केरल के त्रिशूर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक होम नर्सिंग एजेंसी को सेवा में गंभीर लापरवाही का दोषी ठहराते हुए हर्जाना भरने का आदेश दिया है। आयोग ने यह कार्रवाई एक लाचार बुजुर्ग महिला की देखभाल में तैनात नर्स के अचानक काम छोड़कर चले जाने और एजेंसी द्वारा कोई दूसरा कर्मचारी न भेजने पर की है। कंज्यूमर फोरम ने संबंधित एजेंसी को शिकायतकर्ता के 4,000 रुपये लौटाने के साथ ही 45 दिनों के भीतर मुआवजे और कानूनी खर्च के रूप में 20,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
सतत देखभाल की अनदेखी को आयोग ने माना गंभीर लापरवाही
आयोग के अध्यक्ष सी. टी. साबू, सदस्य श्रीजा एस. और राम Mohan R. की पीठ ने 6 अगस्त को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि होम केयर एजेंसी की सेवाएं लेने का मुख्य मकसद ही ऐसे लाचार व्यक्तियों की लगातार देखभाल सुनिश्चित करना होता है जो खुद अपना ध्यान नहीं रख सकते। आयोग ने कहा कि सेवा शुल्क वसूलने के बाद भी बिस्तर पर पड़ी बुजुर्ग महिला के लिए स्थानापन्न (सब्स्टीट्यूट) नर्स उपलब्ध न कराना सेवा में एक बड़ी चूक है।
अनुबंध और अचानक काम छोड़ने का पूरा मामला
यह मामला कामकाजी महिला सिंधु पॉल की शिकायत पर दर्ज किया गया था। सिंधु की वृद्ध और बिस्तर पर पड़ी मां अगस्त 2024 से एक वृद्धाश्रम में रह रही हैं। अपनी नौकरी के कारण मां की दैनिक देखभाल करने में असमर्थ होने पर, सिंधु ने एजेंसी के साथ अनुबंध किया था। इसके तहत 28 दिनों की सेवा अवधि के लिए 20,000 रुपये प्रति माह के भुगतान पर एक योग्य होम नर्स की तैनाती तय हुई थी।
शिकायतकर्ता के अनुसार, वे नियमित रूप से फीस जमा कर रही थीं। इसके बावजूद, सेवा के छठे महीने में यानी फरवरी 2025 के दौरान तैनात नर्स बिना किसी पूर्व सूचना या कारण के अचानक ड्यूटी छोड़कर चली गई, जिससे बुजुर्ग महिला पूरी तरह बेसहारा हो गईं।
एजेंसी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया और एकपक्षीय फैसला
सिंधु पॉल ने आयोग को बताया कि उन्होंने तुरंत दूसरी नर्स भेजने के लिए एजेंसी से बार-बार संपर्क किया, लेकिन हर बार सिर्फ मौखिक आश्वासन ही दिए गए और कोई नया कर्मचारी नहीं भेजा गया। इसके अलावा, एजेंसी ने अप्रयुक्त सेवा अवधि के 4,000 रुपये लौटाने से भी इनकार कर दिया और पैसे मांगने पर अभद्र व्यवहार किया।
जब उपभोक्ता फोरम ने एजेंसी को नोटिस भेजा, तो न तो उनकी ओर से कोई लिखित जवाब दाखिल किया गया और न ही कोई प्रतिनिधि उपस्थित हुआ। इसके चलते आयोग ने मामले की एकपक्षीय सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया।
मानसिक उत्पीड़न और वित्तीय नुकसान पर राहत का आदेश
शिकायतकर्ता को हुई मानसिक परेशानी, असुविधा और आर्थिक नुकसान को रेखांकित करते हुए आयोग ने माना कि नर्स के अचानक जाने से परिवार को भारी चिंता और दिक्कतों का सामना करना पड़ा। आयोग ने एजेंसी को निर्देश दिया कि वह अनुबंध की बची राशि 4,000 रुपये सिंधु को वापस करे। इसके अलावा, सेवा में कमी और मानसिक उत्पीड़न के एवज में 15,000 रुपये का मुआवजा तथा 5,000 रुपये अदालती खर्च के रूप में देने का फैसला सुनाया।

