कर्नाटक हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण शामिल हैं, ने माना है कि पति-पत्नी का एक ही मकान में अलग-अलग कमरों में रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जब इस व्यवस्था को लंबे समय से चले आ रहे विवादों, भावनात्मक उपेक्षा, स्वीकार किए गए व्यसनों और विफल सुलह के प्रयासों के साथ देखा जाता है, तो इसका सामूहिक प्रभाव हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता को स्थापित करता है। इन टिप्पणियों के साथ, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ पति की याचिका खारिज कर दी, जिसमें पत्नी को तलाक की मंजूरी दी गई थी और पति को 25,000 रुपये प्रति माह स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
दंपति का विवाह 11 नवंबर 2001 को चित्रपुर मठ, चामराजपेट, बेंगलुरु में संपन्न हुआ था और इस विवाह से उनके दो बच्चे हैं। पत्नी ने प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, बेंगलुरु के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत विवाह विच्छेद की याचिका दायर की थी। पत्नी का तर्क था कि शादी के बाद पति ने उसके साथ शारीरिक, मौखिक और भावनात्मक क्रूरता की, अत्यधिक शक्की और अधिकार जताने वाला रवैया अपनाया और उसे उसके परिवार तथा रिश्तेदारों से दूर कर दिया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति शराब, गुटखा/तंबाकू और सिगरेट पीने का आदी था, और उसके आदतों को सुधारने के प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला।
पत्नी के अनुसार, हालांकि दोनों कुछ समय तक एक ही इमारत में रहते रहे, लेकिन वे अलग-अलग कमरों में रहकर व्यावहारिक रूप से अलग जीवन जी रहे थे। अंततः वह बच्चों के साथ वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर हो गई। उसने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498-ए के तहत पति और उसके परिवार के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्रवाई को परिवार के सदस्यों के हस्तक्षेप और पति द्वारा अपने आचरण में सुधार के आश्वासन के बाद वापस ले लिया गया था। उसने पति द्वारा धारा 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत दायर एक पुरानी वैवाहिक याचिका का भी हवाला दिया, जिसे तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचाया गया था, और उसके बाद दोबारा साथ रहने का प्रयास भी विफल रहा था।
फैमिली कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक की डिग्री मंजूर की और पति को याचिका की तारीख से 25,000 रुपये प्रति माह स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। इस फैसले से व्यथित होकर पति ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 19(1) के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की।
पक्षकारों के तर्क
पति के वकील एस.जी. मुनिसवामी गौड़ा ने तर्क दिया कि क्रूरता के आरोप झूठे, अतिरंजित और साक्ष्यों के बिना हैं। उन्होंने कहा कि पत्नी अपने परिवार के सदस्यों के प्रभाव में थी, अक्सर विवाद करती थी और आपराधिक शिकायतों की धमकी देती थी। पति ने स्वीकार किया कि वह कभी-कभी शराब, गुटखा और सिगरेट का सेवन करता था, लेकिन इस बात से इनकार किया कि वह इनका आदी था या इनसे वैवाहिक कलह हुई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चूंकि धारा 498-ए के तहत आपराधिक कार्यवाही वापस ले ली गई थी, इसलिए इसे शुरू करना ही पति के खिलाफ क्रूरता माना जाना चाहिए। इसके अलावा, पति का कहना था कि याचिका केवल धारा 13(1)(ia) के तहत दायर की गई थी, इसलिए कोर्ट परित्यक्तता (डिजर्शन) या विवाह के अपूरणीय टूटने के आधार पर फैसला नहीं दे सकता। गुजारे भत्ते पर उन्होंने कहा कि पत्नी खुद कमाती है और उसने अपनी आय का खुलासा नहीं किया है।
पत्नी के वकील स्वरूप एस. ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन किया और कहा कि पति के निरंतर आचरण, उपेक्षा और व्यसनों ने मानसिक क्रूरता का माहौल बनाया, जिससे साथ रहना असंभव हो गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
मौखिक निर्णय सुनाते हुए पीठ ने जांच की कि क्या पति का समग्र आचरण हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।
एक ही मकान में अलग कमरों में रहने के पहलू पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
केवल अपने आप में ऐसा इंतजाम क्रूरता नहीं माना जा सकता। महज इस तथ्य से कि पति-पत्नी अलग-अलग कमरों में रहते हैं, बिना किसी अन्य बात के, क्रूरता के निष्कर्ष को सही नहीं ठहराया जा सकता। प्रासंगिक यह है कि वे आसपास की परिस्थितियां क्या थीं जिनमें ऐसा अलगाव हुआ और वैवाहिक संबंध किस प्रकार आगे बढ़े।
अदालत ने कहा कि इस परिस्थिति को अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह बार-बार के विवादों, दुर्व्यवहार, अलगाव, पुरानी अदालती कार्यवाहियों और विफल सुलह के प्रयासों से भरे लंबे इतिहास का हिस्सा है।
पति के इस तर्क को खारिज करते हुए कि धारा 498-ए की शिकायत दर्ज कराना उसके खिलाफ क्रूरता थी, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
एक जीवनसाथी द्वारा दूसरे के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराना हर मामले में वैवाहिक क्रूरता नहीं होता। इसी तरह, आपराधिक कार्रवाई में बरी हो जाने से ही यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण थी। आपराधिक कार्यवाही और वैवाहिक कार्यवाही अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं, और उनमें लागू होने वाले सबूतों का मानक भी अलग होता है।
वैवाहिक क्रूरता को साबित करने के कानूनी मानक पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“क्रूरता” मूलतः तथ्य और मात्रा का प्रश्न है। ऐसा कोई निश्चित फॉर्मूला नहीं हो सकता जिसके द्वारा हर वैवाहिक विवाद को क्रूरता के रूप में वर्गीकृत किया जा सके। साथ ही, किसी जीवनसाथी से अनिश्चित काल के लिए ऐसे आचरण को सहन करने की उम्मीद नहीं की जा सकती जो निरंतर मानसिक पीड़ा का कारण बनता हो और साहचर्य, विश्वास व वैवाहिक सुरक्षा के बुनियादी तत्वों को नष्ट करता हो।
स्थायी गुजारा भत्ते की चुनौती पर विचार करते हुए पीठ ने पाया कि मार्च 2025 के वेतन रिकॉर्ड के अनुसार पति का सकल मासिक वेतन 4,13,922.01 रुपये और शुद्ध वेतन 2,77,207 रुपये है। हालांकि पत्नी एक प्री-स्कूल में काम करके लगभग 24,000 रुपये प्रति माह कमाती है, पीठ ने निर्णय दिया:
केवल इस तथ्य से कि प्रतिवादी आय अर्जित कर रही है, वह स्थायी गुजारा भत्ता पाने से वंचित नहीं हो जाती।
अदालत ने माना कि पक्षकारों के स्तर, जीवन स्तर और बच्चों की शैक्षणिक व चिकित्सा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए 25,000 रुपये प्रति माह का आदेश न तो मनमाना है और न ही अत्यधिक।
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने पति की अपील को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट, बेंगलुरु के 11 अगस्त 2025 के फैसले और डिग्री को बरकरार रखा। पीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत विवाह विच्छेद के साथ-साथ याचिका की तिथि से 25,000 रुपये प्रति माह स्थायी गुजारा भत्ता देने के निर्देश की पुष्टि की।

