क्या किसी अविभाज्य कंपोजिट टर्नकी अनुबंध को विभाजित करके उसमें से सेवा घटक को अलग किया जा सकता है और 1 जून 2007 से पहले की अवधि के लिए उस पर सर्विस टैक्स लगाया जा सकता है? इस कानूनी प्रश्न का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व विभाग द्वारा मेसर्स डीबोल्ड सिस्टम्स (पी) लिमिटेड के खिलाफ दायर चार अपीलों को खारिज कर दिया। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने स्पष्ट किया कि 1 जून 2007 को “वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट सर्विस” की शुरुआत से पहले, फाइनेंस एक्ट, 1994 में बैंकों को ऑटोमेटेड टेलर मशीनों (एटीएम) की आपूर्ति, इंस्टालेशन और कमीशनिंग से जुड़े अविभाज्य टर्नकी ठेकों को विभाजित कर उसके सेवा हिस्से पर टैक्स वसूलने का न तो कोई चार्जिंग प्रावधान था और न ही कोई वैधानिक तंत्र उपलब्ध था।
मामले का पृष्ठभूमि
उत्तरदाता-निर्धारिती (असेसी), मेसर्स डीबोल्ड सिस्टम्स (पी) लिमिटेड, विभिन्न बैंकों को टर्नकी अनुबंधों के तहत एटीएम आपूर्ति करने के व्यवसाय में लगी हुई थी। इन समझौतों के तहत कंपनी को एकमुश्त राशि के बदले निर्दिष्ट स्थानों पर एटीएम की आपूर्ति, इंस्टालेशन और कमीशनिंग की पूरी जिम्मेदारी दी गई थी।
राजस्व विभाग का आरोप था कि जुलाई 2003 से अप्रैल 2006 के दौरान प्राप्त कुल अनुबंध राशि का 33% हिस्सा इंस्टालेशन और कमीशनिंग गतिविधियों से संबंधित था। विभाग के अनुसार, यह हिस्सा फाइनेंस एक्ट, 1994 की धारा 65(105)(zzd) के तहत सर्विस टैक्स के दायरे में आता था। इसके आधार पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क खुफिया महानिदेशालय, चेन्नई जोनल यूनिट द्वारा तीन कारण बताओ नोटिस जारी किए गए:
- कारण बताओ नोटिस संख्या 6/2005 (दिनांक 14.02.2005): जुलाई 2003 से जुलाई 2004 की अवधि के लिए 3,37,39,404 रुपये के सर्विस टैक्स की मांग की गई। कमिशनर ने ऑर्डर-इन-ओरिजिनल संख्या 03/2005 (दिनांक 23.12.2005) के तहत टैक्स और ब्याज की पुष्टि की, लेकिन जुर्माना नहीं लगाया। दोनों पक्षों ने कस्टम्स, एक्साइज एंड सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (CESTAT) में अपील की।
- कारण बताओ नोटिस संख्या 5/2005 (दिनांक 21.10.2005): अगस्त 2004 से जुलाई 2005 की अवधि के लिए 4,68,22,103 रुपये की मांग की गई। कमिशनर ने ऑर्डर-इन-ओरिजिनल संख्या 04/2005 (दिनांक 23.12.2005) के माध्यम से ब्याज और जुर्माने के साथ 4,27,95,344 रुपये का टैक्स और एजुकेशन सेस कंफर्म किया।
- कारण बताओ नोटिस संख्या 52/2006 (दिनांक 17.10.2006): अगस्त 2005 से अप्रैल 2006 के लिए 2,96,02,757 रुपये की मांग का प्रस्ताव रखा गया, जिसे ऑर्डर-इन-ओरिजिनल संख्या 04/2007 (दिनांक 23.02.2007) द्वारा कमिशनर ने स्वीकार किया।
28 नवंबर 2007 को, CESTAT ने असेसी की अपीलों को स्वीकार करते हुए तीनों ऑर्डर-इन-ओरिजिनल को रद्द कर दिया और जुर्माने से संबंधित राजस्व विभाग की अपील खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल ने माना कि अनुबंधों का मुख्य उद्देश्य एटीएम की आपूर्ति करना था, जबकि इंस्टालेशन और कमीशनिंग केवल प्रासंगिक (इंसिडेंटल) कार्य थे। CESTAT के इस फैसले को चुनौती देते हुए राजस्व विभाग ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षों की बहस
