आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी वकील और सुनवाई कर रहे जज के बीच व्यक्तिगत मनमुटाव या मतभेद किसी मामले की बेंच बदलने (रिक्यूज़ल) का वैध कानूनी आधार नहीं बन सकता। अदालत ने एक वकील की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अपनी पसंद के जज चुनने या बेंच हंटिंग (Bench Hunting) की अनुमति देने से न्यायिक स्वतंत्रता को गंभीर खतरा पहुंचेगा और आम जनता का न्याय प्रणाली से भरोसा उठेगा।
यह आदेश जस्टिस रवि चीमलपाटी ने 19 अगस्त को सुनाया। मामला एक एडवोकेट द्वारा दायर उस आवेदन का था, जिसमें उन्होंने जस्टिस चीमलपाटी से एक रिट याचिका की सुनवाई से अलग होने और फाइल चीफ जस्टिस के पास किसी दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने के लिए भेजने का अनुरोध किया था।
वकील का दावा था कि जज के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध ठीक नहीं हैं। उन्होंने इसी साल मार्च में आंध्र प्रदेश के एडवोकेट जनरल से इसकी शिकायत की थी और 16 जून को चीफ जस्टिस के समक्ष एक आंतरिक शिकायत भी दर्ज कराई थी। वकील की दलील थी कि इस कथित विवाद के कारण वे अपने मुवक्किल का पक्ष निडरता से नहीं रख पा रहे हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
वकील के निजी हलफनामे पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने मामले की फाइल देखने के बाद याचिका की प्रक्रियात्मक कमियों को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि याचिका में लगा हलफनामा (Affidavit) खुद वकील ने दायर किया था, न कि पीड़ित पक्ष या मुवक्किल ने। हाईकोर्ट का कहना था कि जब तक मुवक्किल खुद हलफनामा देकर ऐसी बातों की पुष्टि न करे, तब तक वकील की व्यक्तिगत शिकायतों को केस के स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक मुवक्किल का स्पष्ट निर्देश और हलफनामा न हो, तब तक कोई वकील अपने व्यक्तिगत मतभेदों का हवाला देकर जज को हटाने की मांग नहीं कर सकता। किसी जज का सख्त होना, सख्त मिजाज का होना या सख्त रुख अपनाना सुनवाई से अलग होने की वजह नहीं हो सकता।
सात पुराने मामलों का दिया गया था हवाला
वकील ने अपनी शिकायत में सात पूर्ववर्ती मामलों का उल्लेख किया था। जब हाईकोर्ट ने इन रिकॉर्ड की जांच की, तो सामने आया कि सात में से छह मामलों को खारिज कर दिया गया था और एक मामले में हर्जाना (कॉस्ट) लगाते हुए निपटारा किया गया था।
अदालत ने टिप्पणी की कि ये सभी सातों मामले एक डिवीजन बेंच (खंडपीठ) द्वारा तय किए गए थे, जिसमें जस्टिस रवि चीमलपाटी एक सदस्य के रूप में शामिल थे। उस खंडपीठ के फैसलों का वर्तमान में एकल पीठ (सिंगल जज) के समक्ष लंबित रिट याचिका से कोई सीधा संबंध नहीं बनता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया संदर्भ
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘आर के आनंद बनाम रजिस्ट्रार, दिल्ली हाईकोर्ट’ का संदर्भ देते हुए दोहराया कि कोई भी पक्षकार या वकील केवल इसलिए अपनी पसंद की बेंच नहीं चुन सकता क्योंकि किसी जज ने पूर्व में उनके खिलाफ कोई फैसला दिया हो।
अदालत के अनुसार, सुनवाई से हटने (Recusal) के वैध कारण केवल गंभीर और स्पष्ट हित-संघर्ष (Conflict of Interest) की स्थिति में ही बनते हैं—जैसे कि जब जज वकील का नजदीकी रिश्तेदार हो या जज ने खुद अतीत में उस विशेष विवाद में किसी एक पक्ष के वकील के रूप में काम किया हो।
जस्टिस चीमलपाटी ने कहा कि वर्तमान मामले में ऐसी कोई भी वैध परिस्थिति मौजूद नहीं है। जज को डरा-धमकाकर या व्यक्तिगत आरोप लगाकर केस से हटने पर मजबूर करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक अनैतिक प्रयास है। हाईकोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से औचित्यहीन और आधारहीन बताते हुए खारिज कर दिया।

