सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) धोखाधड़ी और मिलीभगत के आधार पर शुरू की गई है, तो न्यायिक प्राधिकरण (एनसीएलटी) के पास ऐसी अर्जी के प्रवेश (एडमिशन) आदेश को वापस लेने का पूरा अधिकार और क्षेत्राधिकार है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मूल अर्जी खारिज होने से पूरी दिवाला प्रक्रिया अनिवार्य रूप से रद्द नहीं हो जाती। अदालत ने माना कि एक बार अर्जी स्वीकार हो जाने के बाद यह विवाद दो पक्षों के बीच व्यक्तिगत (इन पर्सोनम) न रहकर सर्वजनिक या सभी संबंधित पक्षों के विरुद्ध (इन रेम) प्रक्रिया में तब्दील हो जाता है। ऐसे में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के पास यह क्षेत्राधिकार और विवेक है कि वह ऋणदाताओं और हितधारकों के व्यापक हित में दिवाला प्रक्रिया को जारी रखे। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने कॉरपोरेट देनदार ‘थ्री सी शेल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड’ की दिवाला प्रक्रिया को पूरी तरह समाप्त कर दिया था, और मामले को एनसीएलटी के पास भेज दिया ताकि वह तय कर सके कि प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद गुरुग्राम के सेक्टर 89 में 47.218 एकड़ भूमि पर 1,862 फ्लैटों वाली “ग्रीनोपोलिस” नामक आवासीय रियल एस्टेट परियोजना से जुड़ा है। जमीन की मालिक कंपनी ओरिस इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड (“ओरिस”) ने 2 नवंबर 2011 को कॉरपोरेट देनदार मैसर्स थ्री सी शेल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ 65:35 के अनुपात में फ्लैट-साझाकरण समझौते (डेवलपमेंट एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद 2012-2013 के दौरान घर खरीदारों के साथ त्रिपक्षीय समझौते किए गए, जिसके अनुसार कॉरपोरेट देनदार को 36 महीने (छह महीने की अतिरिक्त छूट अवधि के साथ) के भीतर निर्माण पूरा करना था।
परियोजना में भारी देरी होने पर घर खरीदारों ने ‘ग्रीनोपोलिस वेलफेयर एसोसिएशन’ (जीडब्ल्यूए) का गठन किया और हरियाणा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (हरेरा) का रुख किया। हरेरा और हरियाणा रियल एस्टेट अपीलेट ट्रिब्यूनल (हरेट) दोनों ने पाया कि 2016 की शुरुआत से ही निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ा था। हरेरा ने 7 अक्टूबर 2020 को अपने आदेश में कहा कि कॉरपोरेट देनदार के पास कोई विकास अधिकार नहीं बचा है और लाइसेंसधारी व सहयोगी होने के नाते परियोजना को पूरा करने की प्राथमिक जिम्मेदारी ओरिस की है। साथ ही, कोटक महिंद्रा बैंक में मौजूद एस्क्रो खाते की राशि को एक समर्पित रेरा खाते में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया। दूसरी ओर, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने 20 जुलाई 2020 को दोनों कंपनियों को अपने-अपने आवंटियों के प्रति उत्तरदायी ठहराया।
इन्हीं कार्यवाहियों के बीच, मैसर्स स्ट्रेट एज कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने खुद को परिचालक ऋणदाता (ऑपरेशनल क्रेडिटर) बताते हुए लगभग 29.95 करोड़ रुपये के बकाया दावे के साथ दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (आईबीसी) की धारा 9 के तहत एनसीएलटी में याचिका दायर की। कॉरपोरेट देनदार के निदेशक द्वारा कर्ज स्वीकार करने का हलफनामा पेश किए जाने के बाद एनसीएलटी ने 20 जुलाई 2020 को याचिका स्वीकार कर ली। इसके बाद 16 अक्टूबर 2020 को एनसीएलटी ने अंतरिम समाधान पेशेवर (आईआरपी) की नियुक्ति की और मोराटोरियम (ऋण स्थगन) लागू कर दिया।
इसके बाद, कॉरपोरेट देनदार में 38.25% शेयर रखने वाली कंपनी ‘थ्री सी यूनिवर्सल डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड’ के समाधान पेशेवर (आरपी) ने एनसीएलटी के समक्ष अर्जी दाखिल कर गंभीर धोखाधड़ी का खुलासा किया। जांच में सामने आया कि कॉरपोरेट देनदार की ओर से कर्ज स्वीकार करने वाले और अदालती जवाब दाखिल करने वाले दो निदेशक—राजीव बसोया और गिरीश चंद्र जोशी—वास्तव में केवल कंपनी के ऑफिस बॉय और पैंट्री बॉय थे, जिन्हें कंपनी के कामकाज की कोई जानकारी नहीं थी और वे केवल डमी निदेशक बनाए गए थे।
एनसीएलटी ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि समझौते और सहमति पत्र (एमओयू) मनगढ़ंत और फर्जी थे, निर्माण कार्य 2016 में ही बंद हो चुका था जबकि अनुबंध 2017 में दिखाए गए थे, और कॉरपोरेट देनदार के एस्क्रो खाते में 53 करोड़ रुपये होने के बावजूद उसने जानबूझकर कथित ठेकेदार को भुगतान नहीं किया। एनसीएलटी ने स्पष्ट माना कि यह पूरी तरह धोखाधड़ी और मिलीभगत का मामला था। इसके बावजूद, एनसीएलएटी के पूर्ववर्ती ‘आदेश जैन’ फैसले का हवाला देते हुए एनसीएलटी ने 29 मार्च 2022 को कहा कि धारा 65 या अन्य किसी प्रावधान के तहत उसके पास अपने प्रवेश आदेश को वापस लेने या उसकी समीक्षा करने का अधिकार नहीं है, इसलिए सीआईआरपी जारी रहेगी।
इस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए एनसीएलएटी ने 28 अगस्त 2023 को एनसीएलटी का आदेश पलट दिया। एनसीएलएटी ने माना कि धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश को वापस लेने का अधिकार ट्रिब्यूनल के पास है, और इस आधार पर उसने पूरी दिवाला प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया। एनसीएलएटी के इस फैसले के खिलाफ ओरिस, ग्रीनोपोलिस वेलफेयर कन्फेडरेशन और अन्य व्यथित घर खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामजी श्रीनिवासन ने दलील दी कि सीआईआरपी प्रक्रिया काफी उन्नत चरण में पहुंच चुकी है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को अपने पूर्ववर्ती अंतरिम स्थगन आदेश को स्थायी कर देना चाहिए ताकि समाधान प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्ट्रेट एज कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा की गई धोखाधड़ी और मिलीभगत से आईबीसी की कार्यवाही को अलग किया जा सकता है। उन्होंने कंपनी (कोर्ट) रूल्स, 1959 के पुराने नियम 101 से 103 के सिद्धांतों का हवाला देते हुए दलील दी कि एक बार जब सीआईआरपी शुरू और स्वीकार हो जाती है, तो वह पूरी तरह से ‘इन रेम’ (सर्वजनिक हित से जुड़ी) कार्यवाही बन जाती है।
दूसरी तरफ, वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने दलील दी कि धोखाधड़ी और मिलीभगत पूरी प्रक्रिया को शुरुआत से ही दूषित कर देती है। उन्होंने एनसीएलएटी के उस फैसले का पुरजोर समर्थन किया जिसमें पूरी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दो मुख्य कानूनी सवालों पर विस्तार से विचार किया:
1. प्रवेश आदेश को वापस लेने का न्यायिक प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार
धोखाधड़ी के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि मैसर्स स्ट्रेट एज की गतिविधियां किसी भी तरह से सीधी नहीं थीं, बल्कि पूरी तरह से कुटिल थीं। पीठ ने कहा कि किसी कर्ज का वास्तविक अस्तित्व होना एक “क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य” (ज्यूरिसडिक्शनल फैक्ट) है। यह वह अनिवार्य शर्त है जिसके बिना कोई भी प्राधिकरण वैधानिक क्षेत्राधिकार ग्रहण नहीं कर सकता। ‘करोना लिमिटेड बनाम पार्वती स्वामीनाथन एंड संस’ और ‘सृष्ट धवन बनाम मैसर्स शॉ ब्रदर्स’ मामलों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि गलत बयानी या धोखे के आधार पर क्षेत्राधिकार ग्रहण करना आदेश को अधिकार-विहीन और अवैध बना देता है।
निजी मामलों में धोखाधड़ी और सार्वजनिक कानून में धोखाधड़ी के अंतर को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा: आईबीसी की प्रक्रिया शुरू करने वाले पक्षकारों पर एक सार्वजनिक कानून दायित्व और कर्तव्य होता है कि वे किसी को धोखा या गुमराह न करें। यदि धोखाधड़ी या मिलीभगत के आधार पर क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जाता है, तो अदालत या ट्रिब्यूनल किसी भी समय कार्यवाही वापस ले सकता है। धोखाधड़ी या मिलीभगत से प्रभावित क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य क्षेत्राधिकार ग्रहण करने का आधार नहीं बन सकते, क्योंकि ऐसे तथ्य क्षेत्राधिकार को बनाए नहीं रख सकते।
अदालत ने आगे दर्ज किया: वर्तमान मामले के तथ्यों में यह निर्णायक रूप से साबित हो चुका है कि कर्ज का अस्तित्व केवल एक मृगतृष्णा था; वास्तव में कोई कर्ज था ही नहीं। असल में, इसे धोखाधड़ी से इस तरह पेश किया गया था मानो कोई कर्ज मौजूद हो, ताकि न्यायिक प्राधिकरण सीआईआरपी कार्यवाही शुरू कर सके और मोराटोरियम लगा सके, जिससे घर खरीदारों और अन्य दावेदारों के कानूनी उपचारों को रोका जा सके।
