अनुसूचित क्षेत्रों में केवल गैर-आदिवासी पक्षों के बीच बंटवारे के विवादों में सिविल कोर्ट को सुनवाई का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) में स्थित संपत्तियों के बंटवारे और उत्तराधिकार से जुड़े उन सभी सिविल विवादों में सिविल कोर्ट की अधिकारिता (jurisdiction) बनी रहेगी, जिनमें सभी पक्ष गैर-आदिवासी (non-tribals) हैं। तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले को रद्द करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने कहा कि गैर-आदिवासी मुकदमों में सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार को बाहर करना आदिवासियों के हितों की रक्षा करने वाले संवैधानिक उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं रखता और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि नागार्जुन ग्रामीण बैंक बनाम मेडी नारायणा मामले में दिया गया पिछला फैसला सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार को खत्म करने पर कोई बाध्यकारी नजीर (binding precedent) तय नहीं करता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुक्केरा मुथैया नाम के एक व्यक्ति की संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा है, जिनकी मृत्यु 1979 में हुई थी। 6 जुलाई 1998 को मुथैया के पांच पोतों (उनके दिवंगत बेटे हनुमानथैया के पुत्रों) और उनकी मां ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर संपत्ति में एक-तिहाई हिस्से के बंटवारे और अलग कब्जे की मांग की। प्रतिवादियों में मुथैया के छोटे बेटे, दो बेटियां और एक दामाद शामिल थे।

ट्रायल कोर्ट (सिविल कोर्ट) ने 29 अक्टूबर 2003 को यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था कि मुथैया और हनुमानथैया के जीवनकाल (1975-76) के दौरान ही परिवार का बंटवारा हो चुका था और दोनों पक्ष अपनी-अपनी संपत्ति पर काबिज थे और अलग से भू-राजस्व दे रहे थे। ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना कि सीमा अधिनियम (Limitation Act) के अनुच्छेद 110 के तहत यह मुकदमा समय-सीमा से बाहर था।

पहली अपील पर सुनवाई करते हुए कोठागुडेम के प्रधान वरिष्ठ सिविल जज ने 1 दिसंबर 2008 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। अपीलीय अदालत ने माना कि बंटवारे को साबित करने वाले दस्तावेज अप्रमाणित और अविश्वसनीय थे, संपत्ति संयुक्त परिवार की ही थी और सिविल कोर्ट को इस मामले की सुनवाई का पूरा अधिकार था।

इसके बाद प्रतिवादियों ने तेलंगाना हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की। 1 फरवरी 2022 को हाईकोर्ट के एकल जज ने अपील स्वीकार करते हुए अपीलीय कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले का एकमात्र आधार सुप्रीम कोर्ट के नागार्जुन ग्रामीण बैंक बनाम मेडी नारायणा फैसले को बनाया और माना कि 1972 के बाद से अनुसूचित क्षेत्रों में सिविल कोर्ट्स द्वारा दिए गए आदेश गैर-कानूनी और शून्य (null and void) हैं। इसके खिलाफ वादी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता अमित पाई ने तर्क दिया कि नागार्जुन ग्रामीण बैंक मामला सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार को बाहर करने के संबंध में कोई बाध्यकारी नजीर नहीं बनाता। उन्होंने कहा कि उस फैसले में की गई टिप्पणी आंध्र प्रदेश सिविल कोर्ट अधिनियम, 1972 का कोई न्यायिक या कानूनी विश्लेषण नहीं थी, बल्कि राज्य सरकार की एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा लिए गए प्रशासनिक फैसले को केवल स्वीकार किया गया था।

दूसरी ओर, एमिकस क्यूरी के रूप में अधिवक्ता विकास बंसल और तेलंगाना राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहीं अधिवक्ता देविना सहगल ने तर्क दिया कि 30 अक्टूबर 1972 की एक अधिसूचना के जरिए आंध्र प्रदेश सिविल कोर्ट अधिनियम, 1972 लागू किया गया था, जिसमें अनुसूचित क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया था। इसलिए, 1972 के अधिनियम के तहत स्थापित सिविल कोर्ट्स को अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित भूमि से संबंधित विवादों की सुनवाई का अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से दो कानूनी प्रश्नों पर विचार किया: पहला, क्या नागार्जुन ग्रामीण बैंक का निर्णय एक बाध्यकारी नजीर है? और दूसरा, क्या दोनों पक्षों के गैर-आदिवासी होने पर सिविल कोर्ट अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित संपत्तियों के विवादों का निपटारा कर सकते हैं?

1. नजीर और निर्णय के आधार पर

यह तय करने के लिए कि क्या नागार्जुन ग्रामीण बैंक मामला एक बाध्यकारी कानूनी सिद्धांत स्थापित करता है, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक नजीर के सिद्धांतों की समीक्षा की। प्रीवी काउंसिल के निर्णय रीड बनाम द बिशप ऑफ लिंकन का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जजों का यह कर्तव्य है कि वे पिछले फैसलों के कानूनी कारणों की जांच करें। इसके अलावा अब्दुल कयूम बनाम सीआईटी मामले का उल्लेख करते हुए बेंच ने जोर दिया कि “प्रत्येक मामला अपने स्वयं के तथ्यों पर निर्भर करता है, और एक मामले और दूसरे मामले के बीच केवल अत्यधिक समानता होना ही काफी नहीं है, क्योंकि एक अकेला महत्वपूर्ण विवरण भी पूरे परिदृश्य को बदल सकता है।”

