इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश जल निगम में साल 2013 की भर्ती प्रक्रिया से हटाए गए 26 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों (जेई) को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने प्रशासनिक गलतियों का खामियाजा कर्मचारियों पर डालने को अवैध ठहराते हुए उनकी सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने सभी प्रभावित इंजीनियरों को 21 अक्टूबर 2013 की मूल नियुक्ति तिथि से सेवा की निरंतरता (कंटिन्यूटी ऑफ सर्विस) प्रदान करते हुए नौकरी में बनाए रखने का निर्देश दिया है।
अधिकारियों की चूक की सजा कर्मचारियों को नहीं: हाईकोर्ट
न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने जूनियर इंजीनियर राकेश प्रताप सिंह और 25 अन्य सह-याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने साफ किया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत पदों पर नियमित चयन प्रक्रिया के जरिए हुई थी। उनके खिलाफ किसी भी तरह की धोखाधड़ी, गलत बयानी या हेरफेर का कोई आरोप नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यद्यपि वैधानिक आरक्षण नीति का शत-प्रतिशत पालन अनिवार्य है, लेकिन आरक्षण की गड़बड़ियों को ठीक करने के नाम पर कानून और मूल चयन शर्तों के विपरीत कोई तरीका नहीं अपनाया जा सकता।
पिछड़ा वर्ग आयोग का आदेश भी रद्द
मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 28 जनवरी 2014 के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसके आधार पर जल निगम ने कार्रवाई की थी। अदालत ने पाया कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह फैसला दिया था। पीठ के अनुसार, जब मूल आदेश ही कानूनी आधार के बिना था, तो उसके आधार पर की गई बाद की कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई वैध नहीं मानी जा सकती।
क्या है पूरा भर्ती विवाद?
यह विवाद साल 2013 में जल निगम द्वारा 470 जूनियर इंजीनियर पदों के लिए शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। शुरुआती चयन श्रेणीवार किया गया था, लेकिन आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों की अनदेखी के आरोप लगने के बाद जल निगम के प्रबंध निदेशक ने 7 जनवरी 2014 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया।
याचिकाकर्ताओं के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्रा ने अदालत को बताया कि समिति ने 15 जनवरी 2014 की अपनी रिपोर्ट में छूटे हुए पात्र आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को दूसरे चरण की 469 रिक्तियों में समायोजित करने की सिफारिश की थी। पैनल ने स्पष्ट रूप से सलाह दी थी कि पहले से चयनित किसी भी सामान्य वर्ग के कर्मचारी को पद से न हटाया जाए। जल निगम ने इन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए 136 अतिरिक्त अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) अभ्यर्थियों की नियुक्ति की, जिससे कुल नियुक्तियों की संख्या 543 हो गई।
अदालती आदेश की अनदेखी पर नाराजगी
जांच समिति की स्पष्ट सलाह के बावजूद, जल निगम ने 2 दिसंबर 2014 को 73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों को बर्खास्तगी का नोटिस थमा दिया। कर्मचारियों ने इस कदम को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां 18 दिसंबर 2014 को अदालत ने बर्खास्तगी आदेश रद्द करते हुए जल निगम को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया था। जल निगम ने इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी, जिससे यह आदेश अंतिम और बाध्यकारी हो गया।
इसके बावजूद, अधिकारियों ने 14 मई 2015 को फिर से बर्खास्तगी के आदेश जारी कर दिए। हाईकोर्ट ने जल निगम के इस रुख की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस को महज एक खानापूर्ति नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने जल निगम के उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें बर्खास्तगी को एकमात्र विकल्प बताया गया था। पीठ ने कहा कि वित्तीय कठिनाई की आड़ लेकर किसी भी मनमाने, अधिकार क्षेत्र से बाहर या अदालत के निर्देशों के खिलाफ दिए गए आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता।

