सक्षम प्राधिकारी द्वारा बाद में दिया गया अनुसमर्थन अनाधिकृत इस्तीफा स्वीकृति को पिछली तिथि से वैध बनाता है: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस पमिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने निर्णय दिया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा किसी अनाधिकृत इस्तीफा स्वीकृति का बाद में किया गया अनुसमर्थन (रैटिफिकेशन) उसे उसकी मूल तिथि से ही वैध बना देता है। इसके बाद कर्मचारी को अपना इस्तीफा वापस लेने का अधिकार नहीं रहता। दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (डीटीयू) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कालीकट (एनआईटीसी) से जुड़े अपीलों का निपटारा करते हुए शीर्ष अदालत ने अपने पूर्व कर्मचारी बी.एस. रावत को बहाल करने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ डीटीयू की अपील स्वीकार कर ली। इसके साथ ही अदालत ने बकाए वेतन के लिए रावत की क्रॉस-अपील और एनआईटीसी में बहाली की मांग वाली उनकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बी.एस. रावत से जुड़ी दो अलग-अलग कार्यवाहियों से उत्पन्न हुआ।

डीटीयू के मामले में, रावत 23 अगस्त 2010 को सहायक रजिस्ट्रार (कानूनी) के पद पर शामिल हुए थे। दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी अधिनियम, 2009 की धारा 23(2)(ix) के तहत बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (बीओएम) के पास प्रशासनिक कर्मियों को नियुक्त करने की शक्ति निहित है। 19 मई 2016 को रावत ने 1 सितंबर 2016 से प्रभावी होने के लिए अपना इस्तीफा सौंपा। इसके बाद उन्होंने नोटिस अवधि को माफ करने का अनुरोध किया और 31 मई 2016 से इस्तीफा स्वीकार करने की मांग की। 25 मई 2016 को, तत्कालीन कार्यवाहक कुलपति ने 31 मई 2016 से उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। रावत को देय राशि चुकता प्रमाण पत्र (नो-ड्यूज), अंतिम वेतन और अनुभव प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बाद कार्यमुक्त कर दिया गया।

चार महीने बाद, 22 सितंबर 2016 को, रावत ने यह दावा करते हुए अपना इस्तीफा वापस लेने की मांग की कि इसे सक्षम प्राधिकारी यानी बीओएम द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था। 26 सितंबर 2016 को बीओएम ने अपनी 20वीं बैठक में इस स्वीकृति को अनुसमर्थित (रैटिफाई) कर दिया और 3 नवंबर 2016 को रावत के इस्तीफा वापसी के अनुरोध को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया गया। रावत ने इसे दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने उन्हें पूरे बकाए वेतन और ब्याज के साथ बहाल करने का आदेश दिया। अपील करने पर, डिवीजन बेंच ने बहाली के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन बकाए वेतन से इनकार कर दिया क्योंकि रावत ने इस बीच दूसरी नौकरी प्राप्त कर ली थी। इसके बाद डीटीयू और रावत दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

एनआईटीसी के मामले में, डीटीयू छोड़ने के बाद, रावत 8 फरवरी 2017 को डिप्टी रजिस्ट्रार के रूप में एनआईटीसी में शामिल हुए। 8 नवंबर 2018 को, उन्होंने एक सशर्त इस्तीफा दिया, जिसे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रथम नियम, 2009 के नियम 30 के तहत अस्वीकार्य बताते हुए वापस कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने बिना शर्त इस्तीफा सौंप दिया और कार्यमुक्त होने से पहले इसे वापस लेने की अनुमति मांगी। सक्षम प्राधिकारी ने 22 नवंबर 2018 को इस्तीफा स्वीकार कर लिया, जिसे 4 दिसंबर 2018 को अधिसूचित किया गया और 11 जनवरी 2019 को कार्यमुक्त करने की तिथि तय की गई। 28 नवंबर 2018 को, ईस्ट दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में प्रतिनियुक्ति पर चयन होने के बाद, रावत ने अपना इस्तीफा वापस लेने की मांग की। अथॉरिटी ने 7 जनवरी 2019 को इस्तीफा वापसी का अनुरोध खारिज कर दिया और 11 जनवरी 2019 को उन्हें रिलीव कर दिया।

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रावत ने इस फैसले को केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने बकाए वेतन के बिना बहाली का आदेश दिया। क्रॉस-अपील पर, डिवीजन बेंच ने बहाली के आदेश को रद्द कर दिया और बकाए वेतन की रावत की अपील खारिज कर दी। इससे व्यथित होकर रावत ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की।

