लक्ष्मी योजना: सांसद-विधायक की सिफारिश की शर्त पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, सरकार से 10 दिनों में मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी लक्ष्मी योजना के तहत वित्तीय सहायता पाने के लिए स्थानीय सांसद या विधायक की सिफारिश अनिवार्य किए जाने पर सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को 10 दिनों के भीतर हलफनामा दायर कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि लाभार्थियों के लिए राजनीतिक जनप्रतिनिधियों का समर्थन पत्र मांगने के पीछे उसका क्या विशिष्ट उद्देश्य है।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जन कल्याणकारी योजनाओं के लाभ को जनप्रतिनिधियों से व्यक्तिगत संपर्क से जोड़ना योजना को मनमाना बना सकता है। पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की पहुंच किसी सांसद या विधायक तक नहीं है और इस वजह से केवल एक भी पात्र महिला लाभ से वंचित रह जाती है, तो यह शर्त पूरी तरह से अनुचित और तर्कहीन मानी जाएगी। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पात्र लाभार्थियों के सत्यापन के लिए प्रशासनिक स्तर पर अन्य कई तरीके उपलब्ध हैं।

19 अगस्त को हाईकोर्ट द्वारा पहली बार स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद, यह लगातार दूसरा मौका है जब अदालत ने इस प्रावधान के औचित्य पर सरकार से जवाब मांगा है।

सरकार का पक्ष और अन्य राज्यों की परिपाटी

अदालत की पूछताछ के जवाब में दिल्ली सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल सॉसिरिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि सरकार अपना विस्तृत रुख अदालत के समक्ष पेश करेगी। उन्होंने कहा कि आगामी हलफनामे में इस शर्त को शामिल करने के पीछे राज्य मंत्रिमंडल के आंतरिक तर्कों का विवरण दिया जाएगा। इसके साथ ही अन्य राज्यों में चल रही ऐसी ही कल्याणकारी योजनाओं के संचालन मॉडलों का भी ब्योरा प्रस्तुत किया जाएगा।

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जनहित याचिका में राजनीतिक संरक्षण का आरोप

अदालत में यह मामला पूर्व कांग्रेस नगर पार्षद अभिषेक दत्त और आया नगर वार्ड के मौजूदा पार्षद वेदपाल चौधरी द्वारा संयुक्त रूप से दायर एक जनहित याचिका के तहत पहुंचा है। याचिकाकर्ताओं ने योजना से सांसद-विधायक की सिफारिश वाली शर्त को पूरी तरह हटाने की मांग की है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह नियम राजनीतिक प्रतिनिधियों को असीमित और अनियंत्रित अधिकार देता है, जिससे जनता का संवैधानिक कल्याणकारी अधिकार राजनीतिक संरक्षण के साधन में तब्दील हो जाता है। इसके अलावा, याचिका में यह भी उजागर किया गया है कि सरकार ने जनप्रतिनिधियों द्वारा इन सिफारिश पत्रों को जारी करने या खारिज करने के लिए कोई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी), वैधानिक दिशानिर्देश या प्रशासनिक ढांचा तय नहीं किया है। किसी स्पष्ट प्रक्रिया के अभाव में आवेदन करने वाली महिलाओं को अपने आवेदनों की स्थिति के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिल पाती।

योजना की शर्तें और जमीनी समस्याएं

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दिल्ली सरकार ने 1 अगस्त को लक्ष्मी योजना की शुरुआत की थी, जिसके तहत पात्र महिला निवासियों को प्रति माह 2,500 रुपये की सीधी वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है। इस योजना का लाभ लेने के लिए सांसद या विधायक की सिफारिश के अलावा कुछ अन्य कड़े मानदंड भी रखे गए हैं। इनमें दिल्ली में लगातार 10 वर्षों का निवास या डोमिसाइल प्रमाण पत्र होना, परिवार में तीन से अधिक जीवित बच्चे न होना और कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होना शामिल है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत का ध्यान अनधिकृत बस्तियों और वंचित कॉलोनियों में रहने वाली महिलाओं की व्यावहारिक समस्याओं की ओर भी आकर्षित किया। याचिका के अनुसार, इन क्षेत्रों की महिलाओं के लिए जनप्रतिनिधियों के कार्यालय काफी दूरी पर स्थित हैं और वहां तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन की उचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सिफारिश पत्र हासिल करने के चक्कर में इन गरीब महिलाओं का समय और पैसा दोनों नष्ट होता है, जिससे उनके दैनिक रोजगार और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर बुरा असर पड़ता है।

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