सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऑटोमोबाइल डीलरों द्वारा वित्तीय संस्थानों और बीमा प्रदाताओं से एकत्र किया गया रेफरल शुल्क फाइनेंस एक्ट, 1994 के अध्याय V की धारा 65(105)(zzb) के तहत कर योग्य ‘बिजनेस ऑक्सिलरी सर्विस’ (BAS) के दायरे में आता है। जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सर्विस टैक्स की प्रयोज्यता और बढ़ी हुई समय सीमा लागू करने के लिए टर्नओवर छिपाने के आरोपों पर विचार किया। शीर्ष अदालत ने रेफरल फीस पर सर्विस टैक्स लगाने के फैसले को बरकरार रखते हुए मेसर्स टीवीएस मोटर कंपनी लिमिटेड की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और फाइनेंस एक्ट की धारा 78 के तहत लगाई गई पेनल्टी को रद्द कर दिया, क्योंकि कंपनी ने कारण बताओ नोटिस जारी होने से पहले ही अपनी पूरी टैक्स देनदारी जमा कर दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वित्तीय वर्ष 2003–2004 से 2006–2007 की मूल्यांकन अवधि से जुड़ा है। वाहनों की डीलर मेसर्स टीवीएस मोटर कंपनी लिमिटेड ने एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और द ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से रेफरल शुल्क प्राप्त किया था। यह शुल्क डीलर को तब दिया जाता था जब वाहन खरीदार डीलर के माध्यम से वाहन ऋण लेते थे या बीमा पॉलिसी खरीदते थे।
कंपनी ने इन रेफरल शुल्कों को ‘विविध आय’ के रूप में दर्ज किया था और अपने सर्विस टैक्स रिटर्न में इसे बिजनेस ऑक्सिलरी सर्विस के रूप में नहीं दर्शाया था। 2 अप्रैल 2008 को सेंट्रल एक्साइज विभाग ने टर्नओवर छिपाने के आधार पर समय सीमा की विस्तारित अवधि का उपयोग करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया। इस नोटिस के जारी होने से पहले टीवीएस मोटर ने चार किस्तों में पूरी टैक्स राशि जमा कर दी थी: 31 मार्च 2005 को ₹1,81,560; 4 नवंबर 2006 को ₹1,02,07,017; 21 फरवरी 2007 को ₹19,27,172; और 30 मार्च 2007 को ₹23,86,085।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील चारण्या लक्ष्मीकुमारन ने तर्क दिया कि चूंकि कारण बताओ नोटिस जारी होने से पहले ही पूरी कर देनदारी चुका दी गई थी, इसलिए फाइनेंस एक्ट, 1994 की धारा 73(3) के अनुसार करदाता पेनल्टी से मुक्त हो जाता है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि विभिन्न ट्रिब्यूनलों के बीच ऐसी सेवाओं के वर्गीकरण को लेकर भ्रम की स्थिति थी, जिसे बाद में मेसर्स पगड़िया ऑटो सेंटर बनाम कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, औरंगाबाद मामले में एक बड़ी पीठ ने सुलझाया था।
विभाग की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकील निशा बागची ने तर्क दिया कि करदाता ने जानबूझकर रेफरल आय को ‘विविध आय’ के रूप में दिखाया था, जो स्पष्ट रूप से जानकारी छिपाने का कृत्य है। उन्होंने कहा कि फाइनेंस एक्ट, 1994 के प्रावधानों की जानकारी डीलर को थी। ऋणदाताओं और बीमा कंपनियों को ग्राहक संदर्भित करने के एवज में कमीशन के रूप में रेफरल शुल्क लेने पर सर्विस टैक्स से नहीं बचा जा सकता, इसलिए पेनल्टी लगाना पूरी तरह उचित था।
कोर्ट का विश्लेषण
डीलर, बैंकों और बीमा कंपनी के बीच हुए समझौतों का अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ग्राहकों द्वारा बीमा पॉलिसी लेने या वाहन ऋण प्राप्त करने पर मिलने वाला रेफरल शुल्क “…निश्चित रूप से एक बिजनेस ऑक्सिलरी सर्विस है।” पीठ ने टिप्पणी की कि करदाता “…बैंकों और बीमा कंपनी के व्यवसाय को बढ़ावा दे रहा है, जिसके लिए उन्हें समझौते में निर्धारित राशि प्राप्त होती है।”
कोर्ट ने ट्रिब्यूनल की बड़ी पीठ के निर्णय (मेसर्स पगड़िया ऑटो सेंटर बनाम कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, औरंगाबाद) के निष्कर्षों का भी उल्लेख किया, जिसमें टीवीएस मोटर की कार्यप्रणाली का विश्लेषण किया गया था:
“…बैंकों/वित्तीय संस्थानों के साथ बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के प्रचार एवं विपणन के लिए करदाता के निकट संबंध का पता चला; यह भी सामने आया कि करदाता द्वारा प्रदान की गई सेवा का उपयोग बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं प्रदान करने में एक इनपुट के रूप में होता है; समझौतों के तहत करदाता को अपने डीलरों और अधिकृत सेवा केंद्रों को वित्तीय संस्थानों के साथ हुई व्यवस्था के बारे में सूचित करना आवश्यक था और वाहन खरीदारों को भी वित्तीय सुविधाओं की उपलब्धता की जानकारी दी जानी चाहिए थी। करदाता के डीलरों और अधिकृत सेवा केंद्रों से यह अपेक्षा भी की जाती थी कि वे ग्राहकों को वित्तीय संस्थानों द्वारा दी जाने वाली ऋण सुविधाओं के प्रति जागरूक करें। इन तथ्यात्मक परिस्थितियों को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि करदाता बैंकों और बीमा कंपनियों की सेवाओं का प्रचार और विपणन कर रहा था, उनकी आर्थिक गतिविधियों में एक कड़ी के रूप में काम कर रहा था और इसलिए कर योग्य बिजनेस ऑक्सिलरी सर्विस प्रदान कर रहा था।”
पेनल्टी लगाने के संबंध में पीठ ने धारा 73(3) का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह धारा स्पष्ट करती है कि “…यदि कर का कम निर्धारण या कम भुगतान हुआ है, तो नोटिस जारी होने से पहले कर देनदारी संतुष्ट हो जाने पर विभाग कारण बताओ नोटिस जारी करने से परहेज करेगा।”
कोर्ट ने माना कि 2003–2004 से 2006–2007 के दौरान टैक्स देनदारी को लेकर वास्तविक भ्रम की स्थिति थी। चूंकि 2 अप्रैल 2008 को कारण बताओ नोटिस जारी होने से पहले ही पूरी टैक्स राशि जमा कर दी गई थी, इसलिए धारा 78 के तहत लगाई गई पेनल्टी रद्द की जाती है। पीठ ने यह भी नोट किया कि धारा 76 के तहत लगाई गई पेनल्टी को ट्रिब्यूनल पहले ही रद्द कर चुका था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने रेफरल शुल्क को ‘बिजनेस ऑक्सिलरी सर्विस’ के रूप में कर योग्य मानते हुए अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और फाइनेंस एक्ट, 1994 की धारा 78 के तहत लगाई गई पेनल्टी को रद्द कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेसर्स टीवीएस मोटर कंपनी लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, चेन्नई-III
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 7947/2013
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 19 अगस्त 2026

