इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 में एक पुलिस निरीक्षक की हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए व्यक्ति की फांसी की सजा को घटाकर बिना किसी छूट के 25 साल के कारावास में बदल दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक ही गोली से की गई यह हत्या इतनी क्रूर या नृशंस श्रेणी में नहीं आती कि इसके लिए मृत्युदंड दिया जाए।
जस्टिस अजय भानोट और जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने पप्पू उर्फ चंद्र कुमार को दी गई कैपिटल पनिशमेंट को बदलते हुए यह निर्णय सुनाया। हालांकि, अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या), 506 (आपराधिक धमकी) और आर्म्स एक्ट के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई उसकी दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा है।
आवेश में चलाई गई थी गोली
पीठ ने अपने अवलोकन में कहा कि यह घटना आवेश में तात्कालिक रूप से घटी थी और इसमें किसी नृशंस या अति-क्रूर मानसिकता का प्रदर्शन नहीं हुआ था। इसके अलावा, अदालत ने जेल प्रशासन द्वारा प्रस्तुत आचरण रिपोर्ट पर भी विचार किया, जिसके अनुसार कारावास के दौरान आरोपी का व्यवहार शांत और सौम्य पाया गया तथा उसमें आपराधिक प्रवृत्तियों के जारी रहने के संकेत नहीं मिले। अदालत ने आरोपी की कमजोर सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उसके पिता द्वारा सीमित संसाधनों में छह बच्चों के पालन-पोषण के तथ्य को भी सजा कम करने के आधार के रूप में देखा।
गवाहों के बयान और जांच रही मजबूत
अभियोजन पक्ष के दावों की पुष्टि करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाहों के बयान निचली अदालत में पूरी तरह सुसंगत रहे। कोर्ट ने यह भी माना कि विवेचना अधिकारी ने निष्पक्ष और सटीक जांच की थी। हालांकि पंचायतनामा (इनक्वेस्ट) तैयार करने वाले अधिकारी की गवाही में मामूली असमानता देखी गई, लेकिन पीठ ने उसे गैर-महत्वपूर्ण माना क्योंकि वह अधिकारी घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और उसका कार्य केवल औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित था।
वर्ष 2014 की घटना का घटनाक्रम
यह मामला वर्ष 2014 का है, जब पुलिस की एक टीम आरोपी को एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार करने उसके आवास पर पहुंची थी। कार्रवाई के दौरान आरोपी ने पिस्तौल निकालकर पुलिस बल को धमकाया और इंस्पेक्टर राज कुमार सिंह के सीने में गोली मार दी। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था, जिसके बाद आरोपी को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया था।
निचली अदालत ने आरोपी को हत्या का दोषी मानते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी, साथ ही आपराधिक धमकी के लिए दो वर्ष और आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत तीन वर्ष के कठोर कारावास का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के नए निर्णय के तहत अब दोषी को बिना किसी छूट के 25 वर्ष का आजीवन कारावास भुगतना होगा, जबकि अन्य सजाएं पूर्ववत लागू रहेंगी।

