22 साल जेल में बिताने के बाद शख्स हत्या के आरोप से बरी, सुप्रीम कोर्ट ने गवाह के बयान को बताया अविश्वसनीय

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हत्या के एक मामले में पिछले 22 वर्षों से जेल में बंद अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि जिस अकेले चश्मदीद की गवाही पर उसे दोषी ठहराया गया था, उसका बयान कमजोर, संदिग्ध और अत्यधिक असंभावित था।

अर्जुन जानी पर तीन महिलाओं की पीट-पीटकर हत्या करने का आरोप था, हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उसे केवल एक महिला की हत्या का दोषी माना था। ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल एक चश्मदीद के बयान पर सजा सुनाना गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन इसके लिए गवाही का पूरी तरह से विश्वसनीय, तर्कसंगत और अदालत का विश्वास जीतने वाला होना जरूरी है। वर्तमान मामले में गवाह के बयान में ऐसी गंभीर विसंगतियां थीं, जिनसे उसके घटना के वक्त मौजूद होने पर ही गहरा संदेह पैदा होता है।

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जांच और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल

अदालत ने पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर खामियों की ओर इशारा किया। पीठ ने कहा कि तीन लोगों की जान चली गई और पुलिस ने केवल संदेह के आधार पर एक व्यक्ति को पकड़ा। इसके बाद थर्ड-डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करके उससे स्वीकारोक्ति बयान लिया गया, जिसकी कानून में कोई मान्यता नहीं है।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के रवैये पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करने में असमर्थ रहा, जबकि हाईकोर्ट मामलों के निपटारे का आंकड़ा बढ़ाने वाला मूकदर्शक बना रहा। इन संयुक्त न्यायिक विफलताओं के कारण बिना किसी ठोस सबूत के एक निर्दोष व्यक्ति के जीवन के 22 साल छीन लिए गए।

पुनर्वास और बसाने के निर्देश

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अभियोजन पक्ष के लचर साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच के अभाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। इसके साथ ही पीठ ने कोरापुट स्थित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण और स्थानीय जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि वे अर्जुन जानी के पुनर्वास और उसे समाज में फिर से बसाने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।

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