सुप्रीम कोर्ट ने उपहार त्रासदी पीड़ित संघ से कहा– अंसल भाइयों के 60 करोड़ रुपये से बने ट्रॉमा सेंटर का निरीक्षण करें

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उपहार त्रासदी पीड़ित संघ (AVUT) से कहा कि वह उन ट्रॉमा सेंटरों का निरीक्षण करे जो 1997 की आगजनी में मारे गए पीड़ितों की स्मृति में अंसल बंधुओं द्वारा जमा की गई राशि से बनाए गए हैं।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एवीयूटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयंते मेहता से कहा कि वे अपने प्रतिनिधियों को इन केंद्रों का दौरा करने के लिए नियुक्त करें। दिल्ली सरकार का कहना है कि अंसल भाइयों द्वारा 2015 में जमा कराए गए 60 करोड़ रुपये से तीन सरकारी अस्पतालों में ट्रॉमा सेंटर बनाए गए हैं।

“आप इन ट्रॉमा सेंटरों का निरीक्षण करें और यदि किसी सुविधा को मजबूत करने की जरूरत है तो अदालत आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है,” पीठ ने कहा। साथ ही यह भी सुझाव दिया कि पीड़ित संघ इस विवाद को उचित तरीके से समाप्त करने पर विचार करे क्योंकि “बार-बार लोगों को त्रासदी की याद दिलाने का कोई अर्थ नहीं है।”

मेहता ने कहा कि 2015 के आदेश का पालन सही ढंग से नहीं हुआ और अंसल भाइयों को “बिना किसी परिणाम के छोड़ दिया गया।” उन्होंने आरोप लगाया कि यह रकम “काले छेद” में चली गई। उनका कहना था कि अदालत ने दिल्ली विद्युत बोर्ड को द्वारका में पांच एकड़ भूमि ट्रॉमा सेंटर के लिए देने का निर्देश दिया था, जो कभी पूरा नहीं हुआ।

दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक डेव ने पुष्टि की कि अंसल भाइयों ने 60 करोड़ रुपये का भुगतान किया था और यह राशि मंगोलपुरी स्थित संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल, नरेला के सत्यवती राजा हरीश चंदर अस्पताल और सिरासपुर अस्पताल में ट्रॉमा सुविधाओं पर खर्च की गई।

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सरकार ने कहा कि ये स्थान दिल्ली के घनी आबादी वाले और उपेक्षित क्षेत्रों में तात्कालिक सार्वजनिक आवश्यकता को देखते हुए चुने गए। साथ ही यह भी बताया कि द्वारका स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल मई 2021 से पूरी तरह कार्यात्मक है, जिसमें 1,241 बिस्तर हैं जिनमें 330 आईसीयू बिस्तर शामिल हैं।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि 60 करोड़ रुपये “आज के समय में दिल्ली में अस्पताल बनाने और चलाने की लागत के मुकाबले मूँगफली के बराबर” हैं और राज्य सरकार ने इन सुविधाओं को चलाने के लिए अतिरिक्त धन भी उपलब्ध कराया है।

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पीठ ने स्पष्ट किया कि वह 2015 के फैसले की समीक्षा नहीं कर रही बल्कि केवल यह देख रही है कि ट्रॉमा सेंटर सही रूप से कार्य कर रहे हैं या नहीं। अदालत ने एवीयूटी से आपातकालीन सेवाओं, एंबुलेंस और अन्य आवश्यक सुविधाओं की जांच करने को कहा।

22 सितम्बर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि द्वारका में पीड़ितों की स्मृति में दो वर्षों के भीतर एक ट्रॉमा सेंटर स्थापित किया जाए। लगभग एक दशक बीत जाने के बावजूद एवीयूटी का कहना है कि अदालत की उस मंशा के अनुरूप केंद्र स्थापित नहीं हुआ है।

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अब मामला एवीयूटी द्वारा ट्रॉमा सेंटरों के निरीक्षण और उसकी रिपोर्ट पर आगे बढ़ेगा।

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