बेदखली का सामना कर रहे अनधिकृत कब्जाधारी को भी बिजली पाने का हक: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कोलकाता बिजली आपूर्ति निगम (सीईएससी) को निर्देश दिया है कि वह संपत्ति विवाद का सामना कर रही एक महिला को तीन सप्ताह के भीतर बिजली का नया कनेक्शन प्रदान करे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन जीने के लिए बिजली एक अनिवार्य आवश्यकता है।

जस्टिस शम्पा सरकार और जस्टिस अर्जुन राय मुखर्जी की डिविजन बेंच ने जून 2022 के सिंगल जज के आदेश को खारिज करते हुए यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जब तक किसी सक्षम सिविल कोर्ट से बेदखली का अंतिम आदेश जारी नहीं हो जाता, तब तक किसी परिसर में रह रहे व्यक्ति या अनधिकृत कब्जाधारी को भी बिजली आपूर्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार

गत 10 अगस्त को दिए फैसले में डिविजन बेंच ने जोर देकर कहा कि बिजली एक आवश्यक वस्तु है जो सीधे तौर पर व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन से जुड़ी हुई है। पीठ ने टिप्पणी की कि बिना बिजली के किसी भी संपत्ति का उपयोग करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। ऐसे में याचिकाकर्ता का अस्थायी रूप से वहां न रहना या संपत्ति से जुड़ा विवाद लंबित होना बिजली कनेक्शन रोकने का आधार नहीं बन सकता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि बिजली कनेक्शन मिलने से याचिकाकर्ता को संपत्ति पर कोई मालिकाना हक, स्वामित्‍व या कानूनी अधिकार हासिल नहीं होगा। यह बिजली कनेक्शन दोनों पक्षों के बीच चल रहे सिविल मुकदमे के अंतिम फैसले के अधीन ही रहेगा।

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जिला मजिस्ट्रेट के हस्तक्षेप पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

यह मामला उस समय हाईकोर्ट की डिविजन बेंच पहुंचा जब याचिकाकर्ता ने जून 2022 के सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उन्हें अपनी अर्जी लेकर जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने का निर्देश दिया गया था। महिला ने संबंधित परिसर में अपने कब्जे के अधिकार के आधार पर सीईएससी से नए बिजली कनेक्शन की मांग की थी, लेकिन मकान मालिकों के विरोध के बाद कंपनी ने आवेदन पर कार्रवाई रोक दी थी।

महिला की तरफ से पैरवी कर रहे वकील तारक नाथ हालदार, साग्निक चटर्जी और सायन मुखर्जी ने तर्क दिया कि बिजली कनेक्शन देने से जुड़े विवाद का फैसला करने का कानूनी अधिकार जिला मजिस्ट्रेट के पास नहीं है।

डिविजन बेंच ने याचिकाकर्ता के वकीलों के तर्क को स्वीकार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र केवल तब लागू होता है जब बिजली वितरण कंपनी को किसी तीसरे पक्ष की संपत्ति से होकर केबल या लाइन बिछानी होती है। चूंकि यहां महिला सीधे उस परिसर पर अपने कब्जे का दावा कर रही थी, इसलिए मामले को प्रशासनिक अधिकारी के पास भेजना अनुचित था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सीईएससी को सीधे कनेक्शन जारी करने का आदेश दिया।

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मकान मालिकों के दावे और कानूनी पृष्ठभूमि

मामले में निजी उत्तरदाताओं यानी मकान मालिकों ने महिला के दावों को खारिज करते हुए आरोप लगाया था कि जिस हस्तांतरण समझौते के आधार पर वह कब्जे का दावा कर रही है, वह पूरी तरह से फर्जी और अवैध दस्तावेज है। मकान मालिकों ने महिला के मालिकाना हक पर सवाल उठाते हुए निचली अदालत में उसके खिलाफ लंबित बेदखली के मुकदमे का हवाला भी दिया था।

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अदालत ने इन तर्कों को सुनते हुए दोहराया कि सिविल कोर्ट से अंतिम बेदखली आदेश पारित होने तक महिला को बिजली आपूर्ति पाने से रोका नहीं जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने बिजली कंपनी को निर्धारित समय-सीमा के भीतर कनेक्शन जोड़ने का निर्देश दिया।

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