इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी नाबालिग बेटी से यौन उत्पीड़न के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे उत्तराखंड के डॉक्टर और उनके भाई को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब माता-पिता के आपसी विवाद में पॉक्सो (POCSO) कानून का इस्तेमाल एक-दूसरे के खिलाफ हथियार की तरह किया जा रहा हो, तो बच्चे की गवाही का मूल्यांकन बेहद सतर्कता और सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए।
जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की डिवीजन बेंच ने वाराणसी की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट द्वारा फरवरी 2025 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। इस फैसले के साथ ही पीड़ित बच्ची के पिता (डॉक्टर) और उनके भाई पूरी तरह दोषमुक्त हो गए हैं। इस मामले में डॉक्टर को 2018 में गिरफ्तारी के बाद एक साल से अधिक समय जेल में बिताना पड़ा था, जिसके बाद फरवरी 2025 में निचली अदालत से सजा मिलने के बाद से वे दोबारा डेढ़ साल से अधिक समय से जेल में बंद थे।
बच्चे की गवाही को अत्यधिक सावधानी से परखने की जरूरत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सामान्य तौर पर बच्चे से सच बोलने की उम्मीद की जाती है। हालांकि, जब एक अभिभावक लगातार बच्चे के मन में यह बात बिठा देता है कि दूसरे अभिभावक ने उसके साथ अन्याय किया है, तो बच्चा उस अभिभावक के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चा अनजाने में झूठी बातों को भी सच मानकर अदालत में बयान देने लगता है।
अदालत ने पाया कि पीड़िता 2017 से लगातार अपनी मां के साथ रह रही थी और वैवाहिक कड़वाहट के मानसिक दबाव को झेल रही थी। गवाही के दौरान बच्ची द्वारा अपने पिता को नाम लेकर संबोधित करने से साफ होता है कि उसे पिता के खिलाफ नफरत के भाव रखने के लिए सिखाया-पढ़ाया (ट्यूटर) गया था।
इसके अलावा, पिता के उत्तराखंड स्थित आवास पर काम करने वाले घरेलू नौकरों ने आरोपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। अदालत में पेश की गई तस्वीरों में भी पिता और बेटी के बीच बेहद प्रेमपूर्ण संबंध दिखाई दिए, जिनमें बच्ची अपने पिता से गले मिलती नजर आ रही थी।
पति को फंसाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से केस दर्ज कराने का आरोप
मामले की शुरुआत जून 2018 में हुई, जब वाराणसी में कार्यरत पीड़िता की डॉक्टर मां ने अपने पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, मार्च 2018 में स्कूल की छुट्टियों के दौरान बच्ची 10 दिनों के लिए उत्तराखंड में अपने पिता के पास गई थी। मां का आरोप था कि दो महीने बाद जब बच्ची से गृहकार्य के दौरान पिता के लिए ‘डियर फादर’ (प्रिय पिता) लिखने को कहा गया, तो उसने ऐसा करने से मना कर दिया और कथित गलत स्पर्श व यौन उत्पीड़न की बात बताई।
मां ने प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई दो महीने की देरी की वजह परिवार की प्रतिष्ठा और रिश्तेदार की बीमारी को बताया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह देरी परिवार का सम्मान बचाने के लिए नहीं, बल्कि पति को उम्रकैद जैसी गंभीर सजा में फंसाने के लिए रची गई एक योजनाबद्ध रणनीति थी।
अस्पताल निर्माण और 3 करोड़ रुपये के लोन से शुरू हुआ विवाद
बचाव पक्ष के वकील राजीव द्विवेदी ने हाईकोर्ट में बताया कि यह पूरा मामला पति-पत्नी के बीच 2017 से चल रहे वित्तीय और संपत्ति विवाद का नतीजा था। विवाद तब शुरू हुआ जब पति ने पत्नी की मर्जी के खिलाफ वाराणसी के बजाय उत्तराखंड में अस्पताल का निर्माण शुरू कराया।
इसके बाद पत्नी ने अस्पताल निर्माण के लिए लिए गए 3 करोड़ रुपये के बैंक लोन के दस्तावेज में बतौर गारंटर अपना नाम वापस ले लिया। इसी तनावपूर्ण माहौल के दौरान जून 2018 में यह आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी।
निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट ने किया रद्द
मामले की जांच की शुरुआत में केस उत्तराखंड स्थानांतरित हुआ, जहां डॉक्टर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। बाद में 2019 में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें जमानत मिली। इसके बाद पत्नी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को वापस वाराणसी ट्रांसफर कर दिया।
फरवरी 2025 में वाराणसी की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने डॉक्टर और उनके भाई को दुष्कर्म और बार-बार यौन उत्पीड़न का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट में अपील के बाद भाई को जमानत मिल गई थी, जबकि डॉक्टर जेल में ही रहे। अब हाईकोर्ट ने दोनों भाइयों को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है।

