आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के प्रावधानों के तहत लोक अदालत द्वारा पारित अवार्ड केवल समझौते से जुड़े पक्षों पर ही बाध्यकारी होता है। कोर्ट ने माना कि किसी भी तीसरे पक्ष या बाहरी व्यक्ति को ऐसे फैसले को चुनौती देने का अधिकार (locus standi) नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी, गलत बयानी और मिलीभगत का आरोप लगाते हुए लोक अदालत के एक फैसले को रद्द करने की मांग वाली दो व्यक्तियों की रिट याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि स्वतंत्र दीवानी कार्यवाहियों में तीसरे पक्षों के अधिकारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद थंबल्लापल्ले, चित्तूर जिले के जूनियर सिविल जज कोर्ट में दर्ज एक दीवानी मुकदमे (O.S. No. 145 of 2023) से शुरू हुआ था। यह मुकदमा के. वेमनारायण (प्रतिवादी संख्या 2) ने ए. सुकांति (प्रतिवादी संख्या 3) के खिलाफ 7 मार्च 2020 के बिक्री समझौते के विशिष्ट निष्पादन (specific performance) की मांग करते हुए दायर किया था। बाद में इस मुकदमे को थंबल्लापल्ले स्थित लोक अदालत पीठ के समक्ष भेजा गया, जहां 9 सितंबर 2023 को लोक अदालत अवार्ड संख्या 36/2023 के जरिए इसका निपटारा कर दिया गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता के. एन. बालनंदा रेड्डी और गोविंदू भास्कर रेड्डी ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में एक रिट याचिका (सर्टिओरारी) दायर कर इस फैसले को रद्द करने और संबंधित रिकॉर्ड तलब करने की मांग की। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने इसी संपत्ति के संबंध में 27 अगस्त 2018 के बिक्री समझौते के निष्पादन के लिए मदनपल्ले के प्रधान वरिष्ठ सिविल जज की अदालत में O.S. No. 43 of 2022 पहले से दायर कर रखा था। इसके अलावा, प्रतिवादी संख्या 3 ने भी उसी संपत्ति पर मालिकाना हक की घोषणा के लिए मदनपल्ले के वरिष्ठ सिविल जज के समक्ष O.S. No. 70 of 2021 दायर किया था, जिसमें याचिकाकर्ता संख्या 2 को प्रतिवादी संख्या 11 बनाया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि सभी मुकदमों में विवादित संपत्ति एक ही है, इसलिए लोक अदालत के फैसले से उनके अधिकारों और हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील टी. वी. जग्गी रेड्डी ने तर्क दिया कि भले ही याचिकाकर्ता मूल मुकदमे (O.S. No. 145 of 2023) या लोक अदालत की कार्यवाही में शामिल नहीं थे, लेकिन दूसरे और तीसरे प्रतिवादी के बीच हुए समझौते का असर उसी संपत्ति से जुड़े लंबित मुकदमों में याचिकाकर्ताओं के अधिकारों पर पड़ेगा।
दूसरी ओर, लोक अदालत पीठ (प्रतिवादी संख्या 1) का पक्ष रखते हुए वकील के. लक्ष्मी नारायण रेड्डी ने कहा कि याचिकाकर्ता न तो मूल मुकदमे में पक्षकार थे और न ही लोक अदालत के फैसले में। उन्होंने तर्क दिया कि किसी तीसरे पक्ष को लोक अदालत के अवार्ड को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह फैसला केवल समझौता करने वाले पक्षों और उनके कानूनी प्रतिनिधियों पर ही लागू होता है। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने वडिगा आमोस बनाम वडिगा अंजिनेयुलु और अन्य मामले में खंडपीठ के फैसले का हवाला दिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
मामले के रिकॉर्ड और दलीलों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता O.S. No. 145 of 2023 और 9 सितंबर 2023 के लोक अदालत फैसले में पक्षकार नहीं थे। खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत यह सिद्ध सिद्धांत है कि लोक अदालत का फैसला केवल उसमें शामिल पक्षों पर ही बाध्यकारी होता है और यह किसी तीसरे पक्ष को प्रभावित नहीं कर सकता।
वडिगा आमोस बनाम वडिगा अंजिनेयुलु और अन्य के फैसले का हवाला देते हुए—जिसमें श्री दुर्गा मल्लेश्वरा एजुकेशनल सोसाइटी (रजिस्टर्ड), विजयवाड़ा बनाम डीएलएसए (लोक अदालत) के पूर्व निर्णय का उल्लेख था—हाईकोर्ट ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को उद्धृत किया:
“लोक अदालत में पारित अवार्ड को संविधान के अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका के माध्यम से केवल समझौते के पक्षों द्वारा ही चुनौती दी जा सकती है, किसी अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं, और वह भी बहुत सीमित आधारों पर, जैसे बिना किसी समझौते के अवार्ड पारित किया जाना या यह कि समझौता या समझौता स्वयं धोखाधड़ी या गलत बयानी से दूषित है।“
याचिकाकर्ताओं की इस चिंता पर कि लोक अदालत के फैसले से लंबित मुकदमों में उनके दावे पर बुरा असर पड़ेगा, हाईकोर्ट ने कहा कि यह आशंका पूरी तरह से निराधार है। पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि याचिकाकर्ता लोक अदालत के फैसले में पक्षकार नहीं हैं, इसलिए वे तब तक इससे बंधे नहीं हैं जब तक कि वे समझौता करने वाले पक्षों के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में अधिकार का दावा न कर रहे हों। कोर्ट ने कहा कि इस पहलू का मूल्यांकन लंबित दीवानी मुकदमों में किया जा सकता है और उन मुकदमों का निपटारा कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।
कोर्ट का निर्णय
यह मानते हुए कि लोक अदालत के फैसले से अनजान तीसरे पक्षों द्वारा दायर रिट याचिका चलने योग्य (maintainable) नहीं है, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को ख़ारिज कर दिया। पीठ ने लागत का कोई आदेश नहीं दिया और निर्देश दिया कि लंबित विविध याचिकाओं को भी बंद कर दिया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: के. एन. बालनंदा रेड्डी और एक अन्य बनाम लोक अदालत बेंच, थंबल्लापल्ले और अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 21216/2026 पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी निर्णय की तिथि: 30 जुलाई 2026

