एक जीप में 13 पुलिसकर्मी, 23 पुलिस वालों ने एक तमंचा लिए आदमी का पीछा किया: इलाहाबाद HC ने श्रावस्ती एनकाउंटर की CBI जांच के आदेश दिए

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कथित पुलिस मुठभेड़ मामले में आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही अदालत ने पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की सत्यता और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से कराने का निर्देश दिया है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष की कहानी में गंभीर विरोधाभास हैं, जो एक प्रायोजित एनकाउंटर का संदेह पैदा करते हैं। प्रथम दृष्टया यह मामला पुलिस मुठभेड़ों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए अनिवार्य दिशा-निर्देशों के उल्लंघन को भी दर्शाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याची को पूर्व में वर्ष 2012 के एक नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, 28 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा और दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया था। (2023) 6 SCC 742 में रिपोर्ट किए गए उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था:

“जांच सही ढंग से न करके अभियोजन पक्ष ने पीड़िता के परिवार के साथ अन्याय किया है। किसी भी ऐसे साक्ष्य के बिना जो न्यायिक समीक्षा में टिक सके, अपीलकर्ता पर दोष मढ़कर अभियोजन ने अपीलकर्ता के साथ अन्याय किया है। अदालत किसी अपराध के पीड़ित के साथ हुए अन्याय की भरपाई करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को अन्याय का शिकार नहीं बना सकती।”

इसके बाद 9 मई 2025 को श्रावस्ती जिले के इकौना थाने में एफआईआर संख्या 110/2025 दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि एक नामजद आरोपी और उसके दो अज्ञात साथियों ने एक 7 वर्षीय बच्ची का अपहरण कर लिया। शिकायतकर्ता ने नामजद आरोपी को मौके पर ही पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था। इसके तीन दिन बाद, 12 मई 2025 को इकौना थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष (एसएचओ) अश्विनी कुमार दुबे ने याची के खिलाफ एनकाउंटर का दावा करते हुए एफआईआर संख्या 113/2025 दर्ज कराई।

पुलिस कहानी के अनुसार, 13 पुलिसकर्मी एक सरकारी वाहन (यूपी 46 जी 0161) से गश्त कर रहे थे, तभी मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी ई-रिक्शा से नेपाल भागने की फिराक में है। इसके बाद स्वात (SWAT) टीम के प्रभारी नितिन यादव के नेतृत्व वाली 10 सदस्यीय टीम भी वहां पहुंची और कुल 23 पुलिसकर्मियों ने अंधरपुरवा पुल के पास घेराबंदी की। पुलिस का दावा था कि आरोपी का ई-रिक्शा एक पेड़ से टकरा गया, जिसके बाद उसने भागने की कोशिश की और 23 पुलिसकर्मियों की टीम को धमकी देते हुए अपना तमंचा लोड किया। अंधेरे में हथियार लोड होने की आवाज सुनकर एसएचओ ने आत्मरक्षा में अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्तौल से दो गोलियां चलाईं, जो आरोपी के दोनों पैरों में लगीं। इसके बाद दोनों पैरों में गोली लगने से घायल और 23 सशस्त्र पुलिसकर्मियों से घिरे आरोपी ने कथित तौर पर 9 मई की घटना का इकबालिया बयान दिया।

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प्रक्रियात्मक इतिहास और दलीलें

एनकाउंटर के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत चार्जशीट दाखिल की। आरोपी ने डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की, जिसे 28 जुलाई 2025 को सत्र न्यायाधीश, श्रावस्ती ने खारिज कर दिया था।

इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां 26 मार्च 2026 को हाईकोर्ट की एक समन्वयक पीठ ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए मामले को रिमांड पर भेज दिया और निर्देश दिया कि आरोपी को उचित कानूनी सहायता प्रदान कर नए सिरे से निर्णय लिया जाए।

हालांकि, 2 जुलाई 2026 को अपर सत्र न्यायाधीश अमित कुमार प्रजापति ने दोबारा डिस्चार्ज अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि बिना साक्ष्य केवल संभावनाओं के आधार पर निर्दोषता स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि 28 जुलाई 2025 को पहले ही आरोप तय किए जा चुके हैं, इसलिए दोबारा आरोप तय करने की आवश्यकता नहीं है।

इस आदेश के खिलाफ याची की ओर से अधिवक्ता नदीम मुर्तजा, उत्कर्ष श्रीवास्तव, प्रशस्त पुरी, नीहारिका श्रीवास्तव और पार्थ आनंद ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट यह समझने में विफल रही कि जब 28 जुलाई 2025 का मूल आदेश पूरी तरह से रद्द कर दिया गया था, तो उसके तहत तय किए गए आरोप भी स्वतः समाप्त हो गए थे।

वहीं राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए-I) जी.डी. भट्ट और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे ने ट्रायल कोर्ट के आदेश और पुलिस कार्रवाई का बचाव किया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

आरोप तय करने से जुड़े कानूनी सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रफुल्ल कुमार समल (1979) 3 SCC 4 मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:

“संहिता की धारा 227 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए जज, जो कि एक वरिष्ठ और अनुभवी अदालत होती है, केवल डाकघर या अभियोजन पक्ष के मुखपत्र के रूप में कार्य नहीं कर सकती। उसे मामले की व्यापक संभावनाओं, अदालत के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और दस्तावेजों के कुल प्रभाव तथा मामले में दिखाई देने वाली बुनियादी कमियों आदि पर विचार करना होगा।”

अदालत ने सज्जन कुमार बनाम सीबीआई (2010) 9 SCC 368 का भी हवाला दिया और स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन पक्ष के दावे सामान्य बुद्धि या व्यावहारिक संभावनाओं के विपरीत हों, तो उन्हें बिना जांचे-परखे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने कई गंभीर विसंगतियों को रेखांकित किया:

  1. वाहन क्षमता और टीमों का विभाजन: एफआईआर में दावा किया गया कि 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जब तक वाहन कोई मिनी बस न हो, सामान्य जीप या एसयूवी में 13 लोगों का बैठना न तो व्यावहारिक है और न ही कानूनी रूप से अनुमेय। इसके अलावा, एक ही वाहन से चल रहे 13 पुलिसकर्मियों का रात में पैदल तीन अलग-अलग रास्तों पर बंट जाना भी असंभव प्रतीत होता है।
  2. असममित मुठभेड़ की कहानी: अदालत ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि 10 सदस्यीय स्वात टीम सहित 23 सशस्त्र पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद, केवल एक तमंचे और दो कारतूस से लैस एक अकेला व्यक्ति पुलिस टीम को चुनौती दे दे और पुलिस उसे पकड़ न पाए।
  3. निशानेबाजी और चिकित्सा रिपोर्ट का विरोधाभास: एसएचओ ने दावा किया कि उसने केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर रात के अंधेरे में 15 मीटर की दूरी से दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां सीधे आरोपी के पैरों में जाकर लगीं। अदालत द्वारा पूछे जाने पर एसएचओ ने दावा किया कि उस रात चांदनी रात थी। हालांकि, जब मेडिकल रिपोर्ट में घाव का आकार 0.5 सेमी x 0.5 सेमी दिखाया गया, तो एसएचओ ने तर्क दिया कि 9 एमएम गोली का सिरा पतला होने के कारण 5 एमएम का घाव बन सकता है। अदालत ने टिप्पणी की कि यह व्याख्या तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती।
  4. पुलिस एनकाउंटर का ढर्रा: पुलिस कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“अदालत आए दिन यह देख रही है कि जब भी पुलिस किसी व्यक्ति को पकड़ती है, तो अक्सर एक नई एफआईआर दर्ज कर दी जाती है जिसमें यह आरोप होता है कि जब आरोपी को पकड़ा गया तो उसने पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। सामान्यतः किसी पुलिसकर्मी की वर्दी तक को एक छर्रा भी नहीं छूता और वे सभी सुरक्षित बच निकलते हैं। पुलिस एक गोली चलाती है और वह आरोपी के घुटने या उसके नीचे जाकर लगती है।”

  1. अनिवार्य दिशा-निर्देशों का उल्लंघन: अदालत ने माना कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) 10 SCC 635 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अनिवार्य प्रक्रियाओं और राजू बनाम यूपी राज्य (2026 SCC OnLine All 144) में तय सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया। राजू बनाम यूपी राज्य का पुनरोल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
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“दंड देने की शक्ति विशेष रूप से अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आती है, न कि पुलिस के।”

  1. द्वेषपूर्ण कार्रवाई का अंदेशा: अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि घटना में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को उस अपराध में इकबालिया बयान दर्ज करने के “उत्कृष्ट कार्य” के लिए पुरस्कृत किया गया, जिसमें आरोपी को सुप्रीम कोर्ट पहले ही बरी कर चुका था। अदालत ने माना कि पुलिस का यह अंदेशित आक्रोश सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में की गई तीखी टिप्पणियों का परिणाम हो सकता है।

अदालत का निर्णय और निर्देश

घटनाक्रम में फर्जी कहानी और प्रायोजित एनकाउंटर की प्रबल आशंका को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 2 जुलाई 2026 के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

हाईकोर्ट ने सीबीआई के निदेशक को निर्देश दिया कि वे किसी अधिकारी को नामित कर एफआईआर संख्या 113/2025 के आरोपों की सत्यता की स्वतंत्र जांच कराएं। अदालत ने विशेष रूप से निर्देश दिया कि जांच के दौरान:

“शिकायतकर्ता एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे (पीएनओ 880530329) की शूटिंग क्षमता का भी आकलन किया जाएगा ताकि यह जांचा जा सके कि क्या वह केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर, रात के अंधेरे में अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्तौल से 15 मीटर की दूरी से सटीक निशाना लगाने और गोली चलाने में सक्षम है या नहीं।”

सीबीआई को तीन महीने के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है, जिसके बाद याची को प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मिलेगा। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव गृह विभाग लखनऊ एवं 4 अन्य

वाद संख्या: क्रिमिनल रिविजन नंबर 835/2026

पीठ: जस्टिस सुभाष विद्यार्थी

निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026

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