अतः सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एनसीएलटी के पास धोखाधड़ी और मिलीभगत से हासिल किए गए प्रवेश आदेश को खारिज कर वापस लेने का पूरा अधिकार है।
2. अर्जी खारिज होने के बाद भी सीआईआरपी को जारी रखना
दूसरे प्रश्न पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल अर्जी में धोखाधड़ी पाए जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि पूरी दिवाला प्रक्रिया को स्वतः ही समाप्त कर दिया जाए। ‘ग्लास ट्रस्ट कंपनी एलएलसी बनाम बायजू रवींद्रन’ और ‘इंडस बायोटेक’ मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने समझाया कि धारा 7, 9 या 10 के तहत दायर याचिका केवल प्रवेश (एडमिशन) की सीमा तक ही दोनों पक्षों के बीच व्यक्तिगत (इन पर्सोनम) होती है।
एक बार जब याचिका स्वीकार हो जाती है, तो धारा 14 (मोराटोरियम), धारा 17 व 20 (आईआरपी को प्रबंधन सौंपना), धारा 18 (दावों का संग्रह), धारा 21 (ऋणदाताओं की समिति का गठन), धारा 25 (आरपी के कर्तव्य), धारा 30(2) (समाधान योजना की शर्तें), धारा 53 (परिसमापन जलप्रपात तंत्र) और धारा 12ए (एकतरफा वापसी पर रोक) के तहत यह प्रक्रिया सार्वजनिक या सामूहिक प्रकृति (इन रेम) ग्रहण कर लेती है।
पीठ ने रेखांकित किया कि शुरुआती लेनदार केवल एक उत्प्रेरक लेनदार होता है, न कि सीआईआरपी का मालिक। जब सैकड़ों स्वतंत्र लेनदारों और घर खरीदारों के दावे आमंत्रित और सत्यापित कर लिए जाते हैं, तो यह प्रक्रिया मूल याचिकाकर्ता से पूरी तरह अलग होकर संपत्ति के मूल्य संवर्धन और समाधान के व्यापक उद्देश्य से जुड़ जाती है। ऐसे में स्वतंत्र लेनदारों को दोबारा नई प्रक्रिया शुरू करने के लिए विवश करना आईबीसी के मूल उद्देश्य के विपरीत होगा।
अदालत ने निर्णय दिया कि कॉरपोरेट देनदार के निलंबित निदेशकों की मिलीभगत और धोखाधड़ी से धारा 9 की मूल अर्जी दाखिल किए जाने के निष्कर्ष के बाद भी दिवाला समाधान प्रक्रिया जारी रखी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के दृष्टिकोण में खामी पाई: एनसीएलटी ने यह मानकर गलती की कि उसके पास अपने आदेश को वापस लेने की शक्ति ही नहीं है, जबकि एनसीएलएटी ने यह गलती की कि उसने यह जांचे बिना पूरी सीआईआरपी को ही खत्म कर दिया कि क्या अन्य हितधारकों के हित में इस प्रक्रिया को जारी रखा जाना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश तय करते हुए कहा कि यदि एनसीएलटी किसी अर्जी को मिलीभगत से प्रेरित पाता है, तो वह मूल आवेदक को प्रक्रिया से बाहर कर देगा और उसके खिलाफ धारा 65 के तहत दंडात्मक कार्यवाही भी कर सकता है। लेकिन अगर समाधान प्रक्रिया को आगे बढ़ाना कॉरपोरेट देनदार और अन्य हितधारकों के व्यापक हित में है, तो ट्रिब्यूनल को समाधान पेशेवर, ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) और घर खरीदारों की राय सुनकर प्रक्रिया को आगे जारी रखने का पूरा अधिकार है।
अपीलों का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- ओरिस इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीनोपोलिस वेलफेयर कन्फेडरेशन और अन्य द्वारा दायर सिविल अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है और एनसीएलएटी का 28 अगस्त 2023 का आदेश रद्द किया जाता है।
- एनसीएलटी के समक्ष लंबित सीआईआरपी कार्यवाही (संख्या IB-2721/ND/2019) को उसके मूल नंबर पर बहाल किया जाता है।
- एनसीएलटी अब स्ट्रेट एज कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की धोखाधड़ी और मिलीभगत के निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए सीआईआरपी जारी रखने पर विचार करेगा। ट्रिब्यूनल परियोजना के स्वामित्व, आरपी की रिपोर्ट, सीओसी की राय और घर खरीदारों सहित सभी हितधारकों के पक्षों को सुनकर निर्णय लेगा।
- यदि एनसीएलटी सीआईआरपी को जारी रखने का फैसला करता है, तो इस मामले की लंबी पेंडेंसी को देखते हुए प्रक्रिया को शीघ्रता से पूरा किया जाए।
- संबंधित अवमानना याचिकाएं और अन्य सभी लंबित अर्जियां निस्तारित की जाती हैं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: ओरिस इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम राकेश कुमार गुप्ता व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 6797-6801/2023
पीठ: जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 30 सितंबर 2026

