कर्नाटक हाईकोर्ट ने श्री श्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम और उससे जुड़े संगठनों के खिलाफ जमीन पर अवैध कब्जे के आरोपों की जांच के लिए गठित विशेष जांच टीम (SIT) के सरकारी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने प्रक्रियात्मक नियमों की अनदेखी का हवाला देते हुए यह कदम उठाया।
जस्टिस ई एस इंदिरेश की पीठ ने 31 जुलाई को आश्रम से संबद्ध संस्था वेद विज्ञान महा विद्या पीठ ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत इस मामले में अगली सुनवाई 17 अगस्त को करेगी।
संयुक्त सर्वेक्षण न कराने पर उठाये सवाल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राज्य प्रशासन ने कर्नाटक भू-राजस्व अधिनियम की धारा 195 के तहत निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया। कानून के अनुसार जांच का आदेश देने से पूर्व संबंधित पक्ष की उपस्थिति में विवादित जमीन का संयुक्त सर्वेक्षण कर उसकी सीमाएं तय करना आवश्यक था।
अदालत ने कहा कि चूंकि 17 जुलाई को जारी सरकारी आदेश से पहले इस वैधानिक प्रक्रिया को पूरा नहीं किया गया, इसलिए जांच आदेश के क्रियान्वयन को आगामी सुनवाई तक स्थगित रखा जाएगा।
291 एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप
राज्य सरकार ने 17 जुलाई को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अम्लान आदित्य बिस्वास के नेतृत्व में 11 सदस्यों की एक विशेष जांच टीम गठित की थी। इस समिति को जमीन आवंटन के दस्तावेजों, लीज शर्तों के उल्लंघन और सार्वजनिक रास्तों, जल स्रोतों व चराई भूमि पर कथित कब्जों की जांच का काम सौंपा गया था।
यह सरकारी कदम अक्टूबर 2025 की उस सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर उठाया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि बेंगलुरु दक्षिण तालुक के कग्गलीपुरा गांव में स्थित सर्वे नंबर 160, 164/1, 164/2, 150 और 137 की 291 एकड़ 38 गुंठा सरकारी जमीन पर चारदीवारी बना ली गई है। इसमें गोचर भूमि, झीलें और जल निकासी के रास्ते शामिल हैं।
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, संस्था को कुल 60 एकड़ भूमि लीज पर दी गई थी। इनमें से 41 एकड़ की लीज 2015 में समाप्त हो चुकी है, जबकि शेष भूमि की लीज 2033 तक प्रभावी है। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया था कि सर्वे नंबर 150 की झील वाली जमीन की जांच के दौरान स्थानीय प्रतिनिधियों और संस्था से जुड़े लोगों ने आधिकारिक सर्वेक्षण कार्यों में बाधा डाली थी।
एसआईटी जांच की नींव वर्ष 2023 में चंद्रशेखर एन, महेश बी और मुनिराजू एस द्वारा दायर जनहित याचिका से पड़ी थी, जिसमें आश्रम पर नालों और झीलों पर निर्माण करने का आरोप लगाया गया था।
आश्रम ने आरोपों को बताया राजनीतिक साजिश
दूसरी तरफ, आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन ने जमीन पर अवैध कब्जे के सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी गतिविधियों को पूरी तरह कानूनी बताया है।
संस्था का कहना है कि करीब चार-पांच महीने पहले हुए आधिकारिक सरकारी मूल्यांकन से यह सिद्ध हो चुका है कि उसे आवंटित 60 एकड़ में से केवल 36 एकड़ जमीन ही उसके पास है, जबकि बाकी 24 एकड़ जमीन का कब्जा सरकार ने उसे अभी तक नहीं सौंपा है।
फाउंडेशन ने जांच को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए आरोप लगाया कि आपराधिक मामलों का सामना कर रहे एक विधान परिषद सदस्य (MLC) के इशारे पर यह कार्रवाई की जा रही है। आश्रम प्रशासन ने दावा किया कि उसके पास रंगदारी मांगने के ऑडियो प्रमाण मौजूद हैं, जिन्हें जांच अधिकारियों को सौंप दिया गया है।

