हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग ने गलत खाते में गलती से ट्रांसफर हुई रकम वापस कराने में लापरवाही बरतने पर एक निजी बैंक को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने बैंक को पीड़ित ग्राहक के 45,000 रुपये लौटाने के साथ ही मानसिक उत्पीड़न और अदालती खर्च के मद में 20,000 रुपये का मुआवजा देने का फैसला सुनाया है।
जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष गगन कुमार गुप्ता, सदस्य अमरीश रावत और रंजना गोयल की पीठ ने 21 जुलाई को यह आदेश दिया। आयोग ने बैंक को निर्देश दिया कि वह ग्राहक को मूल राशि 45,000 रुपये वापस करे। इसके अलावा मानसिक संताप के लिए 10,000 रुपये तथा कानूनी प्रक्रिया के खर्च के रूप में 10,000 रुपये का अलग से भुगतान करे।
मोबाइल बैंकिंग से हुई थी गलत ट्रांजेक्शन
यह मामला 10 जनवरी 2019 का है, जब रुड़की के सिविल लाइंस स्थित बैंक शाखा के एक ग्राहक ने अपने परिचित को मोबाइल बैंकिंग के जरिए 45,000 रुपये भेजने का प्रयास किया था। हालांकि, एक गलती के कारण यह राशि किसी अन्य अनजान व्यक्ति के बैंक खाते में स्थानांतरित हो गई।
घटना के तुरंत बाद ग्राहक ने मामले की जानकारी बैंक अधिकारियों को दी। उस समय बैंक प्रतिनिधियों ने भरोसा दिलाया था कि दो से चार दिनों के भीतर उस व्यक्ति के खाते से पैसा निकालकर पीड़ित को वापस दिला दिया जाएगा और उन्हें इस संबंध में सूचित भी किया जाएगा। हालांकि, ग्राहक के बार-बार संपर्क करने के बावजूद न तो पैसा वापस निकाला गया और न ही पीड़ित के खाते में जमा किया गया।
बैंक की अनुपस्थिति पर एकतरफा कार्रवाई
जब बैंक ने समय रहते खाते से पैसे की निकासी रोकने या रकम वापस दिलाने का कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो पीड़ित ने 19 मार्च 2019 को कानूनी नोटिस भेजा। इसके बाद भी समाधान न निकलने पर उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। अपने परिवाद में पीड़ित ने 45,000 रुपये की वापसी के साथ 15,000 रुपये मुकदमों के खर्च की मांग की थी।
बैंक ने कानूनी नोटिस के जवाब में घटना को तो स्वीकार किया, लेकिन आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने के लिए कई अवसर मिलने के बावजूद वह उपस्थित नहीं हुआ। इस कारण आयोग ने मामले में एकतरफा (एक्स-पार्टी) सुनवाई की।
सेवा में कमी मानते हुए आयोग की टिप्पणी
आयोग ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेज और हलफनामा बिना किसी विरोध के साबित होते हैं। फोरम ने स्पष्ट किया कि ग्राहक को केवल मौखिक आश्वासन देना और पैसे सुरक्षित निकालने के लिए समय पर कदम न उठाना सेवा में लापरवाही और कमी को दर्शाता है। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि बैंक द्वारा कानूनी नोटिस के दिए गए जवाब से भी गलत ट्रांजेक्शन की पुष्टि हुई थी।

