विवाह के लिए तय कानूनी उम्र की उचित जांच न करने के मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने शहर के एक आर्य समाज मंदिर में विवाह संपन्न कराने और विवाह प्रमाण पत्र जारी करने पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।
सुरक्षा याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया मामला
जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की पीठ ने यह आदेश नेहा और आनंद कुमार नाम के एक जोड़े द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस प्रताड़ना से सुरक्षा की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने अदालत को सूचित किया कि आधार कार्ड के अनुसार याचिकाकर्ता आनंद कुमार की जन्मतिथि 1 जनवरी 2007 है, यानी उसकी उम्र लगभग 19 वर्ष है। भारत में पुरुषों के विवाह के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र 21 वर्ष निर्धारित है।
हलफनामे के आधार पर दर्ज की गई गलत उम्र
हाईकोर्ट के निर्देश पर मंदिर के सचिव संकल्प मिश्रा विवाह रजिस्टर और संबंधित रिकॉर्ड लेकर अदालत में उपस्थित हुए। पीठ ने उनसे सवाल किया कि जब आधार कार्ड में आनंद की जन्मतिथि 19 साल दर्शाती है और कोई अन्य दस्तावेज मौजूद नहीं था, तो विवाह प्रमाण पत्र में उसकी उम्र 22 वर्ष कैसे दर्ज कर दी गई।
इस पर मंदिर सचिव ने कहा कि लड़के की मां द्वारा दिए गए हलफनामे के आधार पर उम्र दर्ज की गई थी। हालांकि, जब कोर्ट ने पूछा कि आधिकारिक प्रमाण की अनुपस्थिति में केवल हलफनामे को उम्र का वैध दस्तावेज मानने का क्या कानूनी प्रावधान है, तो सचिव कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे सके।
रजिस्टर और दस्तावेज सीलबंद कस्टडी में रखने के आदेश
मामले में प्रथम दृष्टया उम्र की सही जांच न किए जाने की बात रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने आर्य समाज मंदिर को इस मामले में एक पक्षकार बनाया है। अदालत ने मंदिर प्रबंधन को निर्देश दिया है कि वह भविष्य में सभी कानूनी प्रक्रियाओं और उम्र सत्यापन के नियमों का अनिवार्य रूप से पालन करने का हलफनामा और अपना जवाब दाखिल करे।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मंदिर के विवाह रजिस्टर और जमा किए गए हलफनामों को हाईकोर्ट के वरिष्ठ रजिस्ट्रार की सीलबंद कस्टडी में रखने के निर्देश जारी किए हैं।
कानूनी कार्रवाई की चेतावनी
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित उम्र से कम आयु के व्यक्तियों का विवाह कराया जाता है, तो इस प्रक्रिया में शामिल सभी पक्ष और संस्थाएं कानून के तहत जवाबदेह होंगी। पीठ ने यह टिप्पणी भी की कि हालांकि आर्य समाज के मूल सिद्धांत सत्य और समाज कल्याण पर आधारित हैं, लेकिन कुछ संस्थाएं इन बुनियादी मूल्यों का पालन नहीं कर रही हैं।
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को तय की है।

