी द्वारा आगे की जांच का निर्देश बहुत ही संयम से दिया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले के तथ्य हमें उक्त शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करते हैं। हमारा मानना है कि न्याय का उद्देश्य यह मांग करता है कि मृतका के पति यानी पीड़ित के पक्ष को न्याय मिले ताकि न्याय का हनन रोका जा सके। अतः इस मामले में मुकदमे का चरण निर्णायक कारक नहीं हो सकता।”

हाईकोर्ट का निर्णय

इन कानूनी सिद्धांतों के आधार पर जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद ने माना कि ऐसे संवेदनशील मामलों में समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। चूंकि इस मामले में कई राज्यों से जुड़े डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं, मानव तस्करी की प्रबल आशंका है और उन्नत फोरेंसिक तकनीकें राज्य पुलिस के पास उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए जांच सीबीआई को सौंपा जाना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. पिंडराजोरा थाना कांड संख्या 161/2020 की जांच तत्काल प्रभाव से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जाती है।
  2. सीआईडी, झारखंड के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) को निर्देश दिया जाता है कि वे मामले से संबंधित सभी रिकॉर्ड तत्काल सीबीआई के संयुक्त निदेशक (पूर्वी क्षेत्र), रांची को सौंपें।
  3. सीबीआई निदेशक जांच की प्रगति की समय-समय पर समीक्षा कर निगरानी सुनिश्चित करेंगे।
  4. सीआईडी और राज्य प्रशासन सीबीआई को पूर्ण और बिना शर्त सहयोग प्रदान करेंगे।
  5. सीबीआई अगली सुनवाई की तिथि पर या उससे पहले जांच में हुई प्रगति के संबंध में शपथपत्र दाखिल करेगी।

अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मीडिया में साक्षात्कार देकर इस विषय को अनावश्यक प्रचारित न करने की भी हिदायत दी। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।

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