पक्षों की दलीलें

डीटीयू के वकील ने तर्क दिया कि कार्यवाहक कुलपति ने इस्तीफा स्वीकार किया था, जिसे बाद में बीओएम द्वारा अनुसमर्थित किया गया था। डीटीयू ने दलील दी कि रावत, जिन्होंने स्वयं नोटिस अवधि की छूट का अनुरोध किया था और सभी अंतिम लाभ स्वीकार किए थे, अब स्वीकृति के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दे सकते। व्यक्तिगत रूप से पेश हुए रावत ने तर्क दिया कि उनका इस्तीफा कभी भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा मंजूर नहीं किया गया था, जिससे अनुसमर्थन कानूनी रूप से अमान्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि वे बकाए वेतन के साथ बहाली के हकदार हैं।

एनआईटीसी मामले में रावत ने तर्क दिया कि संस्थान ने नोटिस अवधि समाप्त होने से पहले उन्हें रिलीव करके गलती की है, बोर्ड ऑफ गवर्नेंस ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था और बिना अधिकार क्षेत्र के की गई कार्रवाई का अनुसमर्थन नहीं किया जा सकता। एनआईटीसी के वकील ने तर्क दिया कि एनआईटी प्रथम नियम, 2009 के नियम 30 के प्रावधान के तहत इस्तीफा स्वीकृति की तिथि से प्रभावी होता है और इस्तीफा वापसी के अनुरोध को खारिज करना पूरी तरह कानूनी था।

अदालत का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसमर्थन के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ रैटिफिकेशन), पक्षों के आचरण और इस्तीफे को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे से संबंधित कानूनी प्रश्नों का परीक्षण किया।

1. सक्षम प्राधिकारी और अनुसमर्थन का सिद्धांत

अदालत ने माना कि 2009 के अधिनियम की धारा 23(2)(ix) के तहत बीओएम ही इस्तीफा स्वीकार करने के लिए सक्षम प्राधिकारी है। 25 मई 2016 को इस्तीफा स्वीकार करने वाले प्रोफेसर योगेश सिंह के पास केवल कुलपति का अतिरिक्त प्रभार था और बीओएम की शक्तियां उन्हें वैध रूप से स्थानांतरित नहीं की गई थीं।

हालांकि, अनुसमर्थन के सिद्धांत का विश्लेषण करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने ब्लैक्स लॉ डिक्शनरी का हवाला दिया, जो अनुसमर्थन को “किसी ऐसे कार्य की पुष्टि करना जो पहले या तो स्वयं पार्टी द्वारा या किसी अन्य द्वारा किया गया हो” के रूप में परिभाषित करती है। पीठ ने कानूनी सूक्तियों “रतियाबिटियो मंडाटो एक्विपैराचुर” (बाद का अनुसमर्थन पूर्व आदेश के समान है) और “ओम्निस रतियाबिटियो रिट्रोट्राहितुर एत मंडाटो प्रायरी एक्विपैराचुर” (अनुसमर्थित कार्य को मूल अनाधिकृत कार्य की तिथि से ही वैध माना जाता है) पर प्रकाश डाला।

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अदालत ने अनुसमर्थन को नियंत्रित करने वाले छह प्रमुख कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया:

  1. अनुसमर्थन का अर्थ है पहले से अमान्य कार्य को बाद की मंजूरी से वैध बनाना।
  2. बाद का अनुसमर्थन पूर्व अधिकार या आदेश के समकक्ष होता है।
  3. अनुसमर्थन पिछली तिथि से लागू होता है और मूल कार्य की तारीख से प्रभावी माना जाता है।
  4. केवल सक्षम प्राधिकारी ही किसी अमान्य कार्य को अनुसमर्थित कर सकता है।
  5. नए आदेश के बिना प्रस्ताव या निर्णय के माध्यम से व्यक्त की गई मंजूरी ही पर्याप्त है।
  6. अनुसमर्थन केवल अधिकार की कमी के दोष को ठीक करता है, उन कार्यों को नहीं जो कानूनन अवैध या शून्य हों।

