इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस मंजू रानी चौहान की पीठ ने स्पष्ट किया है कि 1 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण 2 जुलाई को पदभार ग्रहण करने वाले सहायक अध्यापकों को उनके वार्षिक इंक्रीमेंट से वंचित नहीं किया जा सकता। ‘सीमा राय व 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य’ से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने माना कि केवल एक दिन के सार्वजनिक अवकाश के कारण हुई देरी से सेवा लाभों की गणना की मूल तिथि में बदलाव नहीं होता और न ही इससे सेवा की निरंतरता प्रभावित होती है।
मामले की पृष्ठभूमि
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली, 1981 और उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अध्यापक तैनाती नियमावली, 2008 के तहत बेसिक शिक्षा अधिकारी, पीलीभीत द्वारा 28 जून 2016 को याचिकाकर्ताओं को सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया था। 1 जुलाई 2016 को रमजान के अंतिम शुक्रवार (जमात-उल-विदा) के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित होने के कारण याचिकाकर्ता उस दिन पदभार ग्रहण नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने 2 जुलाई 2016 को अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट प्रस्तुत की।
नियुक्ति के समय छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत 27 फरवरी 2009 का शासनादेश लागू था। बाद में राज्य सरकार ने 22 दिसंबर 2016 को नया शासनादेश जारी कर 1 जनवरी 2016 से भूतलक्षी (रैट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से सातवें वेतन आयोग के अनुसार वेतनमान संशोधित कर दिया।
शासनादेश दिनांक 22 दिसंबर 2016 के पैरा 8(2) में वार्षिक वेतनवृद्धि की दो तिथियां निर्धारित की गईं: 1 जनवरी और 1 जुलाई। इसके अनुसार, 2 जनवरी से 1 जुलाई के बीच नियुक्त या प्रोन्नत होने वाले कर्मचारियों को 1 जनवरी को और 2 जुलाई से 1 जनवरी के बीच नियुक्त कर्मचारियों को 1 जुलाई को इंक्रीमेंट देने का प्रावधान किया गया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि उनका नियुक्ति आदेश 28 जून 2016 का था और 1 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण वे 2 जुलाई को जॉइन कर सके, इसलिए वे 1 जनवरी 2017 से प्रथम वार्षिक इंक्रीमेंट के हकदार थे। हालांकि, प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें 1 जुलाई 2017 से इंक्रीमेंट प्रदान किया।
बेसिक शिक्षा परिषद के वित्त नियंत्रक द्वारा 20 नवंबर 2025 को स्थिति स्पष्ट करने और शिक्षा निदेशक (बेसिक) द्वारा 21 नवंबर 2025 को पत्र जारी करने के बावजूद (जो विनोद कुमार व 75 अन्य बनाम यूपी राज्य मामले में दिए गए आदेश के अनुपालन में था), याचिकाकर्ताओं के वेतन का पुननिर्धारण नहीं किया गया, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि सभी याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति तिथि 28 जून 2016 है, जो 2 जनवरी से 1 जुलाई की अवधि के भीतर आती है। इसके अलावा, 17 अगस्त 2009 के शासनादेश का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि कोई कर्मचारी रविवार या राजपत्रित अवकाश के कारण कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाता और अगले कार्य दिवस पर जॉइन करता है, तो मध्यवर्ती अवकाश से उसके इंक्रीमेंट की गणना पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख फैसलों का भी संदर्भ दिया गया:
- मैसर्स ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम्स, बॉम्बे (2002): जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कानून के प्रावधानों को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिए और किसी भी शब्द को निरर्थक या अतिरिक्त नहीं माना जा सकता।
