इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक अधिकारी उन पाबंदियों और शासनादेशों को पिछले दरवाजे से लागू नहीं कर सकते, जिन्हें वे खुद इस मामले में अप्रभावी मान चुके हैं। अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा वर्ष 2017 में जारी किराया औचित्य प्रमाण पत्र (जस्टिफिकेशन सर्टिफिकेट) को मनमाने ढंग से वापस लेने और निजी अनाज गोदामों का किराया अनुशंसित 1,200 रुपये के बजाय 350 रुपये प्रति 100 बोरा तय करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रशासनिक निकाय कानून से बचने के लिए शक्तियों का छद्म प्रयोग (कलरेबल एक्सरसाइज ऑफ पावर) नहीं कर सकते, न ही बिना ठोस कारण बताए आदेश पारित कर सकते हैं और न ही समान स्थिति वाले गोदाम मालिकों के साथ भेदभाव कर सकते हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला प्रतापगढ़ जिले के सदर तहसील अंतर्गत रंजीतपुर, चिलबिला में इलाहाबाद-फैजाबाद मुख्य मार्ग पर स्थित दो व्यावसायिक गोदामों से जुड़ा है, जिनकी मालकिन सुधा अग्रवाल हैं। गोदाम संख्या-1 (क्षमता 10,736 बोरा) और गोदाम संख्या-2 (क्षमता 19,282 बोरा) का निर्माण सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के खाद्यान्न भंडारण के लिए किया गया था, क्योंकि उस क्षेत्र में खाद्य एवं रसद विभाग के पास अपने सरकारी गोदाम उपलब्ध नहीं थे।
गोदाम संख्या-1 को 11 मार्च 2003 को 0.80 रुपये प्रति 100 बोरा के मासिक किराए पर लिया गया था, जबकि गोदाम संख्या-2 को 8 सितंबर 2006 को 1.75 रुपये प्रति 100 बोरा की दर से किराए पर लिया गया। इसके बाद समय-समय पर किराए का नवीनीकरण हुआ। जिलाधिकारी ने 19 सितंबर 2013 को औचित्य प्रमाण पत्र जारी कर दोनों गोदामों का किराया 300 रुपये प्रति 100 बोरा तय किया, जिसे राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2017 तक की अवधि के लिए मंजूरी दी थी। इस अवधि तक दोनों पक्षों के बीच कोई विवाद नहीं था।
अनुबंध की अवधि 31 मार्च 2017 को समाप्त होने पर याचिकाकर्ता ने किराया बढ़ाने की मांग की। तहसीलदार की स्थानीय जांच के आधार पर उपजिलाधिकारी (एसडीएम) ने 29 नवंबर 2017 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में बताया गया कि क्षेत्र में सर्किल रेट में 4.75 गुना तक की बढ़ोतरी हुई है, इसलिए किराए में चार गुना वृद्धि की संस्तुति की गई। इस रिपोर्ट पर विचार करते हुए जिलाधिकारी ने 27 दिसंबर 2017 को औचित्य प्रमाण पत्र जारी कर 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2022 की अवधि के लिए 1,200 रुपये प्रति 100 बोरा किराए की सिफारिश की।
प्रशासनिक स्तर पर प्रमाण पत्र जारी होने के बावजूद विभाग ने नया अनुबंध निष्पादित नहीं किया और 300 रुपये प्रति 100 बोरा की पुरानी दर से ही भुगतान जारी रखा। कई प्रत्यावेदनों के निष्प्रभावी रहने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मुकदमेबाजी के पहले दौर में हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने 13 अप्रैल 2023 (रिट-सी संख्या 2917/2023) को आदेश देते हुए स्पष्ट किया था कि 2 मई 2018 के शासनादेश का खंड 14—जिसके तहत किराए में अधिकतम 20 प्रतिशत तक की ही वृद्धि हो सकती है—केवल 14 जुलाई 2015 के बाद किराए पर लिए गए गोदामों पर लागू होता है। अदालत ने संभागीय खाद्य नियंत्रक को यह तय करने का निर्देश दिया था कि क्या 2018 की नीति 2015 से पूर्व के अनुबंधों पर लागू होती है या नहीं।
इसके बावजूद, जिलाधिकारी प्रतापगढ़ ने 26 जून 2023 को अचानक वर्ष 2017 का औचित्य प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया और 350 रुपये प्रति 100 बोरा किराए की संस्तुति करते हुए नया संशोधित प्रमाण पत्र जारी कर दिया। इसके आधार पर संभागीय खाद्य नियंत्रक ने 3 जुलाई 2023 को आदेश जारी कर 1 अप्रैल 2017 से पांच साल के लिए 350 रुपये प्रति 100 बोरा की दर से किराया निर्धारित कर दिया। