डिस्चार्ज के चरण में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को महज इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि अग्रिम जांच कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया है जिनके तहत छह आरोपियों की डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी गई थी और उनके खिलाफ आरोप तय किए गए थे। जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पुलिस द्वारा की गई अग्रिम जांच प्रक्रियात्मक रूप से कानून की नजर में गलत थी, फिर भी गंभीर चोटों की संभावना को खारिज करने वाली मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर डिस्चार्ज आवेदन तय करते समय विचार किया जाना अनिवार्य है।

मामले का पृष्ठभूमि

यह मामला मथुरा जिले के थाना गोवर्धन में 6 मई 2024 को हुई एक घटना के संबंध में 9 मई 2024 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। मामला भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, 427, 352, 323, 504 और 506 के तहत दर्ज किया गया था। जांच के दौरान शुरुआती मेडिको-लीगल रिपोर्ट में पसली में फ्रैक्चर की बात सामने आने पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 325 और 308 जोड़ते हुए 22 मई 2024 को चार्जशीट दाखिल कर दी। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट नंबर 1, मथुरा ने 31 मई 2024 को इस चार्जशीट पर कॉग्निजेंस (संज्ञान) ले लिया।

चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही, दूसरे आवेदक ने 8 मई और 16 मई 2024 को जिलाधिकारी (डीएम) मथुरा के समक्ष घायल का दोबारा मेडिकल कराने के लिए आवेदन दिया था। इस पर डीएम मथुरा ने 31 मई 2024 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया। 10 अगस्त 2024 को मेडिकल बोर्ड ने राय दी कि घायल की पसलियों में कोई फ्रैक्चर या गंभीर चोट नहीं आई थी।

मेडिकल बोर्ड की इस रिपोर्ट के आधार पर आवेदक ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) मथुरा के समक्ष धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत अग्रिम जांच की मांग की। 7 नवंबर 2024 को दिए गए आदेश के बाद पुलिस ने अग्रिम जांच की और 19 नवंबर 2024 को पूरक चार्जशीट पेश की, जिसमें से धारा 325 और 308 हटा दी गई।

हालांकि, अपर सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट-1 (महिलाओं के विरुद्ध अपराध), मथुरा ने 6 मई 2026 को आवेदकों की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी और 26 मई 2026 को धारा 325 और 308 सहित सभी धाराओं में आरोप तय कर दिए। इसके बाद आवेदकों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।

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पक्षों की बहस

आवेदकों के वकील श्री राम प्रकाश द्विवेदी और श्री प्रांशु द्विवेदी ने तर्क दिया कि शुरुआती चार्जशीट अनुचित जल्दबाजी में दाखिल की गई थी। बाद में गठित मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट रूप से शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट का खंडन करते हुए फ्रैक्चर होने की बात को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने डिस्चार्ज अर्जी तय करते समय और आरोप तय करते समय पूरक चार्जशीट तथा मेडिकल बोर्ड के निष्कर्षों की पूरी तरह से अनदेखी करके गलती की है।

दूसरी ओर, विपक्षी संख्या 2 के वकील श्री राजेश्वर प्रसाद सिन्हा (जिन्हें श्री प्रदीप कुमार राय का सहयोग प्राप्त था) और राज्य की ओर से उपस्थित अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि 31 मई 2024 को कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के बाद, आरोपी के आवेदन पर अग्रिम जांच शुरू करने का पुलिस अधिकारी के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसला बोहाती देवी (मृतक) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [2023 लाइवलॉ (एससी) 376] का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आरोपियों को धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत अग्रिम जांच की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। इसके अलावा, प्रमोद कुमार व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [(2026) 5 एसएससी 308] का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि संज्ञान लेने के बाद अग्रिम जांच का निर्देश देने का अधिकार केवल अदालत के विवेक पर निर्भर करता है और जिलाधिकारी के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

कानूनी तर्कों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि आरोपी के पास धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत अग्रिम जांच की मांग करने का कोई निहित अधिकार नहीं है और अदालत की अनुमति के बिना पुलिस द्वारा की गई अग्रिम जांच कानून की नजर में गलत थी, लेकिन मेडिकल बोर्ड के गठन और उसकी रिपोर्ट का मामला अलग है।

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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बोहाती देवी मामले के फैसले को उद्धृत करते हुए उल्लेख किया:

“यदि आरोपी उस मामले में चार्जशीट से व्यथित है, तो उसके पास उपलब्ध उपाय या तो धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर करना है और/या संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष डिस्चार्ज के लिए एक उचित आवेदन देना है और यह हाईकोर्ट और/या विद्वान मजिस्ट्रेट पर निर्भर है कि वे आपराधिक कार्यवाही को रद्द करें या आरोपी को डिस्चार्ज करें।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही संज्ञान के बाद अदालत की अनुमति के बिना अग्रिम जांच अमान्य थी, लेकिन मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट अग्रिम जांच के दायरे में नहीं आती। तीन डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड का निष्कर्ष एक अकेले डॉक्टर की शुरुआती रिपोर्ट से अधिक विश्वसनीय और उच्च प्राधिकार रखता है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“न्यायशास्त्र विशेष रूप से यह परिभाषित करता है कि यद्यपि न्याय मांगने वाले व्यक्ति द्वारा अपनाई गई कानून की प्रक्रिया गलत हो सकती है, लेकिन न्याय देने के रूप में कानून को निर्धारित करने वाली प्रक्रिया के सार पर न्यायाधीश द्वारा विचार किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने आगे कहा:

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“यदि डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड द्वारा व्यक्त की गई आगे की मेडिको लीगल परीक्षा रिपोर्ट पर संबंधित विद्वान अदालत द्वारा विचार नहीं किया जाएगा, तो यह किसी को भी लाभ देने से परे दोनों पक्षों के साथ भारी अन्याय होगा और इसलिए, आदेश दिनांक 06.05.2026 जिसके द्वारा डिस्चार्ज का आवेदन खारिज कर दिया गया था, आरोप तय करने के आदेश के साथ रद्द किए जाने योग्य है।”

जिलाधिकारी के निर्देश के संबंध में कोर्ट ने नोट किया कि डीएम ने उसी दिन निर्देश दिया था जिस दिन अदालत ने संज्ञान लिया था, जिसका अर्थ है कि संज्ञान का आदेश डीएम के संज्ञान में नहीं था और प्रक्रिया में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो मेडिकल बोर्ड के गठन को रोके।

हाईकोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 6 मई 2026 और 26 मई 2026 के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आवेदकों को तीन सप्ताह के भीतर मेडिकल बोर्ड के निष्कर्षों को शामिल करते हुए एक नया डिस्चार्ज आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह सभी पक्षों को सुनने का उचित अवसर देते हुए चार सप्ताह के भीतर नए आवेदन पर निर्णय ले। इस प्रकार याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: जगदीश उर्फ जगदीश प्रसाद और 5 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: आवेदन यू/एस 528 बीएनएसएस संख्या 27098 वर्ष 2026
पीठ: जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 31 जुलाई 2026

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