- पद्मा सुंदरा राव बनाम तमिलनाडु राज्य (2002): जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतें कानून में अपनी ओर से शब्द नहीं जोड़ सकतीं और न ही उन बातों को पढ़ सकती हैं जो विधायिका ने प्रदान नहीं की हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के स्थाई अधिवक्ता ने तर्क दिया कि नियुक्ति आदेशों के तहत यह नियुक्तियां एक वर्ष की परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के लिए थीं और वास्तविक कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से ही प्रभावी मानी जाती हैं। चूंकि याचिकाकर्ताओं ने 2 जुलाई 2016 को कार्यभार ग्रहण किया था, इसलिए उनकी सेवा 2 जुलाई से 1 जनवरी की अवधि में आती है। अतः सरकार के अनुसार, 1 जुलाई 2017 से इंक्रीमेंट देना नियमसंगत था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में माना कि इस विवाद का हल केवल वास्तविक भौतिक जॉइनिंग की तिथि को एकमात्र मानदंड मानकर नहीं निकाला जा सकता। नियुक्ति आदेशों, प्रशासनिक निर्देशों और वैधानिक ढांचे के सामंजस्यपूर्ण अध्ययन पर जोर देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अभ्यर्थी को प्रशासनिक अवकाश के लिए दंडित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
“नियुक्ति की तिथि और कार्यभार ग्रहण करने की तिथि के बीच का अंतर, विशेष रूप से तब जब सार्वजनिक अवकाश या प्रशासन से जुड़ी परिस्थितियों के कारण अभ्यर्थी को अगले दिन कार्यभार ग्रहण करने से रोका गया हो, निर्णायक महत्व रखता है।”
“प्रशासनिक निर्देशों की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि किसी अभ्यर्थी को ऐसी घटना के लिए अकारण नुकसान उठाना पड़े जो उसके कारण नहीं हुई और न ही उसके नियंत्रण में थी।”
“इंक्रीमेंट कोई दान या बख्शीश नहीं है जिसे नियोक्ता अपनी इच्छा से दे; यह लागू सेवा नियमों और सरकारी आदेशों द्वारा विनियमित एक सेवा लाभ है।”
“केवल एक दिन का अंतर, जो विशेष रूप से सार्वजनिक अवकाश के कारण हुआ है, सेवा लाभों की गणना की मूल तिथि को तब तक नहीं बदल सकता जब तक कि संबंधित वैधानिक प्रावधान स्पष्ट रूप से ऐसा परिणाम न अनिवार्य करते हों।”
“किसी अभ्यर्थी को ऐसी परिस्थिति के लिए दंडित करने वाली व्याख्या अपनाकर लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता जिसे न तो उन्होंने पैदा किया था और न ही वे उसे टाल सकते थे।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जहां नियुक्ति वैध रूप से हो चुकी हो और बीच का दिन सार्वजनिक अवकाश हो, वहां अगले कार्य दिवस पर जॉइन करने से सेवा की निरंतरता बनी रहती है।
कोर्ट का फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि 1 जुलाई 2016 को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण 2 जुलाई 2016 को कार्यभार ग्रहण करने वाले सहायक अध्यापक अपनी नियुक्ति के क्रम में ही सेवा लाभ प्राप्त करने के हकदार हैं।
“…जहां नियुक्ति वैध रूप से हो चुकी थी, बीच का दिन सार्वजनिक अवकाश था और अभ्यर्थी ने लागू सरकारी आदेशों के अनुसार अगले उपलब्ध कार्य दिवस पर पदभार ग्रहण किया, वहां ऐसा मध्यवर्ती अवकाश सेवा की निरंतरता को समाप्त नहीं कर सकता और न ही अन्यथा स्वीकार्य सेवा लाभ के मिलने को टाल सकता है।”
हाईकोर्ट ने संबंधित सक्षम प्राधिकारी को याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत अभ्यावेदन पर छह सप्ताह के भीतर विचार करने का निर्देश दिया। प्राधिकारी को वैधानिक प्रावधानों, प्रासंगिक शासनादेशों और कोर्ट की टिप्पणियों के प्रकाश में प्रत्येक दावे का परीक्षण कर कारण सहित आदेश पारित करने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सीमा राय व 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य (एवं अन्य संबद्ध मामले)
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 481 / 2026
पीठ: जस्टिस मंजू रानी चौहान
निर्णय की तिथि: 24 अगस्त 2026

