केरल हाईकोर्ट ने दहेज कम लाने का ताना देकर बहू को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के मामले में सास के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सास पर लगाए गए आरोप विशिष्ट और गंभीर प्रकृति के हैं, जिनकी सच्चाई का फैसला ट्रायल कोर्ट में सबूतों की जांच के बाद ही होगा। वहीं, दूसरी ओर हाईकोर्ट ने महिला के देवर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला खारिज कर दिया। अदालत के अनुसार, देवर के खिलाफ केवल अस्पष्ट और सामान्य दावे किए गए हैं, जिन पर मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
यह विवाद सितंबर 2019 में हुई एक शादी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि शादी के वक्त उसके माता-पिता ने उसे 55 सोवरन सोने के जेवर दिए थे। शादी के बाद साथ रहते हुए उसके पति ने ये सारे गहने अपने कब्जे में लेकर अपने भाई (देवर) को सौंप दिए। इसके बाद उसकी सास ने पर्याप्त दहेज न लाने का आरोप लगाते हुए उसे लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और तीखे ताने देना शुरू कर दिया।
महिला के अनुसार, जनवरी 2020 में एक घटना के दौरान जब उसकी सास उसे अपमानित कर रही थी, तो उसने अपने मोबाइल फोन से वीडियो बनाने की कोशिश की। आरोप है कि इस पर देवर ने उसके साथ गाली-गलौज की, थप्पड़ मारा और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। इसके अलावा, सास और देवर पर महिला के नाम दर्ज जमीन को जबरन बिकवाने का दबाव बनाने और उसे मानसिक तनाव में धकेलने के भी आरोप हैं।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ ने 7 अगस्त को दिए अपने आदेश में कहा कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते समय अदालत का दायरा सीमित होता है। हाईकोर्ट को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर कथित अपराध के मूल तत्व बनते हैं या नहीं। यदि मामले में ऐसे तथ्य शामिल हैं जिन पर विवाद है और सबूतों के मूल्यांकन की आवश्यकता है, तो उनका निपटारा पूर्ण सुनवाई (ट्रायल) के दौरान ही होना चाहिए।
पीठ ने सास के खिलाफ दर्ज केस के संदर्भ में कहा कि याचिकाकर्ता पर बहू के खिलाफ लगातार अपमानजनक और तीखे शब्दों का इस्तेमाल करने के स्पष्ट आरोप हैं। इन आरोपों की सत्यता की जांच ट्रायल कोर्ट में ही संभव है। इसके विपरीत, देवर के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद और सामान्य प्रकार के हैं। केवल अस्पष्ट दावों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अदालत में दी गई दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील पी. एंटो थॉमस ने दलील दी थी कि यदि शिकायत में दिए गए बयानों को पूरी तरह स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी उनके मुवक्किलों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत प्रताड़ना का अपराध सिद्ध नहीं होता। उन्होंने आरोपों को मनगढ़ंत और अस्पष्ट बताते हुए मामला खारिज करने का अनुरोध किया था।
इसके जवाब में शिकायतकर्ता महिला के वकील विष्णु भुवनेन्द्रन ने कहा कि प्राथमिकी और पुलिस जांच में एकत्र की गई सामग्री से सास और देवर द्वारा किए गए विशिष्ट उत्पीड़न के साक्ष्य मिलते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि दहेज की मांग को लेकर महिला को प्रताड़ित करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं, इसलिए इस मामले में मुकदमा चलाना अनिवार्य है।

