बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी आपराधिक मुकदमे में अदालत से बरी हो जाने मात्र से विभागीय जांच के आधार पर की गई बर्खास्तगी अपने आप अमान्य नहीं हो जाती। जस्टिस आर.आई. छागला और जस्टिस फरहान पी. दुबाश की पीठ ने चेक धोखाधड़ी के मामले में बरी हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के एक पूर्व कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए उसकी सेवा में बहाली की मांग को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया।
विभागीय जांच के आधार पर हुई थी सेवामुक्ति
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी किसी आपराधिक मुकदमे या एफआईआर पर आधारित नहीं थी, बल्कि यह स्वतंत्र रूप से संचालित की गई विभागीय जांच के निष्कर्षों पर निर्भर थी। 6 अगस्त के अपने आदेश में पीठ ने कहा कि यह एक स्थापित कानूनी स्थिति है कि आपराधिक मामले से बरी होने पर विभागीय जांच के तहत दी गई सजा स्वतः रद्द नहीं होती।
अदालत के अनुसार, यदि अनुशासनात्मक कार्रवाई विभागीय कार्यवाही में स्वतंत्र रूप से पेश किए गए सबूतों पर टिकी है, तो बरी होने का आदेश कर्मचारी को अपने आप नौकरी में वापस आने का अधिकार नहीं देता। पीठ ने जोर देकर कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (स्टाफ) रेगुलेशन, 1948 के नियमों के तहत भी ऐसी स्थिति में बहाली का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
1994 से शुरू हुआ था विवाद और जांच की प्रक्रिया
याचिकाकर्ता को 23 अप्रैल 1987 को आरबीआई के नेशनल क्लीयरिंग सेल में अंशकालिक मशीन ऑपरेटर के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद 21 दिसंबर 1992 को उसे पूर्णकालिक कर्मचारी बना दिया गया। सेवा के दौरान उस पर अन्य सहकर्मियों के साथ मिलकर साजिश रचने और नेशनल क्लीयरिंग सेल से गुजरने वाले चेक में हेरफेर करके कई बैंकों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा।
इस धोखाधड़ी के सामने आने के बाद आरबीआई ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई। इसके साथ ही बैंक ने कर्मचारी के खिलाफ अलग से अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की। उसे 30 जुलाई 1994 को निलंबित कर दिया गया था और आंतरिक जांच पूरी होने के बाद 30 अगस्त 2001 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
जांच के दौरान कर्मचारी ने स्वीकार की थी गड़बड़ी
हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में उल्लेख किया कि 1994 से शुरू हुई यह अनुशासनात्मक जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और व्यापक थी। इस दौरान लिखित आरोप तय किए गए, साक्ष्य प्रस्तुत किए गए तथा गवाहों से पूछताछ और जिरह की गई, जिसमें कर्मचारी ने कई वर्षों तक सक्रिय रूप से भाग लिया।
कार्रवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने बार-बार अपने ऊपर लगे आरोपों और गड़बड़ी को स्वीकार किया था और नरमी बरतने की गुहार लगाई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने बर्खास्तगी का आदेश देते समय दर्ज साक्ष्यों के साथ-साथ कर्मचारी द्वारा खुद स्वीकार की गई बातों को भी आधार बनाया था।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
आपराधिक मामले में एक विशेष अदालत ने मार्च 2015 में याचिकाकर्ता को सभी आपराधिक आरोपों से बरी कर दिया था। इसके बाद उसने बकाया वेतन और सेवा लाभों के साथ बहाली की मांग करते हुए आरबीआई में आवेदन किया। बैंक ने 20 जुलाई 2015 को उसके आवेदन को खारिज कर दिया, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एडवोकेट सचिन चंदन ने तर्क दिया कि बैंक का 20 जुलाई 2015 का आदेश गैर-न्यायसंगत (नॉन-स्पीकिंग) था और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ था। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल का पक्ष सुने बिना और सुनवाई का अवसर दिए बिना आवेदन खारिज कर दिया गया, इसलिए इस आदेश को रद्द किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, आरबीआई का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर एडवोकेट एस.यू. कामदार ने तर्क दिया कि कर्मचारी की बर्खास्तगी आपराधिक मामले की सजा से नहीं, बल्कि विभागीय जांच के नतीजों से तय हुई थी, जो 30 अगस्त 2001 को समाप्त हुई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाद में मिली आपराधिक रिहाई से नौकरी में वापसी का कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता। पीठ ने आरबीआई की इन दलीलों से सहमति जताते हुए याचिका को औचित्यहीन माना और खारिज कर दिया।

