इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), लखनऊ की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीतू सिंह के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में कर्मचारी के भाग न लेने मात्र से जांच समिति को अनिवार्य प्रक्रियात्मक नियमों का पालन करने से छूट नहीं मिलती और न ही मौखिक साक्ष्यों के माध्यम से गवाहों का परीक्षण कराए बिना केवल दस्तावेजों के आधार पर आरोपों को साबित माना जा सकता है। जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता को सभी आनुषंगिक लाभों और बकाया वेतन के साथ पुनर्रहाली का आदेश दिया। कोर्ट ने मामले को आरोप-पत्र का जवाब दाखिल करने के चरण में वापस भेजते हुए केजीएमयू को प्रक्रिया जारी रखने का अधिकार दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च विभाग की मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लैब में एसोसिएट प्रोफेसर (गैर-चिकित्सकीय) के पद पर नियुक्त किया गया था। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) को “उत्तर प्रदेश राज्य में गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबिनोपैथी की जेनेटिक स्क्रीनिंग” शीर्षक से एक परियोजना प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। 25 मार्च 2019 को एनएचएम ने इस परियोजना के लिए 385 लाख रुपये स्वीकृत किए और याचिकाकर्ता को नोडल अधिकारी नामित किया।
विवाद 8 मई 2019 को तब शुरू हुआ जब पैथोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. आशुतोष कुमार ने एक गोपनीय रिपोर्ट प्रस्तुत कर आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता का प्रस्ताव एक अन्य संकाय सदस्य डॉ. नीतू निगम द्वारा जमा किए गए प्रस्ताव के समान था, जो बौद्धिक संपदा अधिकारों की चोरी और साहित्यिक चोरी (प्लेगियरिज़्म) की ओर इशारा करता है। इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने आरोपों का खंडन किया और बाद में डॉ. आशुतोष कुमार और डॉ. नीतू निगम को मानहानि का कानूनी नोटिस भेजा।
विभागीय कार्रवाई की सिफारिश करने वाली 31 अगस्त 2019 की सतर्कता रिपोर्ट के बाद, केजीएमयू ने 1 जनवरी 2020 को याचिकाकर्ता को आरोप-पत्र जारी किया, जिसमें चार आरोप शामिल थे। इसमें केजीएमयू प्रथम परिनियमावली, 2011 की धारा 41(डी) और नियम 10.07(3) तथा उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के तहत अनुशासनहीनता, बौद्धिक संपदा अधिकार चुराने का प्रयास, कानूनी नोटिस भेजकर अनधिकृत दबाव बनाने और शैक्षणिक माहौल खराब करने के आरोप लगाए गए।
केजीएमयू ने आरोपों की जांच के लिए छह सदस्यीय अनुशासन समिति का गठन किया, जिसमें हाईकोर्ट के दो सेवानिवृत्त जज भी शामिल थे। 10 जनवरी 2020 को अपने अंतरिम जवाब में याचिकाकर्ता ने आरोपों से इनकार किया, आवश्यक दस्तावेजों की मांग की, मुख्य व्यक्तियों से जिरह की अनुमति मांगी और कानूनी सहायता की गुहार लगाई। अनुशासन समिति ने 6 फरवरी 2020 को यह तर्क देते हुए कानूनी सहायता की मांग खारिज कर दी कि विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व कोई वकील नहीं कर रहा है। जांच समिति में दो सेवानिवृत्त जजों की उपस्थिति और दस्तावेज न मिलने के कारण याचिकाकर्ता ने समिति के समक्ष उपस्थित होना बंद कर दिया।
11 मार्च 2020 को अनुशासन समिति ने मौखिक गवाहों की जांच किए बिना एकतरफा जांच रिपोर्ट सौंप दी, जिसमें सभी आरोपों को सिद्ध माना गया। इस रिपोर्ट के आधार पर केजीएमयू की कार्यकारी परिषद ने 8 जून 2020 को प्रस्ताव पारित कर 9/10 जून 2020 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गौरव मेहरोत्रा ने अधिवक्ता श्री उत्सव मिश्रा, सुश्री अलीना मसूदी, सुश्री सुरभि पांडे, श्री बजरंगी लाल मिश्रा और श्री आनंद मणि त्रिपाठी के साथ तर्क दिया कि अनुशासन समिति उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के नियम 7 का पालन करने में विफल रही। उन्होंने कहा कि एकतरफा जांच में भी साबित करने का दायित्व नियोक्ता पर होता है और दस्तावेजी साक्ष्यों को मौखिक गवाहों के माध्यम से सिद्ध किया जाना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम सरोज कुमार सिन्हा, सत्येंद्र सिंह बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश, और जय प्रकाश सैनी बनाम मैनेजिंग डायरेक्टर, यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड पर भरोसा जताया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आरोप अस्पष्ट थे और सेवानिवृत्त जजों वाली समिति के सामने कानूनी सहायता न देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, जिसके लिए जे.के. अग्रवाल बनाम हरियाणा सीड्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, रमेश चंद्र बनाम दिल्ली यूनिवर्सिटी, और डॉ. अमोद कुमार सचान बनाम स्टेट ऑफ यूपी का हवाला दिया गया।
दूसरी ओर, केजीएमयू की ओर से डॉ. एल.पी. मिश्रा ने अधिवक्ता श्री शुभम त्रिपाठी, श्री इनामउद्दीन अहमद, श्री अभिनव त्रिवेदी और श्री समीर कालिया के साथ दलील दी कि याचिकाकर्ता ने कई अवसर मिलने के बावजूद जानबूझकर जांच कार्यवाही का बहिष्कार किया। उन्होंने कहा कि एनएचएम को सीधे प्रस्ताव भेजना भारतीय चिकित्सा परिषद नियमावली, 2002 के नियम 7.22 के तहत बने आईसीएमआर के अनिवार्य नैतिक समीक्षा दिशानिर्देशों का उल्लंघन था। केजीएमयू की लीगल टीम ने कहा कि सभी दस्तावेज कुलसचिव द्वारा सत्यापित किए गए थे और जो कर्मचारी जानबूझकर सहयोग नहीं करता, वह प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकता। उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया बनाम अपूर्व कुमार साहा, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम नरेंद्र कुमार पांडे, और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम ए.जी.डी. रेड्डी का हवाला दिया।
राज्य (प्रतिवादी संख्या 1) का प्रतिनिधित्व अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता श्री प्रदीप कुमार सिंह ने किया, जबकि प्रतिवादी संख्या 6 की ओर से अधिवक्ता श्री कुमार आयुष उपस्थित हुए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और मुख्य निष्कर्ष
जांच रिपोर्ट और निर्णय लेने की प्रक्रिया का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि आरोप-पत्र अस्पष्ट था और जांच समिति आरोपों को साबित करने के लिए साक्ष्य दर्ज करने में विफल रही।
कोर्ट ने कहा: “जांच रिपोर्ट के अवलोकन से पता चलता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए चार आरोपों को साबित करने के लिए जिन साक्ष्यों पर भरोसा करने का प्रस्ताव था, उनमें से किसी भी साक्ष्य को कभी भी जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।”
एकतरफा कार्यवाही के दौरान दस्तावेजों को साबित करने के लिए मौखिक साक्ष्य की पूर्ण अनुपस्थिति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा: “निष्कर्ष निकालते समय, याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने और उन्हें साक्ष्य के रूप में साबित करने के लिए कोई मौखिक साक्ष्य दर्ज नहीं किया गया।”
जांच पैनल में दो सेवानिवृत्त जजों की उपस्थिति के बावजूद कानूनी सहायता न देने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा: “चूंकि दो पूर्व जज जांच समिति का हिस्सा थे, इसलिए याचिकाकर्ता का, जिसका कोई कानूनी पृष्ठभूमि नहीं थी, कानूनी सहायता मांगना पूरी तरह से उचित था। ऐसे में 06.02.2020 की बैठक में जांच समिति द्वारा कानूनी रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति के माध्यम से प्रतिनिधित्व देने से इनकार करना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता और यह प्रथम दृष्टया मनमाना है।”
केजीएमयू के इस तर्क को खारिज करते हुए कि याचिकाकर्ता की गैर-मौजूदगी से प्रक्रियात्मक खामियां खत्म हो जाती हैं, कोर्ट ने स्पष्ट किया: “डॉ. एल. पी. मिश्रा की इस दलील को खारिज किया जाता है कि कर्मचारी के हिस्सा न लेने से वह कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन उठाने का अधिकार खो देती है, क्योंकि भले ही याचिकाकर्ता ने उत्तर दाखिल न किया हो, फिर भी उसके अंतरिम उत्तर को दोष स्वीकार करना नहीं माना जा सकता। यह जांच समिति का दायित्व था कि वह कानून, विशेष रूप से अनुशासन और अपील नियमों के नियम 7 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार जांच पूरी करती।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बर्खास्तगी का आदेश गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियों और मनमानेपन से ग्रस्त था: “उपरोक्त कारणों को ध्यान में रखते हुए, इस अदालत को यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई पूरी कार्यवाही और बर्खास्तगी का आदेश मनमानेपन, निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन से ग्रस्त है।”
“बर्खास्तगी आदेश दिनांक 10/09-06-2020 तक की निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और नियमों के विपरीत है, इसलिए इसे बनाए नहीं रखा जा सकता और इसे रद्द किया जाता है।”
हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 10 जून 2020 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। मामले को आरोप-पत्र का जवाब दाखिल करने के चरण में वापस भेज दिया गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि पुनर्गठित जांच समिति में कानूनी विशेषज्ञता वाला कोई सदस्य शामिल होता है, तो याचिकाकर्ता को कानूनी सहायता लेने की अनुमति दी जानी चाहिए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डॉ. नीतू सिंह बनाम स्टेट ऑफ यूपी थ्रू प्रिंस. सेकी. मेडिकल एजुकेशन एंड अदर्श
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 11046 ऑफ 2020
पीठ: जस्टिस पंकज भाटिया
निर्णय की तिथि: 25 अगस्त 2026

