पीएमएलए में ईडी के अधिकारों पर पुनर्विचार याचिकाएं सुनने को तैयार हुआ सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को मिले अधिकारों को बरकरार रखने वाले जुलाई 2022 के फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। कोर्ट ईडी की गिरफ्तारी, संपत्ति कुर्क करने, और छापेमारी की शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की दलीलों पर यह फैसला लिया। पुनर्विचार याचिकाकर्ता कार्ति चिदंबरम की ओर से पेश हुए सिब्बल ने अदालत को बताया कि अगस्त 2022 में ही इन याचिकाओं पर नोटिस जारी किए जा चुके थे, इसलिए अब इन पर जल्द सुनवाई की जरूरत है।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि यदि मामले को पुरानी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाता, तो इसके लिए तीन मौजूदा पीठों को पुनर्गठित करना पड़ता क्योंकि संबंधित न्यायाधीश अब अलग-अलग पीठों में बैठ रहे हैं। इस मामले की संवेदनशीलता और तात्कालिकता को देखते हुए तीन जजों की यह पीठ खुद ही इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई की अगली तारीख बाद में अधिसूचित की जाएगी।

पुनर्विचार याचिका की सीमाएं और सुनवाई प्रक्रिया

इससे पहले पिछले साल 31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वह मुख्य कानूनी सवालों पर जाने से पहले यह तय करेगा कि ये पुनर्विचार याचिकाएं सुनवाई योग्य हैं या नहीं। याचिकाकर्ताओं ने विचार के लिए 13 कानूनी सवाल रखे हैं, जबकि ईडी ने याचिकाओं की पोषणीयता पर तीन प्रारंभिक आपत्तियां उठाई हैं।

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पिछली सुनवाई के दौरान जस्टिस कांत ने टिप्पणी की थी कि पुनर्विचार याचिकाओं की अपनी कानूनी सीमाएं होती हैं। उन्होंने कहा था कि किसी विषय पर अलग दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन निर्धारित मापदंडों को पूरा किए बिना अदालत अपने पिछले फैसले को बदल नहीं सकती।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि पुनर्विचार का दायरा केवल उन्हीं दो मुद्दों तक सीमित रहना चाहिए, जिन पर अगस्त 2022 में नोटिस जारी किए गए थे। सॉलिसिटर जनरल के अनुसार, उस समय कोर्ट ने केवल दो विषयों पर नोटिस जारी किए थे—पहला, आरोपी व्यक्ति को इंफोर्समेंट केस इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (ईसीआर) की प्रति देना, और दूसरा, पीएमएलए की धारा 24 के तहत सबूत पेश करने के दायित्व (बर्डन ऑफ प्रूफ) को उलटना।

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2022 के फैसले की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट का 2022 का फैसला 200 से अधिक याचिकाओं के समूह पर आया था, जिनमें 2002 के धन शोधन कानून के विभिन्न प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई थी। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने वित्तीय जांच एजेंसी के वैधानिक अधिकारों को सही ठहराया था और कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग वैश्विक वित्तीय तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है, जिसे सामान्य आपराधिक अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता।

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कोर्ट ने निर्णय सुनाया था कि पीएमएलए के तहत काम करने वाले अधिकारी पुलिस अधिकारी नहीं हैं और ईडी की ईसीआर रिपोर्ट आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की एफआईआर के समान नहीं है। इसलिए, कार्रवाई से पहले आरोपी को ईसीआर की प्रति सौंपना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते हिरासत में लेते समय गिरफ्तारी के आधार की जानकारी दे दी जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने धारा 45 के तहत जमानत की कड़ी शर्तों को भी संवैधानिक और गैर-मनमाना माना था।

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