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दायर की। वर्तमान याचिका के लंबित रहने के दौरान ही विभाग ने 31 मार्च 2024 को दोनों गोदामों का खाली कब्जा याचिकाकर्ता को सौंप दिया। इसके चलते यह विवाद केवल 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2024 तक के किराया पुनरीक्षण और बकाया भुगतान तक सीमित रह गया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता श्री मनोज कुमार मिश्रा ने दलील दी कि 3 जुलाई 2023 के आक्षेपित आदेश पूरी तरह मनमाने, छद्म और हाईकोर्ट के 13 अप्रैल 2023 के बाध्यकारी फैसले की अवहेलना में पारित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने स्वयं अपने आदेश में स्वीकार किया है कि 2018 के शासनादेश का खंड 14 वर्ष 2003 और 2006 से चल रहे किराना अनुबंधों पर लागू नहीं होता, फिर भी उन्होंने पिछले दरवाजे से 20 प्रतिशत की सीमा थोपते हुए 350 रुपये का किराया तय कर दिया। अधिवक्ता ने रेखांकित किया कि 2017 का 1,200 रुपये वाला प्रमाण पत्र सर्किल रेट में 4.75 गुना वृद्धि की गहन प्रशासनिक जांच के बाद जारी हुआ था, जिसे बिना किसी नई जांच या ठोस कारण के मनमाने ढंग से वापस नहीं लिया जा सकता। उन्होंने यह भी तथ्य रखा कि बाबागंज, बेलखरनाथ, सांगीपुर और कालाकांकर में स्थित इसी प्रकार के अन्य निजी गोदामों को औचित्य प्रमाण पत्र के आधार पर 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दी गई है, जिससे याचिकाकर्ता के साथ संविधान के अनुच्छेद 14 का खुला उल्लंघन हुआ है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने आदेश का बचाव करते हुए कहा कि 3 जुलाई 2023 का आदेश 2 मई 2018 के शासनादेश के तहत पूरी तरह वैध है, जिसने पूर्व के सभी शासनादेशों को निष्प्रभावी कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि शासनादेश का खंड 14 किराए में वृद्धि को अधिकतम 20 प्रतिशत या औचित्य प्रमाण पत्र में अनुशंसित राशि (जो भी कम हो) तक सीमित करता है। उन्होंने कहा कि 2017 में 1,200 रुपये की संस्तुति क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर और स्थानीय दरों से काफी अधिक की गई थी, जिसे प्रयागराज मंडल के मंडलायुक्त के निर्देशों के क्रम में जिलाधिकारी ने 26 जून 2023 को सही रूप से वापस लिया। सरकारी वकील का कहना था कि प्रशासनिक अधिकारी नीतिगत सीमा से बाहर जाकर चार गुना किराया वृद्धि स्वीकार नहीं कर सकते, इसलिए याचिका खारिज की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी टिप्पणियां
पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी ने माना कि मुख्य विवाद यह है कि क्या 2 मई 2018 के शासनादेश के खंड 14 में उल्लिखित 20 प्रतिशत की ऊपरी सीमा 2015 से पहले के गोदामों पर लागू की जा सकती है, और क्या अधिकारियों के पास हाईकोर्ट के पुराने फैसले के बाद 2017 के औचित्य प्रमाण पत्र को एकतरफा रद्द करने का अधिकार था।
अदालत ने पाया कि संभागीय खाद्य नियंत्रक ने 3 जुलाई 2023 के आदेश के प्रस्तर 4 में स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि 2018 के शासनादेश के खंड 14 और 15 याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होते, क्योंकि ये गोदाम क्रमशः 2003 और 2006 में लिए गए थे। इसके बावजूद, 350 रुपये का किराया उन्हीं पाबंदियों से उपजे नए प्रमाण पत्रों के आधार पर तय कर दिया गया। इस विरोधाभासी रुख की कड़ी आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम के. श्याम सुंदर (2011) और जागीर सिंह बनाम रणबीर सिंह (1979) का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“जो काम प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता, उसे अप्रत्यक्ष रूप से करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा करना प्राधिकारी द्वारा स्वयं दर्ज किए गए निष्कर्ष से बचने के समान होगा। कोई प्राधिकारी एक तरफ किसी प्रावधान को किसी पक्षकार पर अप्रभावी नहीं ठहरा सकता और दूसरी तरफ उसी परिणाम को किसी दूसरे दरवाजे से हासिल नहीं कर सकता।”
पीठ ने वर्ष 2017 के औचित्य प्रमाण पत्र को अचानक निरस्त करने के प्रशासनिक तरीके को भी अनुचित माना। अदालत ने कहा कि यह प्रमाण पत्र कोई सामान्य दस्तावेज नहीं था, बल्कि तहसीलदार की जांच, एसडीएम की रिपोर्ट और जिलाधिकारी के विधिवत विचार-विमर्श से बनी एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम था। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों स्टेट ऑफ केरल बनाम के.जी. माधवन पिल्लई (1988) और नवज्योति को-ऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1992) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना या क्षेत्राधिकार संबंधी अथवा तथ्यात्मक त्रुटि प्रदर्शित करने वाले ठोस कारणों को दर्ज किए बिना, पूर्व में दी गई और प्रभावी रही किसी स्वीकृति, लाभ या प्रमाण पत्र को वापस लेना अस्वीकार्य है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि तहसीलदार या एसडीएम की रिपोर्ट में कोई तथ्यात्मक या विधिक खामी थी।
