केरल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’ (PMMVY) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए माना है कि योजना के तहत 6,000 रुपये का मातृत्व लाभ प्राप्त करने के लिए नवजात बच्ची का तय समय पर टीकाकरण कराना एक पूरी तरह वैध शर्त है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को अपने बच्चे का टीकाकरण कराने के लिए शारीरिक रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि कोई व्यक्ति सरकारी कल्याणकारी योजना के तहत वित्तीय सहायता का दावा करता है, तो उसे योजना की निर्धारित पात्रता शर्तों का कड़ाई से पालन करना होगा।
योजना की शर्तें पूरी करना अनिवार्य
जस्टिस बीचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने 18 अगस्त को यह निर्णय मलप्पुरम निवासी 36 वर्षीय एक व्यक्ति की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी की दूसरी बेटी के जन्म पर मिलने वाले वित्तीय लाभ का दावा किया था और टीकाकरण की अनिवार्यता को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि कोई भी व्यक्ति पात्रता शर्तों को पूरा किए बिना योजना के लाभ का दावा नहीं कर सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PMMVY के तहत आर्थिक मदद प्राप्त करना किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार के पास सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं के वितरण के लिए नियम और पात्रता शर्तें तय करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।
पिता के पास दावा करने का कानूनी अधिकार नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिका की मेंटेनबिलिटी पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि PMMVY के तहत दी जाने वाली वित्तीय सहायता विशेष रूप से माताओं के लिए निर्धारित है और यह राशि सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है। इसलिए, केवल पिता होने के आधार पर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की ओर से इस राशि का दावा करने का कानूनी अधिकार नहीं रखता।
याचिकाकर्ता की पत्नी ने 3 सितंबर 2024 को दूसरी संतान के रूप में एक बेटी को जन्म दिया था। इसके बाद जब लाभ के लिए आवेदन किया गया, तो स्थानीय अधिकारियों ने बच्चे के टीकाकरण प्रमाणपत्र की मांग की। इसके विरोध में याचिकाकर्ता ने 23 अक्टूबर 2025 को एक विधिक नोटिस भेजा, जिसमें तर्क दिया गया कि वित्तीय मदद के लिए टीकाकरण की शर्त लगाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है।
टीकाकरण का नियम और योजना के प्रावधान
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की धारा 4 के तहत 1 जनवरी 2017 को शुरू की गई PMMVY योजना के क्रियान्वयन के लिए 22 दिसंबर 2022 को नए नियम अधिसूचित किए गए थे। PMMVY नियम 2022 के नियम 7 के अनुसार, दूसरी संतान बालिका होने की स्थिति में 6,000 रुपये की एकमुश्त सहायता राशि दी जाती है। इसके लिए एक मुख्य शर्त यह है कि नवजात बच्ची को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत जन्म से 14 सप्ताह के भीतर सभी अनिवार्य टीके लगवाए गए हों।
केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बचपन का टीकाकरण पूरी तरह से स्वैच्छिक है और किसी पर भी कोई शारीरिक दबाव नहीं डाला जाता। हालांकि, शर्तों को पूरा न करने की स्थिति में आवेदक डीबीटी के तहत मिलने वाले इस सशर्त नकद लाभ का पात्र नहीं रहता।
सुप्रीम कोर्ट का पुराना संदर्भ खारिज
याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के ‘जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ’ मामले के फैसले का हवाला दिया था, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत शारीरिक स्वायत्तता और चिकित्सा उपचार से इनकार के अधिकार को स्वीकार किया गया था।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जैकब पुलियेल फैसला विशेष रूप से कोविड-19 वैक्सीन से जुड़े निर्देशों के संदर्भ में था और इसे बच्चों के नियमित टीकाकरण कार्यक्रमों के खिलाफ मिसाल नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत जानलेवा बीमारियों से बचाव के टीके मुफ्त दिए जाते हैं, और जनस्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए ऐसी शर्तें लगाना संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं है।
चूंकि याचिकाकर्ता की बच्ची को 14 सप्ताह की समय सीमा के भीतर आवश्यक टीके नहीं लगवाए गए थे, इसलिए कोर्ट ने माना कि पात्रता शर्तें पूरी नहीं होती हैं और याचिका को निरस्त कर दिया।