राजस्व विभाग के वकील ने तर्क दिया कि अनुबंधों में एटीएम आपूर्ति के साथ-साथ इंस्टालेशन और कमीशनिंग सेवाएं स्पष्ट रूप से शामिल थीं। उन्होंने कहा कि अनुबंध का टर्नकी स्वरूप या एकमुश्त समेकित राशि होना धारा 65(105)(zzd) के तहत इंस्टालेशन गतिविधियों के कर योग्य चरित्र को समाप्त नहीं करता। विभाग का कहना था कि उसने कुल राशि के 33% हिस्से को इंस्टालेशन मूल्य मानकर सही टैक्स लगाया था और CESTAT ने डेलिम इंडस्ट्रियल कंपनी लिमिटेड बनाम कमिशनर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, वडोदरा मामले पर भरोसा करके गलती की।
असेसी के वकील ने तर्क दिया कि बैंकों के साथ किए गए समझौते पूरी तरह क्रियाशील एटीएम प्रदान करने के लिए एकमुश्त राशि पर आधारित अविभाज्य टर्नकी अनुबंध थे। इंस्टालेशन और कमीशनिंग के कार्य मुख्य आपूर्ति से अलग नहीं किए जा सकते थे। उन्होंने बताया कि जुलाई 2003 से अप्रैल 2006 के दौरान, फाइनेंस एक्ट, 1994 में ऐसा कोई अधिकार नहीं था जिसके तहत कंपोजिट अनुबंधों को विभाजित करके उसमें से सर्विस कंपोनेंट निकाला जा सके। इसके अलावा, असेसी ने अनुबंध के पूरे मूल्य पर सेल्स टैक्स/वैट का भुगतान पहले ही कर दिया था।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या एटीएम आपूर्ति और इंस्टालेशन के टर्नकी अनुबंध अविभाज्य कंपोजिट समझौते थे, जिन्हें तत्कालीन फाइनेंस एक्ट, 1994 के तहत सर्विस टैक्स लगाने के लिए विभाजित नहीं किया जा सकता था।
राजस्व कानून के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए अदालत ने शिव स्टील्स बनाम असम राज्य और अन्य मामले का हवाला दिया और जोर देकर कहा कि कर का दायित्व केवल चार्जिंग अधिनियम से ही निकलना चाहिए:
“राजस्व कानून का यह एक स्थापित सिद्धांत है कि कर का दायित्व स्पष्ट रूप से चार्जिंग कानून से ही उत्पन्न होना चाहिए। किसी कराधान कानून में न तो किसी अवधारणा और न ही साम्य (इक्विटी) की गुंजाइश होती है। कर का अस्तित्व, दायरा और प्रभाव विधायिका द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा से स्पष्ट होना चाहिए, और कोई भी कर किसी निहितार्थ या चार्जिंग प्रावधान के व्यापक अर्थ निकालकर नहीं लगाया जा सकता।”
कंपोजिट अनुबंधों के कानूनी विकास का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने संविधान पीठ के फैसले स्टेट ऑफ मद्रास बनाम गैनन डंकरले एंड कंपनी (मद्रास) लिमिटेड का संदर्भ दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि 46वें संवैधानिक संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 366(29A)(b) ने राज्यों को वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट में ‘डीम्ड सेल्स’ पर टैक्स लगाने का अधिकार दिया, लेकिन उस समय के फाइनेंस एक्ट, 1994 में केंद्र के पास कंपोजिट अनुबंधों को विभाजित कर सर्विस टैक्स लगाने का ऐसा कोई प्रावधान नहीं था।
