इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का केवल कानूनी दायित्व ही नहीं है, बल्कि यह समाज की अंतरात्मा में निहित एक गहरा सामाजिक और नैतिक कर्तव्य भी है। जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पति को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी को 20,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार वैवाहिक संबंध से उत्पन्न होने वाला एक वैधानिक अधिकार है, न कि कोई दान या खैरात।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह 24 जुलाई 2017 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार गौतम बुद्ध नगर जिले के नॉलेज पार्क थाना क्षेत्र के एक गांव में संपन्न हुआ था। पत्नी की ओर से दाखिल आवेदन के अनुसार, उसके पिता ने अपनी क्षमता के अनुसार विवाह में पर्याप्त खर्च किया और दहेज दिया था।
हालांकि, विवाह के बाद पति और उसके परिजन दिए गए दहेज से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने अतिरिक्त दहेज के रूप में स्विफ्ट कार और 100 वर्ग गज के भूखंड की मांग शुरू कर दी। मांग पूरी न होने पर पत्नी को लगातार मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा, गाली-गलौज की गई और दूसरी शादी करने की धमकियां दी गईं।
आवेदन में आरोप लगाया गया कि 30 मार्च 2018 को पति और उसके परिजनों ने महिला के साथ गंभीर मारपीट की और उसे घर में बंद कर दिया। किसी तरह 2 अप्रैल 2018 को उसने पुलिस को सूचना दी। पुलिस उसे थाने ले आई, जहां उससे जबरन माफीनामा लिखवाकर छोड़ दिया गया। इसके बाद से ही महिला अपने मायके में रह रही है और पूरी तरह से अपने वृद्ध व आर्थिक रूप से कमजोर पिता पर निर्भर है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके ससुराल वालों ने उसका स्त्रीधन रख लिया और कभी उसका हाल-चाल तक नहीं पूछा।
पत्नी ने अपनी अर्जी में बताया कि उसका पति एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और प्रतिमाह लगभग 70,000 रुपये कमाता है। इसके अलावा, उसके परिवार के पास पेंट और हार्डवेयर की दुकान, किराये की संपत्ति, मकान, दुकानें, लगभग 20 बीघा जमीन और दो भूखंड हैं, जिनसे लगभग 2,00,000 रुपये प्रतिमाह की आय होती है। स्वयं का कोई स्वतंत्र आय स्रोत न होने के कारण पत्नी ने 30,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ते की मांग की थी।
फैमिली कोर्ट का आदेश और हाईकोर्ट में सुनवाई
गौतम बुद्ध नगर के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट ने 30 मार्च 2024 को पत्नी के धारा 125 Cr.P.C. के तहत दाखिल आवेदन को स्वीकार कर लिया। फैमिली कोर्ट ने आवेदन दाखिल करने की तिथि से निर्णय की तिथि तक 20,000 रुपये प्रतिमाह (तीन महीने के भीतर भुगतान योग्य) और निर्णय की तिथि से आगे 20,000 रुपये प्रतिमाह का नियमित भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया था।
इस फैसले के खिलाफ पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता (पति) की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। इस पर कोर्ट ने पति के वकील की गैर-मौजूदगी में ही सुनवाई आगे बढ़ाई और पत्नी के अधिवक्ता तथा राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) के तर्कों को सुना। पत्नी के वकील ने पीठ को बताया कि याचिकाकर्ता बार-बार सुनवाई से अनुपस्थित रहा है और फैमिली कोर्ट द्वारा हर महीने की 10 तारीख तक भुगतान करने के निर्देश के बावजूद उसने भरण-पोषण की कोई राशि जमा नहीं की है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने विवाह की वैधता, अलग रहने के पर्याप्त कारण, पत्नी की आयहीनता, पति की वित्तीय क्षमता और भुगतान की तिथि जैसे पांच मुख्य बिंदुओं पर विचार किया था।
हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही था कि पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था, जो उसके अलग रहने का पर्याप्त कारण है। साथ ही, पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं है जबकि पति के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं।
