केरला हाईकोर्ट ने साल 2010 में एक 10 वर्षीय बच्ची की इलाज के दौरान हुई मौत के मामले में दो वरिष्ठ डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक सुनवाई रोकने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा पेशे से जुड़े लोग कानून से किसी भी तरह की छूट या प्रतिरक्षा का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस ए के जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए के की खंडपीठ ने डॉक्टरों की घोर लापरवाही बताने वाली राज्य विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
16 साल से लटका मामला, न्याय प्रणाली पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने अपने 4 अगस्त के आदेश में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि घटना के 16 साल बीत जाने के बाद भी अभी तक मामले की औपचारिक सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। पीठ ने कहा कि मुकदमे में और अधिक देरी से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर होगा। अदालत ने टिप्पणी की कि कानून के शासन का मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। चिकित्सा के पेशे में प्रवेश करते समय हिपोक्रेटिक शपथ लेने वाले डॉक्टर देश के कानूनों के तहत अपने कानूनी दायित्वों से पीछे नहीं हट सकते।
इलाज के तुरंत बाद बिगड़ी थी बच्ची की स्थिति
यह मामला 2 अगस्त 2010 का है, जब पेट दर्द और उल्टी की शिकायत के बाद बच्ची को क्रिश्चियन मिशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां तैनात डॉक्टर रेनी फिलिप (62) और डॉक्टर सुमा जॉन (64) ने उसे बिगटम (600 एमजी) और रैनटैक (0.5 सीसी) के इंट्रावेनस डोज दिए। दवा दिए जाने के तुरंत बाद बच्ची को गंभीर तकलीफ होने लगी। हालत बिगड़ने पर उसे आईसीयू और फिर वेंटिलेटर सपोर्ट के लिए दूसरे अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का मुख्य कारण चोकिंग यानी दम घुटना बताया गया था।
मेडिकल पैनल की रिपोर्ट और कानूनी मोड़
बच्ची के पिता द्वारा आपराधिक लापरवाही का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराने के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी। मामले को राज्य के दो-स्तरीय मेडीको-लीगल विशेषज्ञ पैनल के पास भेजा गया था। शुरुआत में शीर्ष पैनल ने दो अलग-अलग रिपोर्टों में दोनों डॉक्टरों को क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने पहले की कार्यवाहियों में उन रिपोर्टों को रद्द करते हुए पैनल को नए सिरे से समीक्षा करने का निर्देश दिया था। पैनल ने अपनी ताजा रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि डॉक्टर घोर लापरवाही के दोषी थे, जिसे डॉक्टरों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
बचाव पक्ष की दलीलें और हाईकोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान डॉक्टरों के वकील एस गोपाकुमारन नायर ने तर्क दिया कि विशेषज्ञ समिति के पास घोर लापरवाही का निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं थी और पैनल में बाल रोग विशेषज्ञों की गैर मौजूदगी के कारण इसकी राय को विशेषज्ञ साक्ष्य नहीं माना जा सकता। इसके जवाब में पीड़ित पिता के वकील जैकब पी एलेक्स ने कहा कि पैनल की रिपोर्ट केवल एक वैज्ञानिक साक्ष्य है, जिसे मुकदमे के दौरान अदालत में परखा जाएगा।
हाईकोर्ट ने बाल रोग विशेषज्ञ न होने संबंधी डॉक्टरों की आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि जब शुरुआती रिपोर्टों में उन्हें राहत दी गई थी, तब उन्होंने पैनल के गठन पर कोई सवाल नहीं उठाया था। अदालत ने कहा कि विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट जांच अधिकारी के लिए एक साक्ष्य मात्र है, न कि दोषसिद्धि का अंतिम फैसला। दोनों डॉक्टरों के पास आपराधिक सुनवाई के दौरान इन निष्कर्षों को चुनौती देने का पूरा अवसर रहेगा।