कानूनी सीमा को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“…वर्तमान अपील से संबंधित अवधि के दौरान, कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान शामिल नहीं था जो किसी अविभाज्य कंपोजिट टर्नकी अनुबंध को विभाजित या टुकड़ों में बांटने का अधिकार देता हो, ताकि उसके किसी एक घटक को अलग करके उस पर कर लगाया जा सके। जब तक कि चार्जिंग प्रावधान स्वयं ऐसी प्रक्रिया की परिकल्पना न करते हों, राजस्व विभाग मूल्यांकन की कोई विधि अपनाकर या कुल प्रतिफल का एक काल्पनिक प्रतिशत किसी विशिष्ट गतिविधि से जोड़कर कोई कर योग्य घटना उत्पन्न नहीं कर सकता, जिसे स्वयं कानून ने मान्यता न दी हो।”
कोर्ट ने आगे कमिशनर, सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम्स, केरल बनाम लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड मामले पर भरोसा जताया, जिसमें यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि 1 जून 2007 से पहले की कर योग्य प्रविष्टियां केवल विशुद्ध सेवा अनुबंधों (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स सिम्प्लीसीटर) पर लागू होती थीं, न कि अविभाज्य कंपोजिट वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट्स पर। कोर्ट ने दोहराया कि “…1 जून 2007 से ‘वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट सर्विस’ (फाइनेंस एक्ट, 2007 के माध्यम से) लागू होने से पहले मौजूद कर योग्य श्रेणियां केवल विशुद्ध सेवा अनुबंधों (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स सिम्प्लीसीटर) के लिए थीं, न कि अविभाज्य कंपोजिट वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए।”
राजस्व विभाग द्वारा 33% हिस्से पर मनमाने तरीके से सर्विस टैक्स लगाने के प्रयास को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
“शिव स्टील्स (उपरोक्त) में तय किए गए अनुसार, कोई भी वित्तीय दायित्व चार्जिंग अधिनियम के समर्थन के बिना किसी काल्पनिक या माने गए बंटवारे पर आधारित नहीं हो सकता। जब तक कि फाइनेंस एक्ट, 1994 ने किसी अविभाज्य कंपोजिट अनुबंध में शामिल सेवा तत्व के पृथक्करण को अधिकृत न किया हो, तब तक कोई भी प्रतिशत, चाहे वह कितना भी वैज्ञानिक रूप से निर्धारित क्यों न किया गया हो, राजस्व विभाग को सर्विस टैक्स लगाने का अधिकार नहीं दे सकता।”
जुलाई 2003 से अप्रैल 2006 की अवधि की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय में कहा:
“जुलाई 2003 से अप्रैल 2006 की अवधि के दौरान, फाइनेंस एक्ट, 1994 ने ऐसे अविभाज्य टर्नकी अनुबंधों के विभाजन को अधिकृत नहीं किया था, और न ही इसमें शामिल सेवा तत्व की पहचान और उसके आकलन के लिए आवश्यक तंत्र प्रदान किया था।”
पीठ ने नोट किया कि कंपोजिट अनुबंधों पर टैक्स लगाने और उनका मूल्यांकन करने का विशिष्ट वैधानिक अधिकार 1 जून 2007 को फाइनेंस एक्ट, 2007 की धारा 65(105)(zzzza) लागू होने के साथ ही प्रभाव में आया था।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि CESTAT द्वारा सर्विस टैक्स कमिशनर के आदेशों को रद्द करने में कोई त्रुटि नहीं की गई थी। राजस्व विभाग की अपीलों में कोई मेरिट न पाते हुए, अदालत ने 28 नवंबर 2007 के CESTAT के आदेश को बरकरार रखा और विभाग की चारों सिविल अपीलों को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कमिशनर ऑफ सर्विस टैक्स, चेन्नई बनाम मेसर्स डीबोल्ड सिस्टम्स (पी) लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 4708-4711/2008
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 6 अगस्त 2026

