दिल्ली हाईकोर्ट ने करीब 18 साल पुरानी शादी को भंग करने की मांग वाली एक पति की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी के समय नशीला पदार्थ दिए जाने का आरोप दो दशक बाद शादी को अमान्य ठहराने का आधार नहीं बन सकता। इसके साथ ही पीठ ने यह भी साफ किया कि अदालत के आदेश पर पत्नी को हर महीने दिया जाने वाला गुजारा भत्ता एक कानूनी दायित्व है और सिर्फ इसका भुगतान करने से पति तलाक का हकदार नहीं हो जाता।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की पीठ ने 18 अगस्त के अपने फैसले में कहा कि विवाह के दौरान किसी प्रभाव या नशे में होने का दावा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत आता है। इसके तहत यदि सहमति छल या बलपूर्वक ली गई हो तो विवाह शून्यकरणीय (वाइडेबल) होता है, लेकिन इसके लिए धोखाधड़ी का पता चलने के एक वर्ष के भीतर ही विवाह रद्द करने की याचिका दाखिल की जानी चाहिए।
अदालत की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कानूनी रुख में विरोधाभास रखने पर पति की खिंचाई की। पीठ ने कहा कि कोई भी पक्ष एक साथ दो विरोधी रुख नहीं अपना सकता—यानी एक तरफ शादी के अस्तित्व को ही नकारना और दूसरी तरफ उसी शादी को भंग करने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत परित्याग (डेजर्शन) के आधार पर याचिका दायर करना। इसके अलावा, अदालत ने दोहराया कि न्यायिक आदेश के तहत प्रति माह 10,000 रुपये का भरण-पोषण देना एक अनिवार्य कानूनी कर्तव्य है, न कि तलाक की डिग्री पाने का कोई जरिया।
विवाद का घटनाक्रम
इस जोड़े का विवाह वर्ष 2008 में हिंदू रीति-रिवाज से आर्य समाज मंदिर में हुआ था और उनकी कोई संतान नहीं है। शादी के तुरंत बाद आपसी विवाद के कारण पत्नी ने जून 2008 में पति और उसके परिवार के खिलाफ क्रूरता की शिकायत दर्ज कराई थी। उसी वर्ष बाद में, पत्नी ने अपने वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना और साथ रहने के लिए याचिका दायर की, जिसे सितंबर 2013 में उसके पक्ष में मंजूर कर लिया गया।
साथ रहने के अदालती आदेश के बावजूद दोनों अलग ही रहे। इसके बाद अप्रैल 2016 में पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की। फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद पति ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था।
अदालत में दोनों पक्षों के तर्क
पति का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता गिरीश चंद्र ने दलील दी कि शादी के समय पति नशीले पदार्थ के प्रभाव में था, इसलिए यह विवाह मान्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पत्नी सितंबर 2013 से बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही है और उसने साथ रहने का कोई प्रयास नहीं किया, जबकि उनका मुवक्किल नियमित रूप से 10,000 रुपये महीने का भरण-पोषण देकर अपना कानूनी कर्तव्य निभा रहा है।
दूसरी ओर, पत्नी के वकील परितोष सिंह राजपूत ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि उनकी मुवक्किल हमेशा पति के साथ रहने और सभी कानूनी मामले वापस लेने को तैयार रही है। उन्होंने कहा कि पति ने ही बिना किसी पर्याप्त वजह के पत्नी का परित्याग किया है।
पुनर्मिलन के प्रयासों का अभाव
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पति ने तलाक की अर्जी दाखिल करने से पहले या अदालती आदेशों के बाद भी कभी साथ रहने का गंभीर प्रयास नहीं किया, जबकि पत्नी हमेशा साथ रहने के लिए तैयार थी। पीठ ने अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान कानून के तहत शादी का पूरी तरह टूट जाना (इररिट्राइवबल ब्रेकडाउन) तलाक का अपने आप में कोई स्वतंत्र आधार नहीं है और व्यक्तिगत भावनाओं के आधार पर कानूनी प्रावधानों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

