सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर उद्योग लिमिटेड (JUL) के हजारों श्रमिकों के दशकों से लंबित बकाया भुगतान के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को कोर्ट प्रशासक नियुक्त किया है, जो श्रमिकों के दावों के सत्यापन और कंपनी की संपत्तियों के मूल्यांकन की निगरानी करेंगे। कोर्ट ने JUL की सहायक कंपनी ‘जय एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड’ (JAIL) के शेयरों का गैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड (GDCL) के समूह को किए गए आवंटन को भी अवैध करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि GDCL केवल एक प्रबंधन संरक्षक (Management Custodian) के रूप में कार्य कर रही थी और उसने अपने अधिकारों का उल्लंघन किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
जयपुर उद्योग लिमिटेड (JUL) का यह कानूनी विवाद 17 सितंबर 1987 से शुरू हुआ, जब कंपनी को ‘बीमार उद्योग’ (Sick Industry) घोषित किया गया था। साल 1992 में BIFR ने GDCL द्वारा प्रस्तुत एक पुनरुद्धार योजना (Rehabilitation Scheme) को मंजूरी दी और प्रबंधन नए प्रमोटरों को सौंप दिया।
हालांकि, यह योजना विफल रही और इकाई बंद रही, जिसके कारण सवाई माधोपुर (राजस्थान) और कानपुर (उत्तर प्रदेश) इकाइयों के हजारों श्रमिकों का वेतन और अन्य बकाया लंबित रह गया। 24 नवंबर 2000 को BIFR ने JUL को बंद करने (Winding up) की सिफारिश की। 2016 में SICA कानून के निरस्त होने और IBC के लागू होने के बाद, अपीलीय अधिकारियों के पास लंबित मामले समाप्त हो गए क्योंकि 180 दिनों की समय सीमा के भीतर NCLT में कोई संदर्भ नहीं भेजा गया था। इसके परिणामस्वरूप, BIFR की बंद करने की सिफारिश फिर से जीवित हो गई और राजस्थान हाईकोर्ट में मामला लंबित है।
पक्षों की दलीलें
श्रमिक संघों की ओर से: विभिन्न संघों के वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि GDCL को JUL की संपत्तियों के साथ व्यवहार करने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि 1992 की योजना बहुत पहले ही विफल हो चुकी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि GDCL ने “गुपचुप तरीके से” सहायक कंपनी JAIL का शेयरधारिता पैटर्न बदल दिया और कोर्ट की अनुमति के बिना कानपुर जूट यूनिट और कृषि भूमि जैसी संपत्तियों को बेच दिया। उन्होंने नए निवेशकों (मेसर्स फ्रॉस्ट रियलिटी और मेसर्स डिकी एसेट मैनेजमेंट) का समर्थन किया, जिन्होंने संपत्तियों के बदले श्रमिकों के बकाया भुगतान का प्रस्ताव दिया था।
GDCL/JUL की ओर से: प्रमोटरों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और श्री ध्रुव मेहता ने तर्क दिया कि GDCL ने कंपनी को जीवित रखने और ऋणों को चुकाने के लिए लगभग 266 करोड़ रुपये निवेश किए थे। उन्होंने दावा किया कि चूँकि GDCL ने अधिकांश सुरक्षित लेनदारों का बकाया चुका दिया है, इसलिए उसे स्वामित्व की “वैध अपेक्षा” (Legitimate Expectation) थी। उन्होंने बिना अनुमति के कानपुर जूट यूनिट बेचने को एक “गलती” माना और इसके लिए माफी भी माँगी।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के लंबे इतिहास और GDCL के आचरण की विस्तृत समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि GDCL को केवल JUL का “प्रबंधन” सौंपा गया था, जिससे उसे स्वामित्व या संपत्तियां बेचने का अधिकार नहीं मिल गया था।
