पटना हाईकोर्ट ने रेलवे सुरक्षा विशेष बल (आरपीएसएफ) के दो कांस्टेबलों को बर्खास्त करने के फैसले को रद्द करते हुए उन्हें तुरंत सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अपने एक साथी कर्मचारी के पक्ष में सोशल मीडिया पोस्ट करने और मामूली वित्तीय योगदान देने के मामले में दी गई इस सजा को अत्यधिक कठोर, मनमाना और गैर-कानूनी करार दिया।
जस्टिस हरीश कुमार ने 6 अगस्त को याचिकाकर्ता करम जीत और कमलेश कुमार यादव की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने रेलवे प्रशासन को निर्देश दिया कि दोनों कर्मियों को सेवा में वापस लिया जाए और उन पर भी वही मामूली जुर्माना लगाया जाए, जो इसी मामले से जुड़े अन्य कर्मचारियों पर लगाया गया था।
अदालत ने बर्खास्तगी को माना असंगत और मनमाना
विभागीय कार्रवाई की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों कांस्टेबलों को नौकरी से निकालने की सजा उनके खिलाफ सिद्ध हुए आरोपों की तुलना में पूरी तरह असंगत और अनुचित है। अदालत ने कहा कि यह फैसला न्यायिक चेतना को झकझोरने वाला है। इसके अलावा, अनुशासनात्मक प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया, क्योंकि प्रमुख दंड तय करने से पहले याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने या उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि दोनों में से किसी भी कर्मचारी पर हिंसा में शामिल होने, अधिकारियों के आदेश का उल्लंघन करने, सरकारी काम में बाधा डालने या विद्रोह भड़काने का कोई आरोप नहीं था। चूंकि याचिकाकर्ता जनवरी 2019 से ही सेवा से बाहर हैं, इसलिए मामले को दोबारा विभागीय पुनर्विचार के लिए भेजने के बजाय हाईकोर्ट ने खुद ही सजा को संशोधित कर दिया।
प्राकृतिक न्याय और समानता के अधिकार का उल्लंघन
अदालत ने अपने निर्णय में समानता के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 14) के हनन का विशेष रूप से उल्लेख किया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि इसी घटना से जुड़े समान आरोपों का सामना कर रहे बल के कई अन्य कर्मियों की सजा को अपील के दौरान कम कर दिया गया था और उन्हें काम पर वापस ले लिया गया था।
जस्टिस हरीश कुमार ने टिप्पणी की कि विभागीय जांच में दोषी पाए गए व्यक्तियों पर भी कानून के समक्ष समानता की संवैधानिक गारंटी लागू होती है। समान स्थिति वाले अन्य कर्मियों की तुलना में इन दोनों कांस्टेबलों को अधिक कठोर सजा देना स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है।
सोशल मीडिया पोस्ट और वित्तीय मदद से जुड़ा मामला
यह पूरा विवाद 25 फरवरी 2018 का है, जब मेघालय में चुनाव ड्यूटी के दौरान आरपीएसएफ के सहायक कमांडेंट मुकेश चंद त्यागी की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में कांस्टेबल अर्जुन देशवाल को आरोपी बनाया गया था। इस घटना के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आरोपी के समर्थन में कई संदेश, तस्वीरें और वीडियो वायरल होने लगे थे।
जांच में सामने आया कि कांस्टेबल करम जीत ने अपने वेतन खाते से भीम ऐप (BHIM App) के जरिए देशवाल की सहायता के लिए 1,000 रुपये भेजे थे। वहीं, दूसरे कांस्टेबल कमलेश कुमार यादव ने फेसबुक पर एक पोस्ट शेयर कर अपने परिचितों से 200-200 रुपये का योगदान देने की अपील की थी और बैंक खाते का विवरण साझा किया था।
विभागीय कार्रवाई से हाईकोर्ट तक का सफर
घटना के बाद 10 अप्रैल 2018 को रेलवे प्रशासन ने दोनों जवानों के खिलाफ आरोप पत्र जारी किए। उन पर रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम 1957, पुलिस (असंतोष भड़काना) अधिनियम 1922 और रेलवे सुरक्षा बल नियम 1987 के उल्लंघन के तहत अनुशासनहीनता फैलाने और असंतोष भड़काने के आरोप लगाए गए।
विभागीय जांच के दौरान दोनों कांस्टेबलों ने स्वीकार किया कि वे इंटरनेट पर चल रही सामग्री से भावनात्मक रूप से प्रभावित हो गए थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरोपी देशवाल से उनका कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं था। करम जीत ने अदालत को बताया कि उनके द्वारा भेजे गए 1,000 रुपये अगले ही दिन उनके खाते में वापस आ गए थे, जबकि कमलेश यादव ने गलती का अहसास होते ही अपनी फेसबुक पोस्ट हटा दी थी। दोनों ने अपनी भूल पर खेद जताते हुए रहम की अपील की थी।
इसके बावजूद, रेलवे विभाग ने 11 जनवरी 2019 को दोनों को बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद दायर विभागीय अपील, समीक्षा याचिका और दया याचिकाएं खारिज होने पर दोनों कर्मियों ने पटना हाईकोर्ट का रुख किया था।

