मुस्लिम व्यक्ति को नहीं मिलेगा अनुसूचित जाति का दर्जा: बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 1950 का संवैधानिक आदेश बरकरार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम व्यक्ति को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा देने से इनकार करने वाले वर्ष 1998 के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत यह दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वालों तक ही सीमित है। जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के और जस्टिस निवेदिता पी मेहता की पीठ ने 27 जुलाई को दिए अपने निर्णय में 1950 के आदेश के पैरा 3 को असंवैधानिक घोषित करने की याचिका खारिज कर दी।

संविधान के अनुच्छेद 141 का हवाला

पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी है। इसलिए हाईकोर्ट मौजूदा कानूनी प्रावधानों को लागू करने के लिए बाध्य है। अदालत ने यह टिप्पणी नागपुर की जाति प्रमाण पत्र स्क्रूटनी कमेटी के 24 नवंबर 1998 के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर की, जिसमें याचिकाकर्ता के मुस्लिम होने के कारण उसे ‘बहना’ श्रेणी के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा देने से मना कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने 1999 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 1950 के आदेश के पैरा 3 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 25 का उल्लंघन बताया था।

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सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का असर नहीं

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील अक्षय सुदामे ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट में इससे जुड़ा मामला लंबित है, इसलिए हाईकोर्ट को इस विषय की स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए। हालांकि, पीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सुप्रीम कोर्ट में विचारधीन मामला होने से पहले से लागू कानून का प्रभाव खत्म नहीं होता। जब तक पुराना फैसला रद्द न हो जाए या उस पर रोक न लगे, तब तक सभी अदालतें उसे लागू करने के लिए बाध्य हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की मांग स्वीकार करने से न्याय व्यवस्था में अनिश्चितता पैदा होगी।

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केंद्र सरकार की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल कार्तिक शुक्ल, अधिवक्ता गौरव खटवानी और पृथा हरदास ने दलील दी कि हाईकोर्ट हमेशा सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानून का पालन करता है। यदि भविष्य में शीर्ष अदालत इस कानून में कोई बदलाव करती है, तो याचिकाकर्ता उसका लाभ उठाने के लिए स्वतंत्र है।

मामले का कानूनी सफर

इस मामले में याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की भी मांग की थी, जिसे शीर्ष अदालत ने 5 मई को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केस ट्रांसफर करने की कोई कानूनी जरूरत नहीं है और हाईकोर्ट चार महीने के भीतर इस पर निर्णय ले।

इससे पहले, 8 जुलाई 2022 को हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की नौकरी की सुरक्षा से जुड़े एक अंतरिम आदेश पर लगी रोक हटा दी थी। अदालत ने तब कहा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती सफल होती है, तो याचिकाकर्ता को इसके बाद का राहत लाभ दिया जा सकता है।

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सुसाई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का नजीर

1950 के आदेश के पैरा 3 में स्पष्ट लिखा है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘सुसाई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का अनुसरण किया। ईसाई धर्म के एक दावेदार से जुड़े उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गैर-हिंदू या गैर-सिख समुदायों को एससी का दर्जा देने के लिए यह साबित करना होगा कि वे भी उतनी ही सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का सामना कर रहे हैं, जिससे सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाए।

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