ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाना एंटी-ट्रैफिकिंग कानून के तहत अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निर्णय में स्पष्ट किया है कि पैसों का भुगतान कर अपनी व्यक्तिगत शारीरिक संतुष्टि के लिए वेश्यालय जाने वाले ग्राहक पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की मुख्य धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने कहा कि वेश्यावृत्ति के लिए पैसे देने वाले व्यक्ति को देह व्यापार का संचालन करने या उसमें मदद करने का दोषी नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह कानून मुख्य रूप से व्यावसायिक शोषण और वेश्यालय प्रबंधन को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया है।

गाजियाबाद की पुलिस रेड और कानूनी चुनौती

यह मामला गाजियाबाद के एक मकान पर 31 दिसंबर 2023 को हुई पुलिस छापेमारी से जुड़ा है। उस दौरान पुलिस ने मौके से 16 लोगों को हिरासत में लिया था, जिनमें नितिन नाम का एक व्यक्ति भी शामिल था। पुलिस की जांच के बाद उसके खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया। नितिन ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी और तर्क दिया कि ये प्रावधान वेश्यालय का संचालन करने वालों पर लागू होते हैं, न कि ग्राहकों पर।

अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून का दायरा

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस गौतम चौधरी की पीठ ने 11 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 उन लोगों को दंडित करने के लिए बनाई गई हैं जो वेश्यालय चलाते हैं, उसका रखरखाव करते हैं, व्यावसायिक वेश्यावृत्ति के लिए परिसर उपलब्ध कराते हैं, दूसरों की कमाई पर निर्भर रहते हैं या लोगों को यौन शोषण के लिए उकसाते और लाते हैं।

अदालत ने टिप्पणी की कि अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए पैसे देने वाला ग्राहक वेश्यालय के प्रबंधन या संचालन में शामिल नहीं होता। चूंकि कानून में वेश्यावृत्ति का मूल आधार व्यावसायिक शोषण है, इसलिए ग्राहक की उपस्थिति को देह व्यापार या खरीद-फरोख्त की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

आपराधिक कार्रवाई और चार्जशीट रद्द

READ ALSO  उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आर्मी सिपाही के परिवार के लिए गुज़ारा भत्ता बढ़ाकर 25,000 रुपये किया

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता घटना के समय केवल एक ग्राहक के रूप में वहां मौजूद था। इसलिए उसके खिलाफ दर्ज की गई धाराएं कानूनी रूप से पोषणीय नहीं हैं। अदालत ने नितिन के खिलाफ दाखिल चार्जशीट और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक प्रक्रिया को खारिज कर दिया। जस्टिस चौधरी ने कहा कि ऐसी स्थिति में आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाना अदालत की समय और प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

READ ALSO  Cooperative Society | 21 Days Prior Notice Mandatory For Considering No Confidence Motion: Allahabad HC
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles