जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस जे. बी. पारदीवाला की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपनी पत्नी की कथित हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत पुलिस के समक्ष दर्ज बयानों के आधार पर किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। निचली अदालत और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसलों को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालत के समक्ष दी गई शपथबद्ध गवाही ही न्यायिक निर्णय का आधार होती है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ एक भी आपराधिक परिस्थिति साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 6 मई 2013 का है, जब दंपति के वैवाहिक घर में हुए विवाद के बाद पत्नी की जलने से मृत्यु हो गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शराब का आदी पति अपनी पत्नी के काम पर जाने के बाद घर में रखे पैसे ले गया था। जब पत्नी ने घर लौटने पर इस बारे में सवाल किया, तो पति ने गुस्से में आकर उस पर मिट्टी का तेल छिड़क दिया और आग लगाकर मौके से फरार हो गया। 96 प्रतिशत तक जल चुकी महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई।
ट्रायल कोर्ट ने पति को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। यह सजा मुख्य रूप से दो मृत्युपूर्व बयानों (डाइंग डिक्लेरेशन), पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत पति द्वारा घर में हुई मौत का स्पष्टीकरण न दिए जाने के आधार पर दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (पति) की ओर से पेश वकील सतिंदर सिंह गुलाटी ने तर्क दिया कि दोनों मृत्युपूर्व बयानों में घटना के कारण (मोटिव) को लेकर गंभीर विरोधाभास हैं। उन्होंने कहा कि पहला मृत्युपूर्व बयान कानूनी रूप से साबित ही नहीं हुआ था क्योंकि इसे दर्ज करने वाले हेड कांस्टेबल का निधन हो चुका था। इसके अलावा, मृतका के करीबी रिश्तेदारों—उसकी बहन (PW1), मौसेरे भाई (PW2) और मां (PW3)—ने अदालत में गवाही के दौरान आरोपी पर कोई आरोप नहीं लगाया, फिर भी अभियोजन पक्ष ने उन्हें पक्षद्रोही (हॉस्टाइल) घोषित नहीं किया। बचाव पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने जिरह में स्वीकार किया था कि 80 से 90 प्रतिशत तक जला हुआ व्यक्ति ही बयान देने के लिए मानसिक रूप से फिट हो सकता है, जिससे 96 प्रतिशत जली पीड़िता के बयानों पर गहरा संदेह पैदा होता है।
आंध्र प्रदेश राज्य की ओर से उपस्थित सरकारी वकील प्रेरणा सिंह ने निचली अदालतों के फैसलों का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि बयानों में विरोधाभास केवल पुरानी घटनाओं से संबंधित थे, मुख्य अपराध से नहीं, जहां पीड़िता ने सीधे अपने पति पर आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि भले ही बयान दर्ज करने वाले हेड कांस्टेबल की मृत्यु हो गई थी, लेकिन सब-इंस्पेक्टर ने उस बयान की पुष्टि की थी। राज्य ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने रिश्तेदारों की गवाही को इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उन्हें आरोपी द्वारा अपने पक्ष में कर लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सीय साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और जांच की प्रक्रियाओं की कमियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि सिर की त्वचा (स्कैल्प) पर जलने के निशान ह्त्या की बजाय आत्महत्या की संभावना की ओर अधिक इशारा करते हैं:
“पोस्ट-मॉर्टम सर्टिफिकेट को देखने पर, आरोपी द्वारा मृतका पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगाने के सिद्धांत पर हमें संदेह हुआ, क्योंकि सिर की त्वचा (स्कैल्प) पर भी जलने के निशान थे। यह स्थिति इस ओर अधिक संकेत करती है कि मृतका ने स्वयं पर मिट्टी का तेल डाला था, जिसके परिणामस्वरूप सिर पर जलने की चोटें आई होंगी।”
मृतका के परिजनों (PW1 से PW3) के बयानों का विश्लेषण करते हुए अदालत ने पाया कि वे चीख-पुकार सुनकर मौके पर पहुंचे थे, जहां उन्होंने महिला को जलते हुए देखा और आरोपी भी वहां मौजूद रहकर आग बुझाने का प्रयास कर रहा था। जिरह के दौरान गवाहों ने बताया कि मृतका ने अपनी पुरानी बीमारियों के कारण आत्महत्या की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा परिजनों के बयानों को धारा 161 CrPC के पुलिस बयानों के आधार पर खारिज करने की कड़ी आलोचना की। कानूनी मानक को स्पष्ट करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 161 के बयान दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते और केवल अदालत में दी गई गवाही ही मान्य होती है:
“PW1 से PW3 को कभी भी पक्षद्रोही (हॉस्टाइल) घोषित नहीं किया गया और न ही अदालत में जिरह के दौरान आरोपी को दोषमुक्त करने व आत्महत्या का सिद्धांत प्रस्तुत करने के बाद उनसे पुन: पूछताछ (री-एग्जामिनेशन) की गई। हाईकोर्ट ने गवाहों की गवाही को उनके पिछले बयानों के विपरीत मानकर गंभीर भूल की, जबकि न तो पिछला बयान गवाहों के सामने रखा गया था और न ही जांच अधिकारी के समक्ष उन बयानों का मिलान कराया गया था। PW1 से PW3 अभियोजन पक्ष के मामले का बिल्कुल भी समर्थन नहीं करते हैं।”
मृत्युपूर्व बयानों की जांच करते हुए पीठ ने समय-सीमा में भारी विसंगतियां पाईं। सब-इंस्पेक्टर (PW8) ने दावा किया कि उसे दर्ज बयान 8 मई 2013 को रात 1:00 बजे मिला, जबकि दस्तावेज के अनुसार बयान 7 मई 2013 को सुबह 8:30 बजे से 9:15 बजे के बीच दर्ज किया गया था—जिससे FIR दर्ज करने में 15 घंटे की स्पष्ट देरी हुई। इसके अलावा, कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज दूसरा मृत्युपूर्व बयान 7 मई को सुबह 8:55 बजे का दर्शाया गया था, जो ठीक वही समय था जब हेड कांस्टेबल पहला बयान दर्ज कर रहा था।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के संबंध में, अदालत ने पति के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने से इनकार कर दिया, क्योंकि गवाहों ने पुष्टि की थी कि वह मौके पर मौजूद था और आग बुझाने की कोशिश कर रहा था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
यह निष्कर्ष निकालते हुए कि अभियोजन पक्ष हत्या या आरोपी के खिलाफ किसी भी संदिग्ध परिस्थिति को साबित करने में विफल रहा, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया:
“हमें ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं मिलता है। मुकदमे में अभियोजन पक्ष द्वारा एक भी परिस्थिति साबित नहीं की गई है और मृत्यु आत्महत्या के कारण होने का संदेह अभियोजन के पक्ष पर अविश्वास पैदा करता है, क्योंकि हमारे मन में वाजिब संदेह बना हुआ है। अभियोजन पक्ष एक भी परिस्थिति साबित करने में विफल रहा, इसलिए आरोपी को बरी किया जाता है।”
अदालत ने अपीलकर्ता को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तथा जमानत पर होने की स्थिति में उसके बेल बॉन्ड रद्द करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: जुपुडी सुरेश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 4849/2025
पीठ: जस्टिस के. विनोद चंद्रन, जस्टिस जे. बी. पारदीवाला
निर्णय की तिथि: 11 अगस्त 2026