GDCL के आचरण पर: पीठ ने उल्लेख किया कि GDCL 1992 की योजना को लागू करने में विफल रही और वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया। कोर्ट ने यह भी पाया कि GDCL ने रिट याचिका लंबित रहने के दौरान बिना अनुमति के संपत्तियां बेचीं। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“इस तरह की अवैधता को किसी भी प्रकार की कल्पना से माफ नहीं किया जा सकता… यहां तक कि इस अदालत के समक्ष मजदूर संघों का आचरण भी संदिग्ध है क्योंकि उनमें से किसी ने भी GDCL की स्थिति के बारे में पूरे तथ्य नहीं बताए और न ही बिक्री पर आपत्ति जताई।”
सहायक कंपनी JAIL पर: कोर्ट ने इसे “अजीब” माना कि JUL की 99.99% स्वामित्व वाली सहायक कंपनी JAIL को पुनरुद्धार योजना में शामिल नहीं किया गया था। कोर्ट ने GDCL की समूह कंपनियों को नए शेयरों के आवंटन को, जिससे JUL की हिस्सेदारी घटकर 33% रह गई थी, “दोषपूर्ण” और “अवैध” करार दिया।
अनुच्छेद 142 और वैध अपेक्षा पर: कोर्ट ने GDCL की अपनी गलतियों को सुधारने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का उपयोग करने की याचिका को खारिज कर दिया।
“हमारी राय में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का उपयोग की गई अवैधताओं को माफ करने के लिए नहीं किया जा सकता… वैध अपेक्षा किसी पक्ष द्वारा की गई अवैधताओं से ऊपर नहीं हो सकती।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
- प्रशासक की नियुक्ति: मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति मनेंद्र मोहन श्रीवास्तव को प्रशासक नियुक्त किया गया है, जो श्रमिक बकाया के सत्यापन और PF अधिकारियों के साथ समन्वय करेंगे।
- श्रमिकों का बकाया: बकाया राशि का सत्यापन और भुगतान (जस्टिस आफताब आलम की रिपोर्ट के अनुसार 5% वार्षिक ब्याज सहित) 31 अगस्त 2026 तक पूरा किया जाना चाहिए।
- अवैध बिक्री: कानपुर जूट मिल और JAIL की संपत्तियों की बिक्री को इसलिए रद्द नहीं किया गया ताकि नए खरीदारों से जुड़े कानूनी विवादों (Pandora’s box) से बचा जा सके, लेकिन सवाई माधोपुर इकाई में स्क्रैप (Scrap) की बिक्री को स्पष्ट रूप से रद्द कर दिया गया है।
- शेयर आवंटन: GDCL समूह की कंपनियों को JAIL में किए गए शेयरों के सभी आवंटन अवैध घोषित किए गए हैं।
- कंपनी की संपत्तियां: JUL और JAIL की सभी शेष संपत्तियों की एक सूची तैयार की जाएगी और उनका मूल्यांकन किया जाएगा। कोर्ट बाद में तय करेगा कि अधिशेष संपत्तियों का उपयोग “सार्वजनिक हित” के लिए कैसे किया जाए।
- आवास: कंपनी के फ्लैटों में रह रहे श्रमिकों से पिछले समय का कोई किराया नहीं लिया जाएगा, लेकिन अंतिम बकाया मिलने के छह महीने के भीतर उन्हें आवास खाली करना होगा।
- बोलीदाताओं की अस्वीकृति: मेसर्स फ्रॉस्ट रियलिटी और मेसर्स डिकी एसेट मैनेजमेंट के आवेदनों को खारिज कर दिया गया क्योंकि JUL की संपत्तियों के औपचारिक मूल्यांकन के बिना उनके प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता था।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूँकि JUL पर अब सुरक्षित लेनदारों का कोई कर्ज नहीं है, इसलिए राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष लंबित ‘वाइंडिंग-अप’ याचिका अब निष्प्रभावी (Infructuous) हो गई है, और पूरी प्रक्रिया अब कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से संचालित होगी।
मामले का विवरण:
मामले का शीर्षक: भारतीय मजदूर संघ, यू.पी. एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 392/2015
पीठ: न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई
दिनांक: 15 अप्रैल 2026

