टाटानगर से संबलपुर जाने वाली केबीजे इस्पात एक्सप्रेस के 317 मिनट यानी पांच घंटे से अधिक देर से पहुंचने के मामले में झारखंड उपभोक्ता आयोग ने दक्षिण पूर्व रेलवे पर 60 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि बिना किसी उचित कारण के ट्रेन का घंटों लेट होना सेवा में कमी की श्रेणी में आता है, जिसके लिए रेलवे अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता।
यह फैसला आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह तथा सदस्य प्रदीप कुमार मिश्रा और संजू शाही की पीठ ने सुनाया। आयोग ने दक्षिण पूर्व रेलवे, कोलकाता के जनरल मैनेजर और चक्रधरपुर डिवीजन के सीनियर डिवीजनल ऑपरेशंस मैनेजर को 45 दिनों के भीतर मुआवजा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इस राशि में यात्री को हुई मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना के लिए 50,000 रुपये और कानूनी लड़ाई के खर्च के रूप में 10,000 रुपये शामिल हैं।
45 दिनों में करना होगा मुआवजे का भुगतान
यह मामला 13 अक्टूबर 2024 की एक रेल यात्रा से जुड़ा है। शिकायतकर्ता यात्री ने टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए केबीजे इस्पात एक्सप्रेस में टिकट बुक कराया था। समयासारणी के अनुसार ट्रेन को सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होकर दोपहर 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था। हालांकि, ट्रेन निर्धारित समय से 317 मिनट की देरी से अपने गंतव्य पर पहुंची।
ट्रेन की इस भारी देरी के कारण यात्री को गंभीर शारीरिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उसने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और 2.5 लाख रुपये के हर्जाने की मांग की।
रेलवे की क्षेत्राधिकार संबंधी दलीलें खारिज
दक्षिण पूर्व रेलवे ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया था कि उपभोक्ता आयोग के पास ट्रेनों की देरी से जुड़े मामलों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है, क्योंकि ऐसे विवाद ‘रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987’ के अंतर्गत आते हैं। इसके अलावा रेलवे ने यह तकनीकी आपत्ति भी उठाई कि टिकट आईआरसीटीसी (IRCTC) के माध्यम से बुक किया गया था, लेकिन उसे और खड़गपुर डिवीजन को इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया, इसलिए रेलवे पर सेवा में कमी का कोई दायित्व नहीं बनता।
उपभोक्ता आयोग ने रेलवे के इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रेलवे सेवाओं में कमी से जुड़ी शिकायतों पर सुनवाई करने के लिए जिला उपभोक्ता आयोग पूरी तरह से सक्षम हैं।
सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण निर्णय को रेखांकित किया जिसमें कहा गया था कि यात्रियों का समय बेहद मूल्यवान है। यदि ट्रेन में देरी होती है, तो रेलवे को यह साबित करना होगा कि देरी किसी अपरिहार्य स्थिति या उसके नियंत्रण से बाहर के कारणों से हुई थी। ऐसा न कर पाने की स्थिति में रेलवे यात्रियों को मुआवजा देने के लिए बाध्य है।
मामले का निपटारा करते हुए आयोग ने पाया कि जहां पीड़ित यात्री ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के जरिए अपना पक्ष मजबूती से साबित किया, वहीं रेलवे प्रशासन ट्रेन के पांच घंटे से अधिक लेट होने का कोई कारण या साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह असमर्थ रहा। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब सार्वजनिक सेवा प्रदाता बिना वजह देरी करते हैं और उसकी कोई वाजिब वजह नहीं दर्शा पाते, तो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उन पर हर्जाना लगाया जाना तय है।

