लक्षद्वीप में पंडाराम जमीन खाली कराने का आदेश केरला हाईकोर्ट से रद्द, काबिज लोगों को 6 महीने में ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट देने का निर्देश

बुधवार को लक्षद्वीप प्रशासन को बड़ा झटका देते हुए केरला हाईकोर्ट ने द्वीप की ‘पंडाराम’ जमीनों को सरकारी कब्जे में लेने और वहां रह रहे निवासियों को बेदखल करने संबंधी प्रशासनिक आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने स्थानीय अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इन जमीनों पर काबिज लोगों को अगले छह महीनों के भीतर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी करें।

कलक्टर का 2024 का आदेश रद्द

जस्टिस टी आर रवि ने लक्षद्वीप के कलक्टर द्वारा 27 जून 2024 को जारी उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसके तहत प्रशासन को संपत्तियों पर किए गए केवल कानूनी सुधारों का मुआवजा देकर पंडाराम जमीनों पर कब्जा करने की अनुमति दी गई थी। याचिकाकर्ताओं में शामिल 20 अनुसूचित जनजाति निवासियों का पक्ष रखने वाले एडवोकेट अजीत जी अंजारलेकर ने फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि विस्तृत लिखित फैसला अभी जारी होना बाकी है। यह निर्णय पर्यटन विकास परियोजनाओं के नाम पर बेदखली का सामना कर रहे द्वीपवासियों द्वारा दायर करीब 200 याचिकाओं पर आया है।

कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन का तर्क

अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि कलक्टर का 27 जून 2024 का आदेश ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्था में उचित मुआवजा और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013’ में निर्धारित अनिवार्य वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किए बिना संपत्तियों को छीनने और लोगों को बेदखल करने का प्रयास था। याचियों ने कहा कि अतीत में जब भी सार्वजनिक हित के लिए जमीनों का अधिग्रहण किया जाता था, तो मानक भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा दिया जाता था, जबकि नए आदेश में केवल ढांचागत सुधारों का मुआवजा दिया जा रहा था।

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140 साल पुराना है पंडाराम जमीनों का इतिहास

यह विवाद स्वतंत्रता-पूर्व काल से जुड़ी 140 साल पुरानी पट्टा व्यवस्था से संबंधित है। ब्रिटिश शासन के दौरान स्थानीय परिवारों को नारियल के पेड़ उगाने के लिए 40 वर्ष की अवधि के पट्टे पर जमीनें दी गई थीं। इन जमीनों को ‘पंडाराम’ और पट्टेदारों को ‘काउलदार’ कहा जाता था। पट्टेदारों और उनके वंशजों का इन जमीनों पर लगातार कब्जा रहा है और वे वर्षों से इन पर कृषि व प्रबंधन कार्य करते आ रहे हैं।

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सांसद ने बताया संविधान और कानून के शासन की जीत

अदालत के निर्णय का स्वागत करते हुए लक्षद्वीप के सांसद एडवोकेट हमदुल्ला सईद ने इसे स्थानीय आबादी के भूमि अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा की रक्षा करने वाला एक ऐतिहासिक फैसला बताया। सईद ने अपने बयान में कहा कि यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि जनता के वैध अधिकारों को प्रभावित करने वाली कोई भी सरकारी कार्रवाई संविधान के ढांचे और कानून के शासन के दायरे में ही होनी चाहिए। उन्होंने इस फैसले को न्याय, संवैधानिक मूल्यों और कानून के शासन की जीत करार दिया।

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