पति के उत्तरदायित्व पर जोर देते हुए जस्टिस सचदेव ने टिप्पणी की:
“पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति का नैतिक कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व है। पति द्वारा अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करने का कर्तव्य न केवल एक कानूनी बाध्यता है, बल्कि एक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है, और इसका महत्व तब और बढ़ जाता है जब पत्नी के पास आय का अपना कोई साधन न हो।”
पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था पर इसके प्रभाव को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने आगे कहा:
“पति का सहारा पारिवारिक इकाई को बनाए रखता है, यह सुनिश्चित करता है कि पत्नी और बच्चे हाशिए पर न आएं या गरीबी में न धकेले जाएं। समाज पति को प्रदाता (प्रोवाइडर) के रूप में देखता है और इस भूमिका की उपेक्षा करने से अक्सर सामाजिक अस्वीकृति और कलंक का सामना करना पड़ता है।”
“विवाह देखभाल और सुरक्षा की एक नैतिक जिम्मेदारी पैदा करता है, और पति अपनी पत्नी की गरिमा और भलाई की रक्षा करने तथा नाबालिग बच्चे का पालन-पोषण करने के लिए नैतिक रूप से बाध्य है। यह प्रेम, करुणा और जिम्मेदारी में निहित एक मौलिक कर्तव्य है, और कानून व परंपरा से परे, यह उन लोगों की पीड़ा को रोकने के लिए अंतरात्मा का विषय है जो उस पर निर्भर हैं।”
भरण-पोषण के कानूनी स्वरूप को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“भरण-पोषण का अधिकार कोई दान या खैरात नहीं है, बल्कि वैवाहिक संबंध और पैतृक कर्तव्य से उत्पन्न एक वैधानिक अधिकार है। पति एक स्वाभाविक अभिभावक और प्रदाता होने के नाते यह सुनिश्चित करने की सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी उठाता है कि पत्नी और बच्चे कंगाली के कगार पर न पहुंचें। भरण-पोषण कोई पारितोषिक (बाउंटी) नहीं बल्कि एक अधिकार है और इसके इनकार से पत्नी लाचारी और तंगी का जीवन जीने के लिए मजबूर होगी, जिसे कानून स्वीकार नहीं कर सकता।”
“यह दायित्व केवल वैधानिक आदेश में ही नहीं, बल्कि पारिवारिक, वैधानिक और सामाजिक व्यवस्था की उपेक्षा को रोकने के लिए समाज की अंतरात्मा में निहित है।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संवैधानिक सिद्धांत
अपने तर्क के समर्थन में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया:
- भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2015) – इसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भरण-पोषण सामाजिक न्याय का एक उपाय है, जिसका मुख्य उद्देश्य आवारागर्दी और लाचारी को रोकना है।
- चतुर्भुज बनाम सीताबाई (2008) – इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी कंगाली की हालत में न छूटे। यह अधिकार विवाह की स्थिति से ही उत्पन्न होता है और इसके लिए उपेक्षा के अलग से प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।
हाईकोर्ट ने धारा 125 Cr.P.C. / धारा 144 BNSS के भरण-पोषण प्रावधानों को संवैधानिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 39(a) और (f) में दिए गए राज्य के नीति निर्देशक तत्व आजीविका के पर्याप्त साधनों और बच्चों के स्वस्थ विकास की गारंटी देते हैं। इसके अलावा, अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की रक्षा करता है। पत्नी को भरण-पोषण से वंचित कर लाचारी में ढकेलना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
कोर्ट का निर्णय
फैमिली कोर्ट के आदेश को पूर्णतः तर्कसंगत और न्यायसंगत मानते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: देवांंश उर्फ छोटू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 1366 / 2026
पीठ: जस्टिस अचल सचदेव
निर्णय की तिथि: 7 अगस्त 2026

