लखनऊ जिला अदालत परिसर के पास सार्वजनिक भूमि पर बने वकीलों के चैंबरों को हटाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट विचार करने के लिए सहमत हो गया है। शीर्ष अदालत को सोमवार को सूचित किया गया कि स्थानीय अधिकारियों ने ध्वस्तीकरण के नोटिस जारी कर दिए हैं और 30 अगस्त को कार्रवाई तय की गई है।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष अधिवक्ता ने मामला रखते हुए जल्द सुनवाई का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान जब सीजेआई ने पूछा कि याचिकाकर्ता राहत के लिए हाईकोर्ट क्यों नहीं गए, तो वकील ने स्पष्ट किया कि ध्वस्तीकरण के निर्देश खुद हाईकोर्ट ने ही जारी किए हैं।
पीठ की टिप्पणियां और वकीलों का पक्ष
सीजेआई की इस टिप्पणी पर कि ये निर्माण अनाधिकृत प्रतीत होते हैं, वकील ने अदालत को बताया कि ये चैंबर पिछले लगभग 40 वर्षों से अस्तित्व में हैं। सीजेआई ने कहा कि प्रभावित वकील नोटिसों का अपना औपचारिक जवाब दाखिल कर सकते हैं। हालांकि, वकील ने जोर देकर कहा कि नगर निगम अधिकारियों ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को तुरंत अंजाम देने की मंशा से ही नोटिस भेजे हैं। पीठ ने मामले को देखने की बात कही, हालांकि सुनवाई के लिए कोई विशिष्ट तारीख तय नहीं की।
हाईकोर्ट का निर्देश और नगर निगम की कार्रवाई
यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के 6 अगस्त के आदेश के बाद सामने आई है। हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम को निर्देश दिया था कि वह जिला अदालत परिसर से सटे सार्वजनिक रास्तों और जनसुविधा की जमीन पर कब्जा करके बनाए गए चैंबरों तथा अन्य ढांचों के संबंध में 72 कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी करे। इनमें अधिकांश प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं।
हाईकोर्ट ने अपने निर्देश में कहा था कि संबंधित लोग या तो जमीन और निर्माण पर अपना कानूनी अधिकार साबित करें या जगह खाली कर दें। ऐसा न करने की स्थिति में नगर निगम को बुलडोजर चलाने और ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया गया था।

