शान्ति अधिनियम: परमाणु दुर्घटना में उचित मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से माँगा स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने नए पारित ‘शान्ति अधिनियम’ को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को केंद्र सरकार को सीमित नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने सरकार से स्पष्ट करने को कहा है कि क्या यह नया कानून किसी परमाणु हादसे की स्थिति में पीड़ितों को उचित और न्यायसंगत मुआवजा देने से अदालतों को रोकता है। इसके साथ ही अदालत ने परमाणु ऊर्जा नियामक संस्था के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में संभावित ‘हितों के टकराव’ पर भी जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागछी और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ (SHANTI) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पूर्व नौकरशाह ई.ए.एस. शर्मा, वैज्ञानिकों और प्राध्यापकों के समूह की ओर से दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि कानून के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

मुआवजे की सीमा और अदालती अधिकार

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने टिप्पणी की कि कानून को लेकर जताई जा रही आशंकाएं अत्यधिक प्रतीत होती हैं। उन्होंने कहा कि संसद ने निवेशकों को आकर्षित करने और परियोजनाओं को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से भले ही ऑपरेटरों की देनदारी की सीमा तय की है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह कानून अदालतों को पीड़ितों को न्यायसंगत और उचित मुआवजा देने से रोकता है।

याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता नेहा राठी ने अदालत में तर्क दिया कि वित्तीय देनदारी की सीमा निर्धारित कर देने से परमाणु संयंत्र संचालकों को सुरक्षा मानकों से समझौता करने की छूट मिल जाती है।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 के चुनाव आचार संहिता उल्लंघन मामले में कपिल मिश्रा के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगाने से किया इनकार

नियामक संस्था की स्वायत्तता पर चिंता

अदालत ने अधिनियम की धारा 17(4) के तहत एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी केंद्र से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। इस प्रावधान के अनुसार, परमाणु ऊर्जा आयोग द्वारा गठित खोज एवं चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर नियामक बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति की जाती है।

प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि चूंकि परमाणु ऊर्जा आयोग देश में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के संचालन के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार संस्था है, इसलिए नियामक निकाय के सदस्यों की सिफारिश में उसकी भूमिका एक प्रत्यक्ष हितों के टकराव को जन्म देती है।

अधिनियम की पृष्ठभूमि

READ ALSO  हिन्दी भाषियों पर अपमानजनक टिप्पणी मामले में मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने कोर्ट में बिना शर्त मांगी माफी

शान्ति अधिनियम, 2025 ने वर्ष 2010 के ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट’ का स्थान लिया है। नया कानून निजी क्षेत्र की कंपनियों को नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति देता है, जबकि किसी अनहोनी की स्थिति में ऑपरेटर की वित्तीय देनदारी को अधिकतम 3,000 करोड़ रुपये तक सीमित करता है।

इससे पूर्व 19 मई को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि शान्ति अधिनियम, 2025 की विभिन्न धाराओं को दी गई चुनौतियां राष्ट्रीय आर्थिक नीति से जुड़े विषयों के अंतर्गत आती हैं।

READ ALSO  [Order VII Rule 11 CPC] Court Cannot Reject the Plaint by Reading Few Lines, Plaint has to be Read as a Whole, Rules Supreme Court
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles