सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने माना है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 299 के तहत शुरुआती चरण में अदालत द्वारा आवश्यक क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्यों (jurisdictional facts) पर औपचारिक संतुष्टि दर्ज किए बिना, सह-आरोपी के ट्रायल के दौरान दर्ज साक्ष्य का उपयोग बाद में पकड़े गए फरार आरोपी के खिलाफ नए ट्रायल में नहीं किया जा सकता। घटना के 18 साल बाद गिरफ्तार किए गए आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा रद्द कर दी और उसे बरी करने का आदेश दिया, क्योंकि पिछले ट्रायल के दौरान धारा 299 CrPC के तहत कोई न्यायिक आदेश पारित नहीं किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 1 अप्रैल 1999 की एक घटना से संबंधित है, जहां दो लोगों पर हत्या का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मेले से लौट रहे गवाहों ने अपीलकर्ता महेंद्र सिंह को एक व्यक्ति पर हमला करते, उसकी छाती पर बैठते और उसका गला घोंटते देखा, जबकि सह-आरोपी उकसा रहा था और राहगीरों को धमका रहा था। धमकियों से डरकर गवाह मौके से भाग गए।
घटना के बाद अपीलकर्ता फरार हो गया, जिसके कारण मामले को विभाजित (split-up) कर दिया गया। सह-आरोपी पर अलग से मुकदमा चलाया गया और उसे बरी कर दिया गया। अपीलकर्ता 18 वर्षों से अधिक समय तक फरार रहा, जब तक कि उसे 11 सितंबर 2017 को गिरफ्तार नहीं कर लिया गया और उसके बाद उस पर हत्या का मुकदमा चलाया गया।
निचली अदालतों के निष्कर्ष और तर्क
2017 में गिरफ्तारी के बाद शुरू हुए ट्रायल में समय बीत जाने के कारण अभियोजन पक्ष को साक्ष्यों की कमी का सामना करना पड़ा। मुख्य गवाह PW1 की मृत्यु हो चुकी थी और वह गवाही देने के लिए उपलब्ध नहीं था। अन्य चश्मदीद गवाह मुकर गए (hostile हो गए), जबकि PW2, जिसने हमले को देखने की बात कही थी, अपीलकर्ता की पहचान नहीं कर सका क्योंकि उसे न्यायिक हिरासत से अदालत में पेश नहीं किया गया था। PW2 की जिरह से यह भी सामने आया कि गांव में महेंद्र सिंह नाम के दो व्यक्ति थे।
इन कमियों के बावजूद, ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने सह-आरोपी के पहले ट्रायल के दौरान दर्ज PW1 की पुरानी गवाही पर भरोसा करते हुए अपीलकर्ता को दोषी ठहराया। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि आरोपी के लंबे समय तक फरार रहने के कारण धारा 299 CrPC के तहत ऐसा बयान स्वीकार्य है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें
धारा 299 CrPC के दायरे की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 33 के तहत किसी गवाह से जिरह (cross-examination) करने का अधिकार आरोपी को मिला एक अटूट अधिकार है। धारा 299 CrPC इसका एक अपवाद है, लेकिन इसके उपयोग के लिए वैधानिक शर्तों का सख्ती से पालन करना आवश्यक है।
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने स्पष्ट किया कि धारा 299 CrPC में दो अलग-अलग भाग शामिल हैं, जिनके लिए क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्यों का प्रमाण आवश्यक है:
“इसलिए धारा 299 का उपयोग केवल तभी संभव है जब दो क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य स्थापित हों, जिसके दो परिणाम होते हैं—एक वर्तमान में और दूसरा भविष्य में। धारा 299 को लागू करने के लिए आवश्यक क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्यों का प्रमाण दो पहलुओं पर है: पहला कि आरोपी फरार है और दूसरा कि उसकी तत्काल गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं है।”
अदालत ने इस नियम के पीछे के तर्क को रेखांकित करते हुए टिप्पणी की:
“इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी जानबूझकर भागकर अभियोजन को विफल न करे और इस प्रकार आपराधिक न्याय प्रणाली को खतरे में न डाले। यह इस सिद्धांत पर भी आधारित है कि जो आरोपी जानबूझकर छिप जाता है और जांच व सुनवाई को बाधित करने का प्रयास करता है, वह साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 के तहत प्रत्येक गवाह से जिरह करने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। हालांकि जिरह का अधिकार आरोपी को मिला एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन यदि आरोपी अपने ही कृत्यों से फरार रहता है, तो उसे यह अधिकार नहीं मिलेगा।”
पूर्व उदाहरणों का उल्लेख करते हुए पीठ ने निर्मल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2000) 4 SCC 41 मामले का संदर्भ दिया, जिसमें निर्णय दिया गया था कि:
“…दूसरे शब्दों में, अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए गवाहों के बयान दर्ज करने से पहले, अदालत को इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी फरार हो गया है या उसके तुरंत गिरफ्तार होने की कोई संभावना नहीं है, जैसा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 299(1) के पहले भाग के तहत प्रावधान किया गया है…”
अदालत ने जयेंद्र विष्णु ठाकुर बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (2009) 7 SCC 104 का भी उल्लेख किया और दोहराया कि धारा 299 CrPC के पहले भाग की दोनों शर्तों को एक साथ पूरा किया जाना चाहिए:
“निस्संदेह, संहिता की धारा 299 के पहले भाग में शामिल दोनों शर्तों को संयुक्त रूप से पढ़ा जाना चाहिए, न कि अलग-अलग। केवल एक शर्त की संतुष्टि पर्याप्त नहीं होगी।”
पीठ ने सुखपाल सिंह बनाम एनसीटी दिल्ली 2024 SCC OnLine SC 800 में तय सिद्धांतों का भी हवाला दिया और कहा कि जब आरोपी फरार पाया जाता है, तो कमिटाल या ट्रायल के स्तर पर ही अदालत द्वारा दोनों क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्यों को सिद्ध करने वाला एक स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि 1999 में अदालत द्वारा धारा 299 CrPC के तहत कोई आदेश पारित नहीं किया गया था—न तो कमिटाल के चरण में और न ही सह-आरोपी के खिलाफ ट्रायल शुरू होने के समय—जिसमें अपीलकर्ता के फरार होने और उसकी तत्काल गिरफ्तारी की असंभवता का प्रमाण दर्ज किया गया हो।
शुरुआती चरण में पारित ऐसे न्यायिक आदेश के बिना, 1999 में दर्ज PW1 के बयान को बाद के ट्रायल में अपीलकर्ता के खिलाफ कानूनी रूप से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। चूंकि बाकी गवाह मुकर गए थे या पहचान स्थापित करने में विफल रहे थे, इसलिए अपीलकर्ता के खिलाफ अभियोजन पक्ष का मामला टिक नहीं सका।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए सजा रद्द कर दी और महेंद्र सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह हिरासत में है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए और यदि जमानत पर है तो उसके जमानत बांड रद्द किए जाएं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: महेंद्र सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3566/2026 (@ विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 6741/2026)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 31 जुलाई 2026

