मैटरनिटी पैकेज में सेवा की कमी पर अस्पताल पर कार्रवाई, उपभोक्ता आयोग ने ठोका 30 हजार रुपये का जुर्माना

पंजाब के एक उपभोक्ता आयोग ने प्रसूति (मैटरनिटी) पैकेज के तहत वादा की गई सुविधाएं और साफ-सफाई के मानक न पूरे करने पर एक अस्पताल को मरीज को 30,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि सर्जरी के बाद ठीक हो रही माताओं को स्वच्छ माहौल और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराना अस्पताल की कानूनी जिम्मेदारी है।

सूप में मिला प्लास्टिक, सुविधाओं में लापरवाही

यह मामला एक महिला से जुड़ा है, जिन्होंने अस्पताल का 75,000 रुपये वाला रियायती मैटरनिटी पैकेज लिया था। इस पैकेज में दवाएं और नैदानिक परीक्षण अलग से बिल किए जाने थे। अस्पताल में महिला का सिजेरियन ऑपरेशन सफल रहा और उन्होंने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। हालांकि, इलाज के बाद रुकने के दौरान महिला ने अस्पताल की गैर-चिकित्सकीय सेवाओं में कई तरह की कमियों का आरोप लगाया।

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शिकायत के अनुसार, अटेंडेंट के लिए गंदा सोफा दिया गया था और तौलिए फटे हुए थे। इसके अलावा, सर्जरी से उबरने के दौरान मरीज को परोसे गए सूप में प्लास्टिक का टुकड़ा पाया गया। पैकेज में शामिल अन्य सुविधाएं, जैसे कमरे की सजावट और केक काटने का कार्यक्रम, या तो प्रदान नहीं की गईं या उनका प्रबंधन बेहद खराब रहा। महिला ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए क्षतिपूर्ति की मांग की।

अस्पताल की दलील और आयोग का फैसला

अस्पताल ने अपने जवाब में सेवा में किसी भी कमी से इनकार किया। अस्पताल का कहना था कि प्रसव बिना किसी चिकित्सीय जटिलता के संपन्न हुआ और मां व बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ रहे। खराब तौलिए और सूप में प्लास्टिक मिलने की बात स्वीकार करते हुए अस्पताल ने इसे एक अनजानी मानवीय भूल बताया, जिसे तुरंत ठीक कर दिया गया था। केक काटने के कार्यक्रम को लेकर अस्पताल ने तर्क दिया कि मरीज की ओर से समय तय न किए जाने के कारण ऐसा हुआ।

आयोग के अध्यक्ष एस के अग्रवाल और सदस्य परमजीत कौर की पीठ ने पाया कि मामला डॉक्टरी लापरवाही का नहीं है, क्योंकि सिजेरियन प्रसव सफल रहा था। इसलिए आयोग ने अपनी समीक्षा केवल मैटरनिटी पैकेज में शामिल अन्य सहायक सेवाओं तक ही सीमित रखी।

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अस्पताल द्वारा लिखित जवाब में मानी गई गलतियों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने स्पष्ट किया कि अनजाने में हुआ चूक भी सेवा मानकों का उल्लंघन माना जाएगा। पीठ ने कहा कि सर्जरी के बाद ठीक हो रही महिला मरीज को दूषित भोजन या अस्वच्छ सामग्री देना अपेक्षित मानकों पर खरा न उतरने का प्रमाण है। आयोग ने अस्पताल को 30 दिनों के भीतर मानसिक उत्पीड़न और कानूनी खर्च के रूप में 30,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।

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