कोर्ट ने किसी फैसले में ‘रेशियो डेसिडेंडी’ (निर्णय का मुख्य आधार) की पहचान करने के लिए ‘इन्वर्जन टेस्ट’ या ‘वामबो टेस्ट’ का भी सहारा लिया। स्टेट ऑफ गुजरात बनाम यूटिलिटी यूजर्स वेलफेयर एसोसिएशन और करियर इंस्टीट्यूट एजुकेशनल सोसाइटी बनाम ओम श्री ठाकुरजी एजुकेशनल सोसाइटी (जिसमें जयंत वर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और दलबीर सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब का संदर्भ दिया गया था) का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“किसी राय को नजीर का दर्जा मिलने के लिए यह आवश्यक है कि वह राय किसी विशेष मामले का निर्णय करने के लिए अनिवार्य रूप से ली गई हो।”

नागार्जुन ग्रामीण बैंक के आदेशों का विश्लेषण करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उस मामले में कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सिविल कोर्ट अधिनियम, 1972 के वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या नहीं की थी। इसके बजाय, उसने केवल राज्य की उच्चस्तरीय समिति द्वारा अपनाए गए प्रशासनिक रुख को स्वीकार किया था। इस प्रकार, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि वह फैसला कानून का कोई सिद्धांत तय नहीं करता, इसलिए वह बाध्यकारी नजीर नहीं है।

2. आदिवासियों को संवैधानिक संरक्षण बनाम गैर-आदिवासियों के बीच विवाद

अनुसूचित क्षेत्रों के विधायी इतिहास—जिसमें अनुसूचित जिला अधिनियम, 1874, आंध्र प्रदेश एजेंसी नियम, 1924, एजेंसी ट्रैक्ट्स एंड लैंड ट्रांसफर एक्ट, 1917 और भारत सरकार अधिनियम 1919 व 1935 शामिल हैं—का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने माना कि विशेष एजेंसी तंत्र का गठन मूल रूप से गैर-आदिवासियों और साहूकारों के शोषण से आदिवासियों की रक्षा के लिए किया गया था।

कोर्ट ने समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के ऐतिहासिक फैसले और संविधान सभा की बहसों (जिसमें जयपाल सिंह, युधिष्ठिर मिश्र, शिब्बन लाल सक्सेना, ब्रजेश्वर प्रसाद और जादुबंश सहाय जैसे सदस्य शामिल थे) का हवाला दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची के प्रावधान आदिवासी भूमि, परंपराओं और स्वायत्तता की रक्षा के लिए बनाए गए थे।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस विशेष प्रक्रियात्मक छूट को पूरी तरह से गैर-आदिवासियों के बीच के विवादों पर लागू करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत उचित वर्गीकरण के परीक्षण पर खरा नहीं उतरता। स्टेट ऑफ मद्रास बनाम वी.जी. राव, चित्रा घोष बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (जिसमें राम कृष्णा डालमिया बनाम एस.आर. तेंदुलकर और डी.एस. नकारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला दिया गया था) जैसे मामलों के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी भी वैध वर्गीकरण के पीछे एक स्पष्ट अंतर (intelligible differentia) और उसके उद्देश्य के साथ तार्किक संबंध (rational nexus) होना अनिवार्य है।

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सर्वोच्च अदालत ने कहा:

“जब अनुसूचित क्षेत्रों में एजेंसी अदालतों को बनाए रखने का उद्देश्य आदिवासी लोगों, उनकी संपत्ति, रीति-रिवाजों और प्रथाओं की रक्षा करना है, तो उस क्षेत्र के गैर-आदिवासी लोगों को ऐसी विशेष प्रक्रिया के अधीन करके क्या हासिल होता है? इसका केवल एक ही उत्तर है। कुछ भी नहीं।”

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की:

“हालांकि अनुसूचित जनजाति के लोगों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा का कल्याणकारी उद्देश्य महत्वपूर्ण है और इसे उचित महत्व दिया जाना चाहिए, लेकिन केवल इस आधार पर सिविल कोर्ट्स के क्षेत्राधिकार को पूरी तरह से बाहर करने का कोई आधार नहीं बनता, जहां विवाद अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित संपत्ति के संबंध में पूरी तरह से गैर-आदिवासी पक्षों के बीच उत्तराधिकार या बंटवारे का हो।”

“हमारी राय में, कानून का ऐसे पक्षों पर अनुप्रयोग जो इसके उद्देश्य से किसी भी तरह से जुड़े नहीं हैं, कानून का गलत इस्तेमाल होगा।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. क्षेत्राधिकार की बहाली: केवल गैर-आदिवासी पक्षों के बीच के सिविल लेनदेन और विवादों के लिए सिविल कोर्ट्स का क्षेत्राधिकार बहाल कर दिया गया है, भले ही विवादित संपत्ति अनुसूचित क्षेत्र में स्थित हो।
  2. आदिवासियों की सुरक्षा बरकरार: यदि विवाद में शामिल पक्षों में से एक भी व्यक्ति अनुसूचित क्षेत्र में रहने वाला आदिवासी है, तो एजेंसी कोर्ट्स का क्षेत्राधिकार ही मान्य रहेगा।
  3. भविष्यगामी प्रभाव: यह निर्णय केवल लंबित मामलों और भविष्य में आने वाले मुकदमों पर लागू होगा।
  4. हाईकोर्ट को रिमांड: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 1 फरवरी 2022 के फैसले को रद्द कर दिया और दूसरी अपील को तेलंगाना हाईकोर्ट के समक्ष गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से निर्णय के लिए बहाल कर दिया।
  5. उपस्थिति एवं सुनवाई: दोनों पक्षों को 24 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है और हाईकोर्ट से मामले की त्वरित सुनवाई करने को कहा गया है।
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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मुक्केरा वेंकट रत्नम व अन्य बनाम वंतसला चीना वेंकटेश्वरलू व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… ऑफ 2026 (एसएलपी (सी) डायरी संख्या 21610/2022 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 6 अगस्त 2026

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