अदालत ने श्री परमेश्वरी प्रसाद गुप्ता बनाम भारत संघ, राजस्थान हाईकोर्ट बनाम पी.पी. सिंह, महाराष्ट्र स्टेट माइनिंग कॉर्पोरेशन बनाम सुनील, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बनाम पन्नालाल चौधरी, और म्युनिसिपल कमिश्नर, जामनगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम आर.एम. दोषी के पूर्व फैसलों का संदर्भ दिया।

2. कर्मचारी का आचरण और विबंध (एस्टॉपेल)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शुरुआत में किसी अनाधिकृत अधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया इस्तीफा एक अंतिम और अपरिवर्तनीय लेन-देन बन जाता है, यदि दोनों पक्ष इसे अंतिम मानते हुए तदनुसार आचरण करते हैं। राइशेल बनाम बिशप ऑफ ऑक्सफोर्ड और भारत संघ बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा का हवाला देते हुए अदालत ने नोट किया कि जिस व्यक्ति ने अपने आचरण से प्रक्रिया को “पूर्ण” कर लिया है, वह बाद में इसे रद्द नहीं कर सकता।

पीठ ने ध्यान दिया कि रावत ने स्वयं समय से पहले रिलीव होने का अनुरोध किया, अपने नो-ड्यूज और अनुभव प्रमाण पत्र स्वीकार किए, और एनआईटीसी में नौकरी पाने के लिए उसी अनुभव प्रमाण पत्र का उपयोग किया। अदालत ने टिप्पणी की:

“वह दोनों हाथों में लड्डू नहीं रख सकता। यानी, वह अपनी सुविधानुसार डीटीयू से पूरी तरह बाहर निकलने का लाभ भी ले और साथ ही जब उसे वापस लौटना हो तो यह दावा भी करे कि कानूनी रूप से उसका इस्तीफा कभी स्वीकार ही नहीं हुआ था।”

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि 26 सितंबर 2016 को बीओएम द्वारा अनुसमर्थित होने के बाद, स्वीकृति की तिथि 25 मई 2016 से लागू हो गई। इसलिए, 22 सितंबर 2016 को रावत के पास वापस लेने के लिए कोई इस्तीफा अस्तित्व में ही नहीं बचा था।

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3. एनआईटीसी इस्तीफे पर निर्णय

केरल हाईकोर्ट के निर्णय के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने एनआईटी प्रथम नियम, 2009 के नियम 30 का परीक्षण किया, जिसमें प्रावधान है कि इस्तीफा “केवल उसी तिथि से प्रभावी होगा जिस तिथि को नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा इस्तीफा स्वीकार किया जाता है”राज कुमार बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है, तो उसकी सूचना न मिलने मात्र से इस्तीफा जीवित नहीं रहता। रावत का इस्तीफा 22 नवंबर 2018 को प्रभावी हो गया था, जिससे 28 नवंबर 2018 का उनका वापसी पत्र समय सीमा के बाद का हो गया।

इसके अलावा, 11 फरवरी 1988 के कार्यालय ज्ञापन के पैरा 3 के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास इस्तीफा वापसी को अस्वीकार करने का अधिकार सुरक्षित है। अदालत ने पाया कि रावत ने अपने पत्र में लिखा था कि वे संस्थान में “काम करने में अब कोई रुचि नहीं रखते” और उन्होंने दूसरी जगह प्रतिनियुक्ति पर चयन के बाद ही वापसी की मांग की थी। एयर इंडिया एक्सप्रेस लिमिटेड बनाम कैप्टन गुरदर्शन कौर संधू का हवाला देते हुए, अदालत ने माना कि 7 जनवरी 2019 को इस्तीफा वापसी से इनकार करने वाला अथॉरिटी का आदेश तर्कसंगत और वैध था।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. सिविल अपील नंबर 9308/2024 (डीटीयू बनाम बी.एस. रावत) को स्वीकार किया गया। रावत को बहाल करने का दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया गया और रिट याचिका खारिज कर दी गई।
  2. बकाए वेतन की मांग करने वाली सिविल अपील नंबर 9309/2024 (बी.एस. रावत बनाम डीटीयू) खारिज कर दी गई।
  3. विशेष अनुमति याचिका (सी) नंबर 625-626/2021 (भारत सिंह रावत बनाम एनआईटी कालीकट) को खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी बनाम बी.एस. रावत
वाद संख्या: सिविल अपील नंबर 9308/2024 (सिविल अपील नंबर 9309/2024 और एसएलपी (सी) नंबर 625-626/2021 के साथ)
पीठ: जस्टिस पमिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 4 अगस्त 2026

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