नेपाली नागरिकता के आधार पर कैदी को पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने डकैती और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी को चार हफ्ते की पैरोल दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल नेपाली नागरिक होने के आधार पर किसी कैदी को अस्थाई रिहाई से वंचित नहीं किया जा सकता, बशर्ते उसका परिवार दशकों से भारत में रह रहा हो।

राज्य सरकार की आपत्तियों को हाईकोर्ट ने किया खारिज

23 जून को पैरोल याचिका खारिज करने के प्रशासनिक आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस राकेश कैंथला की पीठ ने 12 अगस्त को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कैदी की याचिका को स्वीकार करते हुए उसे 1 लाख रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और इतनी ही राशि के दो ज़मानत बॉन्ड जमा करने पर चार सप्ताह के लिए रिहा करने का निर्देश दिया।

इससे पहले राज्य प्रशासन ने कैदी की नेपाली नागरिकता, अपराध की संगीनता और नेपाल भागने की आशंका जताते हुए पैरोल का विरोध किया था। इसके जवाब में कैदी के वकील ने साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका परिवार पिछले 30 से 35 वर्षों से उत्तराखंड के नैनीताल में निवास कर रहा है और वहां उनके पास पैतृक घर व संपत्ति भी मौजूद है।

सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के खतरे का कोई प्रमाण नहीं

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मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टैम्परेरी रिलीज) एक्ट, 1968 की धारा 6 और प्रिजनर्स रूल्स के नियम 3(2) का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि इन कानूनी प्रावधानों के तहत पैरोल केवल तभी रोकी जा सकती है जब कैदी की अस्थाई रिहाई से राज्य की सुरक्षा या जन-व्यवस्था के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा होता हो।

जस्टिस कैंथला ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार ऐसा कोई भी ठोस या विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत करने में विफल रही, जिससे कैदी की रिहाई से सुरक्षा संबंधी कोई जोखिम साबित हो सके। ‘अर्जुन बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य’ मामले के पूर्व फैसले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि विदेशी नागरिकता अपने आप में पैरोल से वंचित करने का वैध आधार नहीं है।

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सुधारत्मक दृष्टिकोण और पारिवारिक संबंध

सुप्रीम कोर्ट के ‘अश्फाक बनाम राजस्थान राज्य’ मामले के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल का मुख्य उद्देश्य कैदी को अपने पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को बनाए रखने का अवसर प्रदान करना है, जो कि जेल सुधार प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है।

अदालत ने कैदी के जेल में संतोषजनक आचरण को भी रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि जब कैदी के खिलाफ कोई प्रतिकूल तथ्य मौजूद न हो, तो केवल अपराध की गंभीरता की आड़ में अनिश्चितकाल के लिए पैरोल रोकना कानून के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है।

2013 के मामले में हुई थी सजा

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संबंधित कैदी को हिमाचल प्रदेश के बग्गा पुलिस स्टेशन में दर्ज 2013 के एक मामले में 30 दिसंबर 2021 को दोषी ठहराया गया था। उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र) और धारा 396 (डकैती के दौरान हत्या) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जो साथ-साथ चल रही है।

हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार, चार हफ्ते की पैरोल अवधि के दौरान कैदी को अच्छा आचरण बनाए रखना होगा और वह प्रोबेशन अधिकारी की देखरेख में रहेगा। पैरोल अवधि पूरी होने पर उसे वापस जेल में आत्मसमर्पण करना होगा। इसके अलावा, जेल अधीक्षक को रिहाई के समय आवश्यकतानुसार अन्य उपयुक्त शर्तें जोड़ने का अधिकार दिया गया है।

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