दिल्ली के एक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मणीपाल सिग्ना हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए एक पॉलिसीधारक को 2.33 लाख रुपये से अधिक का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने यह फैसला महिला की ब्रेन ट्यूमर सर्जरी से जुड़े क्लेम को पुरानी बीमारी छिपाने के निराधार आरोपों पर खारिज किए जाने के मामले में सुनाया।
मुआवजे और कानूनी खर्च का भुगतान करने का आदेश
अध्यक्ष दिव्या ज्योति जयपुरियार और सदस्य रश्मि बंसल की पीठ ने 30 जुलाई को जारी अपने फैसले में बीमा कंपनी को शेष क्लेम राशि 1.58 लाख रुपये तुरंत जारी करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही मानसिक उत्पीड़न के एवज में 50,000 रुपये का मुआवजा और 25,000 रुपये कानूनी प्रक्रिया के खर्च के रूप में अदा करने को कहा। आयोग ने टिप्पणी की कि डॉक्टर के स्पष्टीकरण और बीमा लोकपाल (इन्श्योरेंस ओंबुड्समैन) के हस्तक्षेप के बावजूद नए-नए बहाने बनाकर क्लेम खारिज करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में गंभीर लापरवाही है।
इलाज का खर्च और विवाद की वजह
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता साल 2015 से मणीपाल सिग्ना से अपनी पत्नी के लिए ‘प्रोहेल्थ प्रोटेक्ट’ पॉलिसी लगातार रिन्यू करा रहे थे। अगस्त 2021 में उनकी पत्नी को ब्रेन ट्यूमर के कारण सर्जरी करानी पड़ी, जिसमें कुल 4.58 लाख रुपये का खर्च आया। एक अन्य बीमा प्रदाता से आंशिक राशि मिलने के बाद, शिकायतकर्ता ने बकाया 1.58 लाख रुपये के भुगतान के लिए मणीपाल सिग्ना के पास दावा पेश किया।
बीमारी छिपाने के आरोप पर डॉक्टर की सफाई
मणीपाल सिग्ना ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि पॉलिसी लेते समय वर्ष 2014 से चली आ रही डायबिटीज और मेसेंटेरिक वेन थ्रोम्बोसिस की बीमारी की जानकारी छिपाई गई थी। इसके जवाब में शिकायतकर्ता ने इलाज करने वाले डॉक्टर का पत्र प्रस्तुत किया। डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि पुरानी मेडिकल रिपोर्ट में 2014 का उल्लेख गलती से हो गया था, जबकि थ्रोम्बोसिस की समस्या वास्तव में 2016 में शुरू हुई थी। अस्पताल के डिस्चार्ज समरी में भी बीमारी की अवधि चार साल बताई गई थी, जो 2016-17 की शुरुआत की पुष्टि करती है।
लोकपाल के निर्देश के बाद भी क्लेम खारिज
बीमा लोकपाल ने कंपनी को डॉक्टर के बयान के आधार पर मामले की पुनर्समीक्षा करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद मणीपाल सिग्ना ने आवश्यक दस्तावेज जमा न करने का हवाला देकर दूसरी बार क्लेम खारिज कर दिया। हालांकि, कंपनी यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि कौन सा दस्तावेज जमा नहीं किया गया था, जबकि उपभोक्ता पहले ही सारे कागजात सौंप चुका था।
कंपनी का पक्ष खारिज और आयोग का निष्कर्ष
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि मणीपाल सिग्ना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत निर्धारित वैधानिक समय सीमा के भीतर अपना लिखित जवाब दाखिल करने में विफल रही। इस वजह से कंपनी के लिखित जवाब को रिकॉर्ड से हटा दिया गया और उपभोक्ता के साक्ष्य अनुत्तरित रहे। फोरम ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के क्लेम खारिज करना या बार-बार खारिज करने के कारण बदलना अनुचित है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि बीमा कंपनियां बिना पुख्ता प्रमाण के किसी पॉलिसीधारक का क्लेम या पॉलिसी रद्द नहीं कर सकतीं।

