वकालत की डिग्री होना पर्याप्त आय की गारंटी नहीं: तेलंगाना हाईकोर्ट ने महिला वकील का अंतरिम भरण-पोषण बहाल किया

तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक महिला वकील के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए साल 2013 के उस आदेश को बहाल कर दिया है, जिसके तहत उनके पति को प्रतिमाह 20,000 रुपये का अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल वकालत करने की योग्यता होना या बार में नामांकित होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि किसी व्यक्ति के पास अपना खर्च चलाने के लिए पर्याप्त आय उपलब्ध है।

जस्टिस वाकिती रामकृष्ण रेड्डी की एकल पीठ ने महिला की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका और अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए 24 जुलाई 2026 को यह संयुक्त आदेश सुनाया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर 2024 के उस पूर्व आदेश को वापस ले लिया, जिसके जरिए महिला का भरण-पोषण भत्ता रद्द कर दिया गया था। इस फैसले से हैदराबाद की पहली अतिरिक्त पारिवारिक अदालत द्वारा 27 जून 2013 को जारी मूल आदेश पूरी तरह से बहाल हो गया है।

वेतनभोगी नौकरी और स्वतंत्र वकालत में अंतर

अदालत ने सुनवाई के दौरान वेतनभोगी रोजगार और स्वतंत्र कानूनी पेशे के बीच के आर्थिक अंतर को रेखांकित किया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी नौकरीपेशा व्यक्ति का वेतन निश्चित, नियमित और दस्तावेजी प्रमाण के योग्य होता है, जबकि एक स्वतंत्र वकील की कमाई अनिश्चित और परिवर्तनशील होती है।

पीठ ने कहा कि वकालत में आय मुकदमों की संख्या पर निर्भर करती है और इसमें दफ्तर चलाने जैसे कई खर्चे भी शामिल होते हैं। कोर्ट के अनुसार, बार काउंसिल में नामांकन केवल अदालत में पेश होने की योग्यता और अधिकार प्रदान करता है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वकील की वास्तविक आय अपने भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। धारा 24 के तहत मेंटेनेंस का निर्धारण काल्पनिक कमाई की क्षमता के बजाय वास्तविक आय के आधार पर किया जाना चाहिए।

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पुनर्रीक्षण क्षेत्राधिकार की सीमाएं और प्रक्रियात्मक चूक

हाईकोर्ट ने माना कि अक्टूबर 2024 में दिए गए फैसले में महिला की वास्तविक कमाई, उसकी वित्तीय जरूरतों या पति की आय का उचित मूल्यांकन किए बिना केवल उसके वकील होने के आधार पर यह मान लिया गया था कि वह आत्मनिर्भर है।

इसके अलावा, अदालत ने पाया कि पिछला फैसला देते समय हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत द्वारा पहले से आंके गए साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करके अपने रिवीजनल क्षेत्राधिकार की सीमा का उल्लंघन किया था। सुप्रीम कोर्ट के ‘हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दिलबहार सिंह’ मामले के नजीर का हवाला देते हुए जस्टिस रेड्डी ने कहा कि एक रिवीजनल कोर्ट पहले अपीलीय प्राधिकार की तरह काम नहीं कर सकता। पीठ ने यह भी नोट किया कि 2024 के आदेश में भरण-पोषण के सिद्धांतों पर सुप्रीम कोर्ट के 2020 के ‘रजनेश बनाम नेहा’ फैसले का पालन नहीं किया गया था।

बकाया भुगतान और समयसीमा के निर्देश

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पति की सिविल रिवीजन याचिका खारिज होने के साथ ही 2013 में तय अंतरिम भरण-पोषण ढांचा बहाल हो गया है, जिसमें पत्नी के लिए 20,000 रुपये और उनकी दो बेटियों के लिए 15,000-15,000 रुपये प्रतिमाह शामिल हैं। यह व्यवस्था 2010 से लंबित मुख्य वैवाहिक विवाद के अंतिम फैसले तक लागू रहेगी।

अदालत के नए निर्देशों के तहत पति को बकाया राशि, पूर्व में किए गए भुगतान, एक हलफनामा और संपत्ति-देनदारी के ब्योरे के साथ चार सप्ताह के भीतर विस्तृत विवरण दाखिल करना होगा। पत्नी को इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। बकाये का अंतिम निर्धारण होने के बाद पति को आठ सप्ताह के भीतर पूरी राशि चुकानी होगी और मामला सुलझने तक नियमित मासिक भुगतान जारी रखना होगा।

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कोर्ट ने पति द्वारा अब तक जमा कराए गए 32.10 लाख रुपये को उसकी कुल देनदारी में समायोजित कर दिया है। इसमें 6 नवंबर 2025 को दिए गए 12 लाख रुपये और 14 नवंबर 2025 को जमा किए गए 20.10 लाख रुपये शामिल हैं। पुराने आदेश के निरस्त होने के बाद अवमानना याचिका को बिना किसी प्रतिकूल टिप्पणी के बंद कर दिया गया, हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में भुगतान न होने की स्थिति में महिला के पास कानूनी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रहेगा।

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