हाईकोर्ट द्वारा मामला दोबारा विचार के लिए भेजे जाने के बाद घटनाक्रम की गति पर सवाल उठाते हुए पीठ ने पाया कि 26 जून 2023 को पुराना प्रमाण पत्र रद्द किया गया और कुछ ही दिनों के भीतर 3 जुलाई 2023 को किराया 350 रुपये तय कर दिया गया। अदालत ने इसे सत्ता का छद्म प्रयोग और विधिक द्वेष (लीगल मैलिस) माना। सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरदयाल सिंह (1980) का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि विधिक द्वेष का अर्थ है:
“एक वैध लक्ष्य प्राप्त करने के ढोंग या दिखावे के माध्यम से शक्ति के स्वीकृत उद्देश्यों से परे के परिणामों को हासिल करना।”
इसके अलावा, अदालत ने पाया कि 3 जुलाई 2023 का आदेश पूरी तरह से ‘अकारण’ (नॉन-स्पीकिंग) था। इसमें कोई तुलनात्मक बाजार सर्वेक्षण या डेटा नहीं दिया गया था कि 2013 में तय 300 रुपये के मुकाबले स्टेट हाईवे पर स्थित व्यावसायिक गोदाम के लिए 2023 में 350 रुपये का किराया किस आधार पर उचित है। एस.एन. मुखर्जी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1990), सीमेंस इंजीनियरिंग (1976) और क्रांति एसोसिएट्स (2010) के सिद्धांतों को दोहराते हुए पीठ ने कहा:
“कारण ही प्रत्येक निष्कर्ष की धड़कन होते हैं।”
साथ ही मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) के सिद्धांत का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि आदेश को उसमें दर्ज कारणों के आधार पर ही परखा जाता है और बाद में नए कारण जोड़कर उसका बचाव नहीं किया जा सकता।
समानता के सिद्धांत पर अदालत ने याचिकाकर्ता की उस बात को गंभीर माना कि बाबागंज, बेलखरनाथ, सांगीपुर और कालाकांकर के निजी गोदामों को औचित्य प्रमाण पत्र के आधार पर 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दी गई थी, जिसका विभाग ने कोई ठोस खंडन नहीं किया था। ई.पी. रोयप्पा बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु (1974), रमना दयाराम शेट्टी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (1979) और अजय हासिया (1981) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक उपयोग के लिए लिए गए गोदामों के किराए निर्धारण में राज्य बिना किसी तार्किक आधार के समान स्थिति वाले गोदाम मालिकों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि उचित किराए का निर्धारण मूल रूप से कार्यपालिका का प्रशासनिक कार्य है, जिसमें स्थानीय सर्किल रेट, तुलनात्मक किराए और बजटीय आवंटन का मूल्यांकन शामिल होता है। इसलिए अदालत स्वयं 1,200 रुपये का किराया तय नहीं कर सकती।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2023 के आक्षेपित आदेशों (संख्या 671 और 669) तथा 26 जून 2023 को पुराना प्रमाण पत्र रद्द करने वाले जिलाधिकारी के पत्रों (संख्या 756 और 757) को निरस्त कर दिया।
अदालत ने मामले को संभागीय खाद्य नियंत्रक एवं सक्षम प्राधिकारी को निम्नलिखित स्पष्ट निर्देशों के साथ वापस भेज दिया:
- 2 मई 2018 के शासनादेश के खंड 14 को लागू किए बिना, स्वतंत्र रूप से किराए का पुनर्निर्धारण किया जाए।
- 27 दिसंबर 2017 के औचित्य प्रमाण पत्र, सर्किल रेट पर एसडीएम की रिपोर्ट और अन्य प्रासंगिक सामग्रियों को ध्यान में रखते हुए एक तर्कसंगत और सकारण आदेश (स्पीकिंग ऑर्डर) के जरिए किराया तय किया जाए।
- यदि लिखित में दर्ज ठोस कारणों के आधार पर यह पाया जाता है कि 2017 के प्रमाण पत्र में कोई तथ्यात्मक या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि थी, तो सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद ही उसे निरस्त किया जा सकता है; अप्रभावी शासनादेश की 20 प्रतिशत सीमा को दोहराकर ऐसा नहीं किया जा सकता।
- संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत याचिकाकर्ता के इस दावे की जांच की जाए और विशिष्ट निष्कर्ष दर्ज किया जाए कि बाबागंज, बेलखरनाथ, सांगीपुर और कालाकांकर के गोदामों के समान उसे भी समानता का लाभ मिले।
- यह पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 12 सप्ताह के भीतर सकारण आदेश पारित करके पूरी की जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जीएसटी और बकाए पर ब्याज से जुड़े अन्य सभी दावों को याचिकाकर्ता सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उठाने के लिए स्वतंत्र है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सुधा अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 6 अन्य
वाद संख्या: रिट – सी संख्या 47 / 2024
पीठ: जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
निर्णय की तिथि: 24 सितंबर 2026

