इंदौर की तीन साल की बच्ची अनिका शर्मा के दुर्लभ बीमारी ‘स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी टाइप-2’ के इलाज में आ रही 1 करोड़ रुपये की वित्तीय कमी को दूर करने के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से विशेष कदम उठाने की उम्मीद जताई है। हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के जस्टिस संदीप एन भट्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार इस विशेष मामले को असाधारण परिस्थिति के रूप में देखते हुए मदद का रास्ता निकाल सकती है, ताकि मासूम का इलाज बिना किसी देरी के शुरू हो सके।
क्राउडफंडिंग और सरकारी मदद के बाद भी 1 करोड़ का अंतर
अदालत को सूचित किया गया कि इस बीमारी के लिए आवश्यक जीवनरक्षक इंजेक्शन की कुल कीमत लगभग 9.55 करोड़ रुपये है। केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सहायता योजना के तहत अधिकतम 50 लाख रुपये की सहायता मिलती है। याचिकाकर्ता के वकील चंचल गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और धर्मार्थ संस्थाओं द्वारा चलाए गए क्राउडफंडिंग अभियानों से करीब 8 करोड़ रुपये की राशि जुटाई जा चुकी है, जो वर्तमान में इन संस्थाओं के पास जमा है।
सरकारी सहायता के 50 लाख रुपये और जुटाए गए 8 करोड़ रुपये को मिलाकर भी 1 करोड़ रुपये की कमी बनी हुई है। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार इस विशेष स्थिति में अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने पर विचार करे। इसके अलावा, राज्य सरकार और अन्य सामाजिक संस्थाओं को भी सहायता के लिए आगे आने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त तय की गई है।
एम्स दिल्ली में फंड ट्रांसफर के निर्देश
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को क्राउडफंडिंग से जुड़ी संस्थाओं का पूरा ब्योरा प्रस्तुत करने और एक हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। इसमें यह प्रतिबद्धता होनी चाहिए कि इंजेक्शन का आधिकारिक बिल प्राप्त होते ही यह 8 करोड़ रुपये की राशि सीधे ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नई दिल्ली को ट्रांसफर कर दी जाएगी। इसके साथ ही दवा निर्माता कंपनी नोवार्टिस द्वारा जारी बिल को भी सीधे एम्स को भेजने के आदेश दिए गए हैं।
क्या है स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी?
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) टाइप-2 एक गंभीर आनुवंशिक न्यूरोमस्कुलर विकार है। इस बीमारी में रीढ़ की हड्डी में मौजूद मोटर न्यूरॉन्स धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं। ये मोटर न्यूरॉन्स मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी की ऐसी विशेष कोशिकाएं होती हैं, जो मांसपेशियों को सांस लेने, निगलने और बोलने जैसे आवश्यक कार्यों के लिए सिग्नल भेजती हैं। इनके नष्ट होने से मरीज की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर और निष्क्रिय हो जाती हैं।

