इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट निर्णय दिया है कि साइबर अपराध की जांच के दौरान जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति के पूरे बैंक खाते पर पूर्ण प्रतिबंध (ब्लैंकेट डेबिट फ्रीज) नहीं लगा सकतीं। अदालत ने जोर देकर कहा कि वित्तीय पाबंदियां केवल अपराध की संदिग्ध राशि तक ही सीमित और आनुपातिक होनी चाहिए।
जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने लखनऊ के निर्माण सामग्री व्यवसायी रितेश यादव की याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश जारी किया। हाईकोर्ट ने बैंकों को निर्देश दिया कि यादव के खातों को तुरंत अनफ्रीज किया जाए और उन्हें विवादित ₹36,000 की राशि को छोड़कर बाकी सभी जमा राशि का उपयोग करने की अनुमति दी जाए। बैंक केवल इस विवादित ₹36,000 की राशि पर अपना लीन (अधिकार) बरकरार रखेंगे।
याचिकाकर्ता रितेश यादव के बंधन बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एक्सिस बैंक समेत कई प्रमुख बैंकों के खाते पूरी तरह से ब्लॉक कर दिए गए थे। यह कार्रवाई कर्नाटक में दर्ज एक साइबर अपराध मामले की जांच के सिलसिले में उनके बंधन बैंक खाते में ₹36,000 की संदिग्ध राशि क्रेडिट होने के बाद की गई थी।
आनुपातिक प्रतिबंध और जांच अधिकारियों के लिए नियम
सुनवाई के दौरान पीठ ने रेखांकित किया कि साइबर धोखाधड़ी की जांच के दौरान खाते फ्रीज करने का अधिकार कोई असीमित शक्ति नहीं है, जिसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति के पूरे वित्तीय जीवन या वैध व्यापारिक गतिविधियों को ठप्प करने के लिए किया जाए।
अदालत के निर्देशानुसार, जांच अधिकारियों को अब बैंकों को प्राथमिकी (FIR) या केस विवरण, खाते पर रोक लगाने का ठोस आधार और उस सटीक राशि की जानकारी देनी होगी जिस पर लीन लगाया जाना है। इसके अलावा, अधिकारियों के लिए कानून के तहत संबंधित क्षेत्राधिकार के न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस प्रकार की कार्रवाई की जानकारी देना भी अनिवार्य होगा।
पूर्व निर्णय और शिकायत निवारण तंत्र
हाईकोर्ट ने अपने 19 जनवरी के निर्णय ‘खालसा मेडिकल स्टोर बनाम आरबीआई’ का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि साइबर अपराध मामलों में बैंक खाता फ्रीज करने के नोटिस में लीन राशि का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। अदालत के अनुसार संपूर्ण खाता निलंबित करने का आदेश आमतौर पर कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता।
इसके साथ ही पीठ ने गृह मंत्रालय के मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का उल्लेख किया, जो नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के ‘सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम’ के तहत लागू है। हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को इस व्यवस्था को अपनाने, समर्पित नोडल अधिकारी तैनात करने और अपनी शाखाओं व वेबसाइटों पर शिकायत निवारण प्रक्रिया को प्रमुखता से प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया है।
रिजर्व बैंक को निर्देश और आदेश का उद्देश्य
हाईकोर्ट ने इस फैसले की प्रति भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को भेजने का आदेश दिया है ताकि इसे सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में प्रसारित किया जा सके और परिचालन कर्मचारियों को शिकायत निवारण प्रक्रिया की पूरी जानकारी मिल सके।
जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का उद्देश्य जांच एजेंसियों के वैधानिक अधिकारों को कम करना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच शक्तियों का प्रयोग पारदर्शी, आनुपातिक और न्यायसंगत तरीके से हो, ताकि किसी एक विवादित लेनदेन के कारण किसी निर्दोष खाताधारक को उसकी वैध धनराशि से अनिश्चित काल के लिए वंचित न होना पड़े।

